बच्चों में डिस्लेक्सिया रोग क्या है? कारण, लक्षण व इलाज | Dyslexia In Children In Hindi

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लगभग तीन से पांच साल की उम्र में बच्चे स्कूल जाना शुरू कर देते हैं। इनमें से कुछ बच्चे पढ़ाई-लिखाई से लेकर नई चीजें आसानी से सीखने लगते हैं। वहीं कई बच्चे इस तरह की गतिविधियों में धीमी गति से विकास करते हैं। इसके विपरीत कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जो सीखने-पढ़ने और नई चीजों को याद रखने में अधिक कठिनाई महसूस करते हैं। नई चीजों को सीखने और याद रखने में आने वाली इस परेशानी का एक बड़ा कारण डिस्लेक्सिया रोग भी हो सकता है, जिसे कई बार बच्चों के माता-पिता नहीं समझ पाते हैं। यही वजह है कि मॉमजंक्शन के इस लेख में हम बच्चों में डिस्लेक्सिया रोग क्या है, यह समझाने के साथ ही इसके कारण, लक्षण व उपचार बताने जा रहे हैं।

तो आइए सबसे पहले हम डिस्लेक्सिया रोग के बारे में थोड़ा जान लेते हैं।

डिस्लेक्सिया रोग क्या है? | Dyslexia In Children In Hindi

डिस्लेक्सिया एक न्यूरोलॉजिकल (मस्तिष्क व तंत्रिकाओं को प्रभावित करने वाली) स्थिति है (1)। इसे डेवलेपमेंटल रीडिंग डिसऑर्डर भी कहते हैं। यह सीखने और पढ़ने से जुड़ी एक समस्या है। इसके होने पर मस्तिष्क कुछ प्रतीकों या चिन्हों की न तो सही पहचान कर पाता है और न ही उन्हें याद रख पाता है (2)। यानी इसके कारण बच्चे अक्षर पहचानने, लिखने और बोलने में गलती कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर बच्चे सीधे अक्षर को उल्टा लिख सकते हैं, जैसे अंग्रेजी के छोटे लेटर में ‘b’ व ‘d’ लिखते समय उलझन महसूस कर सकते हैं।

अब बात करते हैं डिस्लेक्सिया से शिकार होने वाले बच्चों का आंकड़ों कितना गंभीर है।

भारतीय बच्चों में डिस्लेक्सिया कितना आम है?

भारतीय बच्चों में डिस्लेक्सिया होना आम माना जा सकता है। यह बात एनसीबीआई (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन) पर प्रकाशित एक शोध से स्पष्ट होती है। शोध में माना गया है कि दक्षिण भारत में डिस्लेक्सिया जैसे स्पेशफिक लर्निंग डिसऑर्डर के मामले 16.49 फीसदी देखे गए। इसमें 12.57 फीसदी बच्चों में पढ़ने, 15.6 फीसदी बच्चों में लिखने और 9.93 फीसदी बच्चों में गणित से जुड़ी परेशानी देखी गई। साथ ही यह भी पाया गया है कि यह समस्या लड़कियों के मुकाबले लड़कों को अधिक प्रभावित करती है (3)

यहां अब हम डिस्लेक्सिया के प्रकार के बारे में बताएंगे।

बच्चों में डिस्लेक्सिया के प्रकार

बच्चों में डिस्लेक्सिया के कई प्रकार हो सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं (4):

1. शब्दों की अवस्था का डिस्लेक्सिया (लेटर पोजिशन डिस्लेक्सिया)

इस प्रकार के डिल्सेक्सिया में बच्चे शब्दों को पढ़ तो पाते हैं, लेकिन उनकी स्थिति की सही पहचान कर पाने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर बच्चे को अगर कोई शब्द लिखने के लिए कहा जाए तो बच्चा उस शब्द में अक्षरों को आगे-पीछे लिख सकता है। कुछ अंग्रेजी शब्दों के उदाहरण के तौर पर ‘Cloud’ को ‘Could’ लिखना, ‘Fried’ को ‘Fired’ लिखना या ‘Dairy’ को ‘Diary’ लिखना आदि (4)। इसे प्राथमिक डिस्लेक्सिया का लक्षण माना जाता है (5)

