शिशुओं में कॉलिक (उदरशूल) के कारण व इलाज | Bacho Mein Colic

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डिलीवरी के बाद नन्ही-सी जान को हाथों में लेकर जो खुशी होती है, उसकी बराबरी कोई और सुख नहीं कर सकता। शिशु के पैदा होने के बाद उसकी किलकारियों और प्यारी-सी हरकतों से पूरे घर का माहौल खुशनुमा हो जाता है। ऐसे में अगर पूरे घर की रोनक ही रोने व चिड़चिड़ाने लगे, तो घरवालों का परेशान होना लाजमी है। बच्चे को घंटों रोता देखकर मां-बाप का कलेजा भी मुंह को आने लगता है। शिशुओं के रोने के पीछे मुख्य वजह कॉलिक यानी उदरशूल हो सकती है। कई माता-पिता इससे अंजान होते हैं। बस इसी वजह से मॉमजंक्शन के इस लेख में हम शिशुओं में उदरशूल क्या है, इसके लक्षण, कारण व बचाव जैसी कई महत्वपूर्ण जानकारियां दे रहे हैं।

चलिए, सबसे पहले यह जान लेते हैं कि कॉलिक व उदरशूल क्या है।

शिशुओं में कॉलिक (उदरशूल) क्या है?

शिशु का किसी अज्ञात कारण से घंटों रोना कॉलिक कहलाता है। एक अध्ययन के मुताबिक, करीब 20 प्रतिशत तक बच्चे कॉलिक से प्रभावित होते हैं। शिशु के प्रारंभिक समय से जुड़ी यह आम समस्या है, जिसमें बच्चा लगातार रोता है। हफ्ते में तीन दिन से अधिक दिन तक करीब तीन घंटे से ज्यादा रोने को कॉलिक के रूप में परिभाषित किया गया है। बच्चे के रोने का कारण जानने के बाद इस समस्या का हल निकाला जा सकता है। इन कारणों के बारे में लेख में आगे विस्तार से बताया गया है (1)

अब हम शिशुओं में उदरशूल व कॉलिक की समस्या शुरू होने और खत्म होने के संबंध में जानकारी दे रहे हैं।

शिशुओं में कॉलिक कब शुरू और खत्म होता है?

शिशुओं में कॉलिक की समस्या आमतौर पर तब शुरू होती है, जब बच्चा लगभग 3 हफ्ते का होता है। यह समस्या चौथे से पांचवें हफ्ते तक भी बढ़ सकती है। अधिकतर बच्चे 6 हफ्ते के अंदर थोड़े ठीक हो जाते हैं और 12वें हफ्ते में उनका रोना पूरी तरह से ठीक हो जाता है (2)। एनसीबीआई (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन) पर प्रकाशित एक शोध के मुताबिक, यह समस्या तीसरे से चौथे महीने में ठीक हो जाती है (1)

कॉलिक को किस तरह से पहचाना जाए यह बताने के लिए अब हम शिशुओं में कॉलिक के लक्षण के बारे में बता रहे हैं।

शिशुओं में कॉलिक के लक्षण

कॉलिक के दौरान बच्चे एक विशेष पैटर्न में रोते है। कॉलिक बच्चे स्वस्थ होते हैं,  भोजन भी करते हैं और अच्छी तरह से उनका विकास भी होता है। बस वो रोते अधिक हैं। अब ये किस तरह से वो रोते हैं व कॉलिक के लक्षण क्या है, वो हम नीचे बता रहे हैं (2) (3)

  • ऊंची आवाज में रोना या चीखना।
  • शांत न होना।
  • चेहरा लाल रंग का होना व मुंह के आसपास की त्वचा का पीला पड़ना।
  • पैरों को खींचना व उठाना।
  • आर्म्स को कड़ा व कठोर करना।
  • कमर को पीछे की ओर मोड़ना व आर्च बनाना।
  • मुट्ठी बंद कर लेना।
  • हर दिन लगभग एक ही समय पर रोना।
  • शिशुओं का खासकर शाम के समय चिड़चिड़ा होना।
  • पेट में सूजन होना।
  • मिनटों से लेकर घंटों तक रोना।
  • थकने पर चुप हो जाना व गैस या मल निकासी के बाद शांत होना।

