बच्चों में नींद में चलने की बीमारी (स्लीपवॉकिंग) का इलाज | Sleepwalking in Children In Hindi

Sleepwalking in Children In Hindi

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‘नींद में चलना’ इस विषय के बारे में लोग काफी कम बात करते हैं, जबकि यह गंभीर विषय है। खासतौर से अगर किसी के बच्चे को यह बीमारी है, तो यह चिंता का विषय है। जैसे कुछ बच्चे नींद में बड़बड़ाते हैं, वैसे ही कुछ बच्चों को नींद में चलने की आदत होती है। अगर वक्त रहते बच्चों में नींद में चलने की बीमारी का इलाज न किया जाए, तो उम्र के साथ यह समस्या बढ़ती जाती है। यकीन मानिए, यह विषय छुपाने का नहीं, बल्कि इस पर खुलकर बात करने की जरूरत है। यही कारण है कि हम मॉमजंक्शन के इस लेख में नींद में चलने की आदत के बारे में बताएंगे और बच्चों का नींद में चलना कितना सामान्य है, इस बारे में भी जानकारी देंगे।

सबसे पहले जानते हैं कि बच्चों के नींद में चलना क्या है।

बच्चों में नींद में चलने की बीमारी (स्लीपवाकिंग) क्या है?

स्लीपवॉकिंग एक प्रकार का स्लीप डिसऑर्डर है। नींद में चलने के दौरान वो एक्टिविटी शामिल होती है, जिसके बारे में व्यक्ति को जागने के बाद कुछ याद नहीं रहता है (1)। जिन बच्चों में नींद में चलने की आदत होती है, वो सोने के कुछ घंटों के भीतर ही कुछ सेकंड या आधे घंटे तक के लिए कहीं भी चलने लग सकते हैं। इस दौरान अगर उन्हें जगाया जाए, तो उन्हें किसी बात का ठीक तरह से होश नहीं रहता है। इसे स्लीपवॉकिंग के अलावा, सोम्नामुलिज्म (somnambulism) भी कहते हैं। जो बच्चे इस समस्या से ग्रस्त होते हैं, उनमें से ज्यादातर बच्चे ऐसा कभी-कभार ही करते हैं। किशोरावस्था तक आते-आते यह समस्या या तो कम हो जाती है या पूरी तरह से ठीक हो जाती है (2)

अब जानते हैं कि बच्चों के नींद में चलने की समस्या गंभीर तो नहीं है।

बच्चों में यह समस्या कितनी आम है?

स्लीपवॉकिंग बच्चों में बहुत आम है। बच्चों में स्लीपवॉक की समस्या 6 से 12 साल की उम्र में शुरू हो सकती है (3)। हालांकि, कुछ लोगों को किशोरावस्था और वयस्कता में भी नींद में चलने की परेशानी हो सकती है। बहुत कम ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें वयस्कता में स्लीपवॉकिंग की समस्या शुरू होती है (2)

अब बारी आती है नींद में चलने के प्रकार के बारे में जानने की।

नींद में चलने की बीमारी के प्रकार

देखा जाए तो नींद में चलने की बीमारी के दो प्रकार है :

  • लाइट स्लीप वॉकिंग – इसमें बच्चा हल्की नींद में ही चलने लग सकता है। इसमें बच्चे के सोने के कुछ घंटे बाद ही बच्चा नींद में चलने लग सकता है।
  • डीप स्लीप वॉकिंग – यह सोने के काफी देर बाद हो सकता है। ऐसा आमतौर पर आधी रात के बाद या फिर तड़के के वक्त हो सकता है।

अब जानते हैं कि बच्चों को यह समस्या होने पर क्या लक्षण नजर आ सकते हैं।

नींद में चलने की बीमारी (स्लीपवॉकिंग) के लक्षण

सबसे सामान्य लक्षण है नींद में चलना, लेकिन कुछ बड़े बच्चों में नींद में चलने के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं (2) :

  • नींद में बड़बड़ाना।
  • नींद से जागने में परेशानी होना।
  • घबराहट महसूस होना।
  • नींद से जागने के बाद किसी बात की खबर न होना या कुछ याद न होना।
  • जब कोई बात करे, तो नींद में कोई जवाब न देना।
  • सोते-सोते उठकर बैठ जाना और एक ही तरह की हरकत बार-बार करना, जैसे – आंखों को रगड़ना या पहने हुए कपड़ों को खोलने व फाड़ने की कोशिश करना।

अब गौर करते हैं उन कारणों पर जिनके चलते यह समस्या होती है।

बच्चों में स्लीपवॉकिंग के कारण

स्लीपवॉकिंग वयस्कों की तुलना में बच्चों में ज्यादा है। अगर परिवार में किसी सदस्य को स्लीपवॉकिंग की समस्या रही है, तो यह बच्चे को भी हो सकती है। स्लीपवॉकिंग के कुछ अन्य कारण इस प्रकार हैं (2) :