2. अटेंशनल डिस्लेक्सिया

अटेंशनल डिस्लेक्सिया की स्थिति में बच्चा अक्षरों व शब्दों की सही पहचान कर सकता है। मगर, अगले शब्द के अक्षर पर उलझन महसूस कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, बच्चा ‘Fig Tree’ को ‘ Fig Free’ या ‘Tie Tree’ लिख सकता है (6)

3. लेटर आइडेंटिटी डिस्लेक्सिया (अक्षर की पहचान न कर पाना)

इस प्रकार के डिस्लेक्सिया में बच्चे एक सामान दिखाई देने वाले अक्षरों को पहचानने और उनका उच्चारण (एनकोड) करने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, ‘TRIAL’ को ‘TRAIL’ पढ़ सकते हैं और ‘JUGDE’ को ‘JUDGE’ पढ़ सकते हैं (7)

4. नेगलेक्ट डिस्लेक्सिया

नेगलेक्ट डिस्लेक्सिया बच्चे के पढ़ने की क्षमता प्रभावित करता है। इसके कारण बच्चा पढ़ते समय गलतियां कर सकता है। बच्चा किसी शब्द को पढ़ते समय शुरूआती अक्षरों को पढ़ना भूल सकता है या उस शब्द के उच्चारण में नए अक्षर जोड़ सकता है। उदाहरण के तौर पर बच्चा ‘Lend’ को ‘Blend’ पढ़ सकता है (8)

5. ऑर्थोग्राफिक इनपुट बफर डिस्लेक्सिया या दृश्य डिस्लेक्सिया

इस प्रकार के डिस्लेक्सिया के कारण बच्चा दिखने वाले सामान शब्द के आधार पर शब्दों को पढ़ने लगता है। इसकी वजह से बच्चा शब्दों को पढ़ते समय उसमे नए शब्द जोड़ सकता है या उनमें किसी शब्द को न पढ़ने की गलतियां करने लग सकता है (4)

6. सरफेस डिस्लेक्सिया

सरफेस डिस्लेक्सिया में बच्चे को शाब्दिक ज्ञान की कमी होती है। इस वजह से बच्चा बार-बार पढ़ने वाले शब्दों का उच्चारण सही से कर सकता है, लेकिन उस शब्द के जैसा मिलता-जुलता शब्द देखने पर उसका उच्चारण गलत कर सकता है (4)

7. फोनलाजिकल डिस्लेक्सिया (स्वरविज्ञान संबंधी डिस्लेक्सिया)

इस प्रकार का डिस्लेक्सिया होने पर बच्चे को एक जैसे दिखने वाले दूसरे शब्दों को पढ़ने व लिखने में कठिनाई हो सकती है, उदाहरण के तौर पर अंग्रेजी का ‘p’ व ‘b’ शब्द। क्योंकि इस तरह के शब्द एक-दूसरे के उल्टे प्रतिबिंब को दर्शाते हैं (4)

8. डीप डिस्लेक्सिया

बच्चों में डीप डिस्लेक्सिया सिर की चोट, स्ट्रोक, बीमारी या किसी ऑपरेशन के कारण हो सकता है। इसके कारण बच्चा शब्दार्थ या वाक्य का प्रतिस्थापन (किसी वस्तु के साथ उसके सही कार्य को दर्शाना) करने में कठिनाई महसूस कर सकता है। उदाहरण के तौर पर बच्चा ‘कुत्ता’ पढ़ सकता है, लेकिन वह ‘भौंकता है’ या ‘म्याऊं करती है’, इसका चयन करने में असमर्थ हो सकता है। इसी तरह बच्चा नींबू खट्टा होता है या नमकीन होता है, यह भी बताने में असमर्थ हो सकता है (4)

