छोटे बच्चों को गुदगुदी करना क्यों हानिकारक है? | Bachoo Ko Gudgudi (Tickling) Karne Ke Nuksan

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छोटे बच्चों को संभालना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। खासकर तब जब बच्चा अपने आसपास के लोगों और चीजों को पहचानना शुरू कर देता है। ऐसे में बच्चे सिर्फ जाने-पहचाने लोगों के साथ ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे में लोग अक्सर बच्चे के साथ खेलने और उन्हें अपने पास बुलाने के लिए हंसाने की कोशिश करते रहते हैं। इस दौरान कई बार वे गुदगुदी का सहारा लेते हैं। गुदगुदी लगाते ही अक्सर बच्चे हंस पड़ते हैं, लेकिन शायद ही किसी ने इस विषय पर गौर किया होगा कि बच्चे को गुदगुदी करना सही है या नहीं। यही वजह है कि मॉमजंक्शन के इस लेख में हम बच्चों को गुदगुदी करने से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दे रहे हैं। तो बच्चे को गुदगुदी करना सुरक्षित है या नहीं, यह जानने के लिए लेख को अंत तक पढ़ें।

पढ़ना शुरू करें और जानें कि बच्चों को गुदगुदी कर सकते है या नहीं।

क्या छोटे बच्चे को गुदगुदी करना सही है?

गुदगुदी शरीर में महसूस होने वाली एक सनसनी है, जो शरीर के किसी खास अंग को या किसी भी अंग को छूने से हो सकती है। ये दो तरह के हो सकते हैं, नाइस्मिसिस (Knismesis- अच्छा महसूस होने वाला) और गार्गलेसिस (Gargalesis-तेज महसूस होने वाला) (1)। वहीं, छोटे बच्चों को गुदगुदी से जुड़े विषय की बात की जाए, तो कई सालों से मां और शिशु के रिश्ते को मजबूत करने के लिए गुदगुदी का सहारा लिया जाता रहा है (2)। माना जाता है कि गुदगुदी मां और बच्चे के बीच व्यवहार बनाने और बातचीत करने का भी एक जरिया हो सकता है (3)। हालांकि, गुदगुदी को अच्छे और दर्द के अनुभव दोनों से जुड़ा हुआ पाया गया है (4)। ऐसे में छोटे बच्चों को अगर हल्की-फुल्की गुदगुदी की जाए, तो यह उनके लिए बेहतर अनुभव हो सकता है (5)। वहीं, अगर बहुत ज्यादा गुदगुदी की जाए, तो यह बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकती है। गुदगुदी से बच्चे को क्या नुकसान हो सकते हैं, इसकी जानकारी लेख में आगे दी गई है।

बच्चों को गुदगुदी करने से होने वाली समस्याएं | Bachoo Ko Gudgudi Karne Ke Nuksan

4 माह से छोटे बच्चे को हंसी नहीं आ सकती है। चार महीने तक शिशु हंसने की कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। वहीं शिशु छः माह के होने तक हंसने की प्रतिक्रिया व्यक्त करने लग सकते हैं (6)। ऐसे में बेहतर है जब बच्चा बड़ा हो जाए या चीजों को समझने लगे तो ही उन्हें खिलाने के लिए थोड़ी-बहुत गुदगुदी कर सकते हैं। हालांकि, ध्यान न रखने से इसके कुछ नुकसान भी हो सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं:

1. दर्द का अनुभव होना

शोध के अनुसार, जो गुदगुदी अपने आप होती है, वो बाहरी रूप से गुदगुदी करने की तुलना में कम होती है (7)। वहीं, हम पहले ही जानकारी दे चुके हैं कि गुदगुदी का अनुभव दर्द से भी जुड़ा है (4)। ऐसे में यह मान सकते हैं कि जोर से शिशु को गुदगुदी करने से हो सकता है उन्हें अच्छा महसूस न हो। साथ ही उन्हें गुदगुदी करने वाले अंग में या शरीर में दर्द की समस्या भी हो सकती है।

2. हिचकी आना

गुदगुदी बच्चे के हिचकी (Singultus) आने का कारण बन सकती है (8)। वहीं, हिचकी से बच्चे को असुविधा महसूस हो सकती है, जिसे वे बोलकर व्यक्त नहीं कर सकते हैं। ऐसे में माता-पिता और घर के अन्य सदस्यों को शिशु की सुविधा को समझने और ध्यान में रखने की आवश्यकता है। बेहतर है गुदगुदी करने के अलावा, शिशु के साथ खेलने के अन्य तरीकों को अपनाया जाए।

3. असुविधा महसूस होना

गुदगुदी के दौरान हंसी की प्रक्रिया अपने आप होती है, इसलिए बच्चे अपनी हंसी भी नहीं रोक पाते हैं। शिशु अपनी बातों को बोल भी नहीं पाते हैं, जिस कारण वे गुदगुदी करने से मना भी नहीं कर पाते हैं। ऐसे में लोगों को लगता है कि गुदगुदी करने से बच्चा अच्छा महसूस कर रहा है और वे उसे गुदगुदी करना जारी रख सकते हैं। जबकि, वो अपनी बातों को व्यक्त नहीं कर पाते और अपनी असुविधा नहीं बता पाते हैं। इसलिए कई बार गुदगुदी के दौरान शिशु चिड़चिड़े हो सकते हैं या रोने भी लग सकते हैं।