आगे, शिशुओं में उदरशूल के कारणों पर हम चर्चा कर रहे हैं।

शिशुओं में उदरशूल के कारण

वर्षों की रिसर्च के बाद भी कॉलिक के सटीक कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाए हैं। शिशु को किसी प्रकार के दर्द, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, न्यूरोलॉजिकल या मनोसामाजिक विकारों की वजह से कॉलिक की समस्या होती है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। एक शोध में कहा गया है कि कॉलिक को शिशुओं का शारीरिक और मनोसामाजिक व्यवहार माना जाना सबसे बेहतर है (1)। शायद यही वजह है कि शिशुओं के कॉलिक के कारण को लेकर कोई निश्चित कारण नहीं है। ऐसे में हम भी उदरशूल के कुछ संभावित कारणों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं (2):

  • गैस की वजह से दर्द
  • भूख लगना।
  • ज्यादा दूध पी लेना।
  • किसी तरह के पदार्थ यानी फॉर्मूला मिल्क का सेवन या मां के दूध में मौजूद कुछ प्रोटीन को सहन न कर पाना।
  • कुछ चीजों के प्रति संवेदनशील होना।
  • भय, हताशा, या फिर उत्तेजना जैसी भावनाएं।

अन्य, संभावित कारण व जोखिम कारक (1):

  • शिशु में यह समस्या मां के अवसाद से भी जुड़ा हो सकती है।
  • शेकेन बेबी सिंड्रोम भी इसका कारण हो सकता है। बच्चे को जोर से हिलाने से होने वाली गंभीर अवस्था को शेकेन बेबी सिंड्रोम कहा जाता है।
  • स्तनपान को जल्दी बंद कर देना।
  • सामान्य कॉलोनी की अवधि से अधिक रोने की वजह नींद की कमी हो सकती है। इसके अलावा, एलर्जी संबंधी विकार भी हो सकता है।
  • पारिवारिक शिथिलता।
  • व्यवहार संबंधी समस्याएं आदि।

आगे हम शिशुओं में कॉलिक का इलाज बता रहे हैं।

शिशुओं में कॉलिक का इलाज

शिशुओं में कॉलिक का कोई सटीक कोई इलाज नहीं है (3)। यह समस्या कुछ समय बाद खुद-ब-खुद ठीक होने लगती है। फिर भी कॉलिक को लेकर डॉक्टर कुछ परामर्श दे सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार है (4)

  • हाइड्रोलाइजेट फॉर्मूला : साल 2012 में किए गए एक परीक्षण के मुताबिक, कॉलिक में हाइड्रोलाइजेट फॉर्मूला शिशुओं के दर्द या चिड़चिड़ेपन को दूर करने में मदद कर सकता है। इसका फायदा तभी होता है, जब बच्चे में रोने के अलावा अन्य कोई लक्षण नहीं हैं।
  • लैक्टोबैसिलस रेयूटेरा : इसे स्तनपान करने वाले शिशुओं के लिए सुरक्षित माना गया है। माना जाता है कि इसका सेवन करने से शिशुओं में रोने और चिड़चिड़ाने की समस्या 50% तक या इससे अधिक कम हो सकती है। वहीं दूसरी तरफ शिशुओं पर हुए दो अन्य परीक्षणों में लैक्टोबैसिलस रेयूटेरा का कोई प्रभाव नजर नहीं आया।

शिशुओं को कॉलिक से बचाने के लिए गाय का दूध न पिलाने व सिमेथिकोन (Simethicone) लेने की भी सलाह दी जाती है, लेकिन कॉलिक पर किए गए रिसर्च इस बात का समर्थन नहीं करते हैं।