9. सिमेंटिक ऐक्सेस डिस्लेक्सिया

सिमेंटिक ऐक्सेस डिस्लेक्सिया की स्थिति में बच्चे के शब्दों को याद रखने की क्षमता (शब्दावली) और ध्यान लगाने की क्षमता कम हो सकती है। इसके कारण पढ़ते समय बच्चे का ध्यान केंद्र से भटक सकता है और बच्चा वाक्यों का अर्थ स्पष्ट रूप से समझने में असमर्थ हो सकता है। इस डिस्लेक्सिया से ग्रसित बच्चे नए शब्दों, आकार में छोटे या लिखावट में बड़े शब्दों को पढ़ने में गलतियां कर सकते हैं (4)

इस भाग में हम उन वजहों को जानेंगे, जो बच्चों में डिस्लेक्सिया का कारण मानी जाती हैं।

बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के कारण

जैसा लेख में बता चुके हैं कि डिस्लेक्सिया एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जिसका एक कारण आनुवंशिकता भी हो सकता है। इसके अलावा बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के कारण क्या-क्या हो सकते हैं, इसकी पूरी जानकारी नीचे विस्तार से पढ़ सकते हैं (5)

  • कॉर्पस कॉलोसम (जन्मजात मस्तिष्क दोष- मस्तिष्क के दाएं और बाएं पक्षों को जोड़ने व इनमें संचार करने वाली संरचना में गड़बड़ी)।
  • मस्तिष्क की चोट, स्ट्रोक व अन्य आघात)।
  • जन्म के दौरान बच्चे का कम वजन होना (1500 ग्राम से कम होना)।
  • पुरुष होना (अध्ययन के अनुसार महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में डिस्लेक्सिया होने का जोखिम अधिक होता है)।
  • बच्चे का देर से बोलना।
  • समय से पहले शिशु का जन्म होना (प्री मैच्योरिटी)।

लेख के अगले भाग में अब हम किन बच्चों में डिस्लेक्सिया का खतरा अधिक होता है, यह बताएंगे।

डिस्लेक्सिया होने का जोखिम किन बच्चों में ज्यादा होता है?

कुछ विशेष स्थितियां बच्चों में डिस्लेक्सिया होने का जोखिम बढ़ा सकती हैं। यह स्थितियां कुछ इस प्रकार हैं (5):

  • डिस्लेक्सिया का पारिवारिक इतिहास
  • भाषा का विकास होने में देरी (बच्चे का 3 से 4 साल में बोलना शुरू करना)

यहां अब हम बच्चों में डिस्लेक्सिया के लक्षणों के बारे में जानकारी देंगे।

बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के लक्षण

जैसा कि लेख में पहले ही बताया जा चुका है कि बच्चों में डिस्लेक्सियां पढ़ने-लिखने व सीखने संबंधी एक समस्या है। ऐसे में आमतौर पर स्कूल जाना शुरू करने के बाद ही बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के लक्षण पहचाने जा सकते हैं। यहां हम उन लक्षणों को उम्रवार बताने का प्रयास कर रहे हैं।

स्कूल जाने की उम्र के पहले के लक्षण (3 साल से छोटे बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के लक्षण) कुछ इस प्रकार हैं (9) :

  • शब्दों को समझने में परेशानी होना
  • नई चीजों को सीखने और समझने में मुश्किल होना
  • कहानी या कविताएं समझने और याद रखने में दिक्कत महसूस होना
  • ध्यान देने में कठिनाई होना
  • ध्वनि सुनने का खराब स्तर

स्कूल जाने की उम्र में दिखाई देने वाले लक्षण (3 साल से बड़े बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के लक्षण) कुछ इस प्रकार हो सकते हैं (5) :