  • नींद की कमी।
  • रात को सोने का तय समय न होना।
  • बीमारी या बुखार।
  • कुछ दवाइयों के कारण।
  • तनाव भी एक कारण हो सकता है।

अब जानते हैं कि नींद में चलने की आदत का पता कैसे चल सकता है।

नींद में चलने की बीमारी (स्लीपवॉकिंग) का निदान

अगर बात करें नींद में चलने की बीमारी के निदान की, तो यह बच्चे के व्यवहार के अनुसार डॉक्टर पता लगा सकते हैं जैसे :

  • डॉक्टर माता-पिता से पूछ सकते हैं कि उनके परिवार में किसी को यह समस्या रही है या नहीं।
  • बच्चे की सोने की आदत के बारे में पूछ सकते हैं।
  • बच्चे सोते वक्त किस तरह की हरकत करते हैं।
  • नींद से जागने के वक्त के बारे में पूछ सकते हैं।
  • अगर जरूरत पड़े, तो डॉक्टर नींद से जुड़ी अन्य समस्याओं को पता लगाने के लिए पोलीसोम्नोग्राम (polysomnogram) कराने की सलाह भी दे सकते हैं। इसका इस्तेमाल सिर्फ दुर्लभ मामलों में ही किया जाता है (4)

लेख के इस भाग में अब जानते हैं बच्चों में नींद में चलने के इलाज क्या हो सकते हैं।

बच्चों में नींद में चलने की बीमारी का इलाज

स्लीपवॉकिंग का इलाज करने की जरूरत नहीं होती है। नींद में चलने वाले बच्चों के लिए डॉक्टर बीच-बीच में बच्चों को जगाने का सुझाव दे सकते हैं। इसका मतलब यह है कि माता-पिता को डॉक्टर कह सकते हैं कि जब बच्चा नींद में चलता है, तो ठीक उससे पहले बच्चे को नींद से जगाया जाए। इससे उसकी समस्या कुछ कम हो सकती है। कुछ मामलों में डॉक्टर ऐसी दवा दे सकते हैं, जो उन्हें अच्छी तरह से सोने में मदद कर सके (2)

अब जानते हैं कि स्लीपवॉक से बचाव कैसे किया जा सकता है।

बच्चों में स्लीपवॉक से कैसे बचाव करें?

नीचे बताए गए तरीकों से बच्चों में स्लीपवॉक से बचाव या उसके जोखिम को कम किया जा सकता है (2) :

  • बच्चे के सोने से पहले उनके सोने वाले कमरे में शांत माहौल बनाया जाए।
  • ध्यान रहे उनके सोने का बेड आरामदायक हो।
  • कमरे का तापमान संतुलित हो, न ज्यादा गर्म और न ज्यादा ठंडा।
  • बच्चे को जल्दी सोने की आदत डलवाएं।
  • बच्चे के लिए एक नियमित सोने का समय बनाएं और हर रोज उसी वक्त उन्हें सुलाएं।
  • ध्यान रहे कि बच्चे को सोने से पहले ज्यादा पानी पीने को न दें।
  • सोने से पहले उन्हें बाथरूम जाने की आदत लगवाएं।

लेख के इस भाग में हम नींद में चलने वाले बच्चों की सुरक्षा से संबंधित जरूरी जानकारी दे रहे हैं।

बच्चों में नींद में चलने की बीमारी के चलते उनकी सुरक्षा के लिए टिप्स

नीचे जानिए नींद में चलने वाले बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी कुछ बातें (2) :

  • बच्चे को बंकर बेड पर न सुलाएं।
  • बच्चे के सोने के दौरान उसके आसपास साइड पिलो का उपयोग करें।
  • बच्चे के बेड के आसपास नुकीले चीजें न रखें।
  • घर में और बच्चे के रूम में सेफ्टी गेट्स का उपयोग करें।
  • घर के दरवाजे और खिड़की को अच्छी तरह से लॉक करके रखें।
  • बच्चे के रूम टेबल या खिलौनों को बिखरा न रहने दें।

जैसे कि लेख में हमने जानकारी दी कि बच्चों का नींद में चलना एक आम समस्या है। अगर वक्त रहते इसका समाधान निकाला जाए, तो परेशानी ठीक या कम हो सकती है। अगर किसी को भी अपने बच्चे में नींद में चलने की बीमारी के लक्षण दिखें, तो उसे अनदेखा न करें। नींद में चलने की आदत में सुधार के लिए डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह लें और नींद में चलने के कारण पर भी ध्यान दें। काउंसलिंग, दवा या कुछ उपाय करके बच्चे की नींद में चलने की आदत में सुधार हो सकता है।

संदर्भ (References) :

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