लेख के अगले हिस्से में शिशुओं में उदरशूल को थोड़ा कम करने के लिए घरेलू उपाय के बारे में जानिए।

शिशुओं में उदरशूल के 10 घरेलू उपचार

कॉलिक व उदरशूल की वजह से शिशु काफी देर तक रोते हैं, इस दौरान कुछ उपायों को अपनाकर बच्चे को शांत किया जा सकता है। ये घरेलू उपाय कुछ इस प्रकार हैं (2) (3)

  1. शिशु को गोद में उठा लें। शिशु को होल्ड करने वाला बेबी बैग में कुछ देर लेकर उसे घुमा सकते हैं।
  2. शिशु को कपड़े व कंबल में लपेट लें।
  3. बच्चे को घुमाने ले जाएं।
  4. शिशु को पालने में रखें। बच्चे को अच्छा-सा म्यूजिक सुना सकते हैं।
  5. बच्चे के पेट पर हल्का गर्म तौलिया या गर्म पानी की बोतल रखने की कोशिश करें।
  6. जब शिशु जागा हुआ हो, तब उसे पेट के बल लिटाएं और उसके के पीठ को हल्के हाथों से रब करें।
  7. शिशु को लोरी गाकर सुनाएं या उससे बात करें।
  8. बच्चे को स्ट्रोलर में बैठाकर पार्क या घर के आसपास घुमाने ले जाएं।
  9. शिशु को गोद में इस तरह लें कि उसके पेट में बनी गैस निकल जाए। कई बार गैस की वजह बच्चों के पेट में दर्द होता है और वो रोते हैं।
  10. अगर शिशु तीन हफ्ते से बड़ा है, तो उसे झूला झुलाएं। इस दौरान शिशु के सिर को थोड़ा ऊंचा रखें।

अब हम कॉलिक की वजह से हो रही समस्या को अच्छे से संभालने और निपटने के लिए क्या कर सकते हैं, यह बता रहे हैं।

शिशुओं में कॉलिक से होने वाली परेशानी से कैसे निपटें?

शिशु में कॉलिक की वजह से बेशक माता-पिता और घर के अन्य सदस्य परेशान हो जाते हैं। खासकर, वह व्यक्ति जो शिशु का सारे दिन ख्याल रख रहा है। वह रोजाना बच्चे के रोने और चिल्लाने से परेशान हो सकता है। इस परेशानी से शिशुओं को संभाल रहे लोग कुछ इस तरह से निपट सकते हैं (3)

  • किसी दोस्त को मदद के लिए बुलाएं: शिशु के रोने से ज्यादा परेशान हो गए हैं, तो किसी दोस्त को मदद के लिए भी बुला सकते हैं। दोस्त बच्चे को चुप करवाने के साथ ही वह आपको सपोर्ट भी करेंगे, जिससे आपको अच्छा महसूस होगा।
  • परेशानी के बारे में बात करें: मन की बातों को बोलने से दिल भी हल्का होता है और परेशानी थोड़ी कम होने लगती है। इसी वजह से कॉलिक की वजह से दुखी लोगों को इस बारे में दोस्त, घरवालों या डॉक्टर से बात करनी चाहिए। ऐसा करने से मन का बोझ थोड़ा कम होगा और अगर आप डॉक्टर से इस बारे में बात कर रहे हैं, तो वह समस्या से निपटने के कुछ अन्य तरीकों के बारे में भी सलाह दे सकते हैं।
  • खुद को दोष न दें: कुछ लोग शिशु के कॉलिक से इतने परेशान हो जाते हैं कि वो इसकी वजह खुद को मानने लगते हैं। बच्चे के रोने के पीछे किसी का दोष नहीं होता है, इसलिए ऐसा बिल्कुल भी न सोचें। हमेशा पॉजिटिव रहें।
  • गहरी सांसें लें: परेशानी के समय गहरी सांस लेना काफी कारगर होता है। इससे अच्छे विचारों का संचार होता है और व्यक्ति सकारात्मक रहता है।

चलिए, अब जानते हैं कि कॉलिक के दौरान डॉक्टर से कब संपर्क किया जाना चाहिए।

डॉक्टर के पास कब जाएं?