  • पढ़ना सीखने में कठिनाई होना
  • सोमेटिक कंप्लेंट (शारीरिक समस्याएं जैसे- दर्द होना, कमजोरी होना या सांस लेने में परेशानी होना)
  • स्कूल फोबिया (स्कूल से डर लगना)

किशोरावस्था व इसके बाद के चरण की उम्र में दिखाई देने वाले लक्षण (13 वर्ष व इससे बड़ी उम्र के बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के लक्षण) इस प्रकार हैं (10) :

  • पढ़ने की गति बहुत धीमी होना
  • अलग-अलग अक्षरों को जोड़ने में परेशानी होना
  • किसी शब्द को पढ़ने में कठिनाई होने पर वहां पर आसान शब्द का इस्तेमाल करना
  • शब्दों का गलत उच्चारण करना
  • लोगों के सामने कुछ पढ़ने में कठिनाई होना
  • नई भाषा सीखने में परेशानी होना

अब आगे हम डिस्लेक्सिया से बचाव के तरीके जानेंगे।

क्या डिस्लेक्सिया होने से रोका जा सकता है?

जैसा कि अध्ययनों से पता चलता है कि डिस्लेक्सिया जीन व आनुवंशिक स्थिति होती है। इस आधार पर किसी बच्चे में डिस्लेक्सिया होने से नहीं रोका जा सकता है। हां, बच्चे के शुरूआती लक्षणों की पहचान करके इसके लक्षणों में कुछ हद तक सुधार लाया जा सकता है। एनसीबीआई पर प्रकाशिक एक अध्ययन के मुताबिक, बच्चों को पांच साल की उम्र या इससे छोटी उम्र में किंडरगार्डन (प्ले वे स्कूल) में भेजने से उनके लक्षणों की शुरुआती पहचान की जा सकती है (5)

वहीं शुरूआती लक्षणों की पहचान करके, बच्चे को इस तरह के स्कूल या कार्यक्रम में शामिल किया जा सकता है, जहां पर निम्नलिखित गतिविधियों की मदद से बच्चे की सहायता की जा सकती है (10)

  • खेल-खेल में बच्चे में भाषा का विकास करना।
  • कविताओं के रूप में बच्चे को चीजे सीखने व याद रखने में मदद करना।
  • ताली की धुन पर बच्चे को शब्दों व अक्षरों के उच्चारण याद कराना।
  • चित्रों के जरिए किसी बात को समझाना या स्पष्ट करना।

अब यहां हम बच्चों में डिस्लेक्सिया की जांच और उसकी पुष्टि के लिए अपनाए जाने वाले तरीके जानेंगे।

बच्चों में डिस्लेक्सिया का निदान कैसे होता है?

वर्तमान में बच्चों में डिस्लेक्सिया का निदान करने के लिए किसी तरह के रक्त परीक्षण या मस्तिष्क इमेजिंग टेस्ट का विकल्प उपल्बध नहीं है। इस वजह से इसका निदान करने के लिए बच्चे के लक्षणों की निगरानी की जाती है। हेल्थ एक्सपर्ट बच्चे के पढ़ने-लिखने के तरीके व व्यवहार का आंकलन करके इसका पता लगा सकते हैं (5)। इसके लिए किस तरह की स्थितियों पर निगरानी रखी जाती है, यह नीचे पढ़ सकते हैं (2):

  • बच्चे में मौजूद भावनात्मक विकार को समझना।
  • बच्चे की कमजोर बौद्धिक क्षमता को परखना।
  • मस्तिष्क से जुड़ी समस्याएं और रोग की पहचान करना।
  • बच्चे को मिली सामाजिक शिक्षा और परवरिश का स्तर जांचना।
  • पारिवारिक इतिहास का पता लगाना।
  • बच्चे में तंत्रिका संबंधी विकार को समझने के लिए जांच करना।

बच्चों में डिस्लेक्सिया का उपचार कैसे किया जाता है, आइए अब हम इस बारे में जान लेते हैं।