घंटों बच्चे का रोना और शांत न होने वाली कॉलिक समस्या के दौरान डॉक्टर से कब संपर्क किया जाना चाहिए, यह हम नीचे बता रहे हैं (2)

  • शिशु का बहुत अधिक रोना और उसे शांत करने में असमर्थ होना।
  • 3 महीने बाद भी अगर शिशु को कॉलिक है।
  • अगर शिशु के व्यवहार व रोने के तरीके में अचानक बदलाव आया हो।
  • शिशु को बुखार, उल्टी, दस्त, मल में खून या पेट की अन्य समस्या हो।

अब लेख के आखिरी हिस्से में हम पाठकों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले कुछ सवालों के जवाब दे रहे हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या उदरशूल नुकसानदेह है?

नहीं, कॉलिक सामान्य होता है। इसके कारण बच्चे को किसी तरह की हानि नहीं होती है, इसलिए कॉलिक को नुकसानदेह नहीं माना जा सकता है (5)

उदरशूल और सामान्य रोने में क्या अंतर है?

कोलिक में शिशु अधिक रोता है, जो सामान्य रोने से भिन्न होता है। कॉलिक के शुरू होने और खत्म होने का एक ही समय होता है। साथ ही बच्चा लगातार तीन घंटे तक रोता रहता है, जबकि सामान्य रूप से रोते समय बच्चा कुछ समय बाद चुप हो जाता है।

अगर मैं शिशु को स्तनपान करा रही हूं, तो क्या मेरे आहार की वजह से शिशु को कॉलिक हो सकता है?

मां के आहार से शिशु को कॉलिक होता है या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। फिर भी कुछ अध्ययन में ऐसा माना गया है कि स्तनपान कराने वाली मां जो खाती है, उससे शिशु में कॉलिक जैसी समस्या हो सकती है (1)। मां के आहार जिसमें क्रूसिफेरस (Cruciferous) सब्जियां (जैसे फूलगोभी, गोभी, ब्रोकली और ब्रसेल्स स्प्राउट्स) शामिल होती हैं, वो बच्चे के कॉलिक या इसके बढ़ने का कारण बन सकती है। साथ ही गाय का दूध, प्याज और चॉकलेट को भी कॉलिक से संबंधित माना जाता है। कई बाल रोग विशेषज्ञ स्तनपान कराने वाली माओं को अपने खाने में क्रूसिफेरस सब्जियों को कम करने की सलाह देते हैं, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि यह फायदेमंद होता है या नहीं (6)

कॉलिक के बारे में विस्तार से हम इस लेख में बता चुके, जिससे आप यह तो समझ गए होंगे कि यह कोई बीमारी नहीं है। साथ ही यह किसी तरह से शिशु को नुकसान नहीं पहुंचाती। बस संयम के साथ शिशु को संभालने से वक्त के साथ शिशुओं में कॉलिक दूर हो जाता है। ध्यान रखें कि अगर शिशु तीन घंटे से भी अधिक समय तक रो रहा है और साथ ही उसे बुखार भी है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। बच्चों के मामले में लापरवाही करना गंभीर समस्या को उत्पन्न कर सकता है। शिशु में कॉलिक के संबंध में अगर आपके जहन में इस लेख के पढ़ने के बाद भी कुछ सवाल हैं, तो उसे नीचे दिए कमेंट बॉक्स के जरिए हम तक पहुंचा सकते हैं। हम शोध के आधार पर आपके सवाल का जल्द से जल्द जवाब देने का प्रयास करेंगे।

संदर्भ (References):

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