बच्चों में डिस्लेक्सिया का इलाज

वर्तमान समय में बच्चों में डिस्लेक्सिया का इलाज करने के तरीके उपलब्ध नहीं है। हालांकि, कई तरह के प्रबंधन करके डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों में सीखने, समझने व अन्य कौशल विकास को बढ़ावा देने में मदद की जा सकती है। इसके लिए निम्नलिखित विकल्पों की अपनाया जा सकता है।

  • फोनिक्स इंस्ट्रक्शन (स्वरविज्ञान) : बच्चे को फोनिक्स इंस्ट्रक्शन देना (किसी खास ध्वनि के जरिए दिया जाने वाला निर्देश) डिस्लेक्सिया की समस्या में मदद कर सकता है (10)। इस तरह के कार्यक्रम में बच्चों को ध्वनियों में अक्षरों को बदलना सिखाया जाता है या उन्हें ध्वनि के आधार पर अक्षरों की पहचान करनी सिखाई जाती है।
  • मनोचिकित्सक उपचार : अगर बच्चे में डिस्लेक्सिया के साथ ही चिंता या अवसाद के भी लक्षण हैं तो इसके लिए मनोवैज्ञानिक उपचार का सहारा लिया जा सकता है (10)
  • दवाएं लेना : इसके अलावा, अगर किसी बच्चे में इन लक्षणों के अलावा अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ध्यान की कमी और अत्यधिक सक्रियता की बीमारी) है तो ऐसी स्थिति में मनोचिकित्सक उपचार के साथ ही दवाओं की भी खुराक दी सकती है (10)
  • बच्चे को अतिरिक्त शिक्षण सहायता देना : इसके तहत बच्चे को निजी या व्यक्तिगत तौर पर ट्यूशन पढ़ा सकते हैं। साथ ही बच्चे को स्पेशल डे क्लास के लिए भी भेजा जा सकता है (2)
  • सकारात्मक स्तर बढ़ाना : डिस्लेक्सिया से ग्रसित बच्चों का आत्मसम्मान कम हो सकता है। जिसे बढ़ाने में सकारात्मक व्यवहार उनकी मदद कर सकता है। इसके लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श की सहायता भी ले सकते हैं (2)

अंत में जानिए बच्चों में डिस्लेक्सिया से होने वाली जटिलताएं क्या होती हैं।

बच्चों में डिस्लेक्सिया से होने वाली जटिलतायें

बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के कारण निम्नलिखित जटिलाताएं हो सकती है (2)

  • बच्चों में डिस्लेक्सिया का होना सीधे तौर पर उनके मानसिक ज्ञान को कम कर सकता है। इस वजह से भविष्य में बच्चे को आर्थिक हानि का भी सामान करना पड़ सकता है।
  • बच्चे के व्यवहार के कारण उसे स्कूल में परेशानियां हो सकती हैं।
  • बच्चे का आत्मसम्मान कम हो सकता है।
  • बड़े होने पर भी बच्चे में पढ़ने की समस्या बनी रह सकती है।

इस लेख के जरिए आपने यह जाना कि बच्चों में डिस्लेक्सिया होने के कारण किस तरह की समस्याएं हो सकती हैं। साथ ही यहां आपको इसके निदान, लक्षण और निवारण संबंधी बातें भी जानने को मिलीं। ऐसे में हम उम्मीद करते हैं कि लेख में दिए डिस्लेक्सिया से बचाव के तरीके काफी हद तक बच्चों के विकास को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों को सामाजिक तौर पर भी अधिक देखभाल की जरूरत होती है। इसलिए ऐसे बच्चों में जितना संभव हो, मनोबल बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वह बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे। बच्चों से जुड़ी ऐसी ही अन्य समस्याओं के बारे में जानने के लिए पढ़ते रहें मॉमजंक्शन।

संदर्भ (References):