4. चोट का जोखिम

शिशु को हंसाने या उन्हें अच्छा महसूस कराने के लिए व्यक्ति उन्हें लगातार गुदगुदी करते हैं। जिसका परिणाम, बच्चे थके हुए महसूस कर सकते हैं। इसके अलावा, गुदगुदी के दौरान शिशु अपने अंगों को जोर से झटक सकते हैं और इसी हड़बड़ी में उनके बाहरी या अंदरूनी अंगों में चोट भी लग सकती है। शिशु के अंग बहुत ही कोमल और नाजुक होते हैं, इसलिए चोट के जोखिम से बचाने के लिए बेहतर है उन्हें गुदगुदी न करें। उनके साथ खेलने के अन्य विकल्प चुनें।

अब पढ़ें बच्चों में गुदगुदी करने से जुड़े कुछ मिथक।

बच्चों के विकास और गुदगुदी से संबंधित मिथक

गुदगुदी करने से हंसी की प्रक्रिया तुरंत होती है, क्योंकि, इस दौरान बच्चा जोर से हंसने से लेकर कई बार रोने की भी प्रतिक्रिया कर सकता है। वहीं, बच्चे की प्रतिक्रिया के आधार पर लोगों में बच्चों को गुदगुदी करने से संबंधित कई मिथक फैले हुए हैं। अक्सर लोगों को लगता है कि गुदगुदी करना बच्चे के लिए अच्छा होता है, तो आइए जानें इनका सचः

1. गुदगुदी से बच्चे को बोलने में मदद मिलती है।

कुछ लोगों का मानना है कि गुदगुदी करने से बच्चे का बोलना जल्दी शुरू हो सकता है। कई बार बच्चे का डायपर बदलते समय या उसके साथ खेलने के लिए भी माता-पिता गुदगुदी का सहारा लेते हैं। दरअसल, बच्चे के पेट या गर्दन पर हल्की गुदगुदी करते समय अगर बच्चे से बात की जाए, तो इससे बच्चे के बोलने की गतिविधियों (Vocalize) को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। वहीं, कुछ लोग बच्चे के साथ खेलते हुए या उन्हें गुदगुदी लगाते वक्त कविता या गाना सुनाते हैं, जो बच्चे के लिए खेलने का एक इशारा होता है। बच्चे इस तरह की गतिविधियों पर तेजी से आकर्षित हो सकते हैं और वह खेलने के लिए उत्साहित हो सकते हैं (9)

इससे यह पता चलता है कि बच्चे ऐसी गतिविधियों के प्रति जल्दी आकर्षित हो जाते हैं। साथ ही इससे उन्हें खेलने और हाथ-पैर हिलाने-डुलाने में मदद मिल सकती है। देखा जाए, तो इस दौरान बच्चे ध्वनियों के प्रति ध्यान देते हैं। इसलिए ऐसा सोचना कि गुदगुदी से बच्चे को बोलने में मदद मिलती है यह मात्र एक मिथक माना जा सकता है।

2. गुदगुदी करने से बच्चे में हकलाने की आदत पड़ सकती है।

अक्सर परिवार के बुजुर्गों को ऐसा कहते हुए सुना होगा कि बच्चे को गुदगुदी करने से उसमें हकलाने की समस्या हो सकती है (10)। हालांकि, इस विषय में वैज्ञानिक शोध का अभाव है। ऐसे में इसे मात्र एक मिथक ही माना जा सकता है। हकलाने की स्थिति की बात करें, तो आमतौर पर यह स्पीच डिसऑर्डर है, जिसके कारण बच्चा रुक-रुक कर शब्दों को बोलता है। इन रुकावटों को डिस्फ्लुएन्सिस (Disfluencies – बोलने की समस्या) कहा जाता है। इसके साथ कुछ अन्य लक्षण भी हो सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं (11):

  • शब्द या वाक्यों का दोहराना।
  • किसी एक ही अक्षर को लंबा खींचना।
  • बोलते हुए अचानक रुक जाना।
  • हकलाने के साथ ही सिर का हिलाना, पलकों का तेजी से झपकाना या होंठ कांपना।

3. गुदगुदी करना बच्चों के लिए एक बेहतरीन एक्सरसाइज/ एक्टिविटी है।

अक्सर लोग यह समझते हैं कि गुदगुदी करना बच्चे के लिए एक्सरसाइज हो सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह गलत भी नहीं है, क्योंकि बच्चे के पैर में गुदगुदी करने से वो पैर को हिलाना-डुलाना या उठाना सीखते हैं (9)। ऐसे में इसे एक तरह का एक्सरसाइज माना जा सकता है। इसलिए यह पूरी तरह से मिथक नहीं है, लेकिन ध्यान रहे बच्चे को एक्सरसाइज/ एक्टिविटी कराने के कई अलग तरीके भी हैं।

ऐसे में बेहतर है गुदगुदी के बजाय अन्य विकल्पों का सहारा लिया जाए, क्योंकि हर बार इस तरह की प्रक्रिया पर जरूरी नहीं कि बच्चे आनंद ही लें। साथ ही बहुत ज्यादा गुदगुदी करने से बच्चे के पेट में दर्द हो सकता है। दरअसल, गुदगुदी से बच्चे को हिचकियां भी आ सकती हैं और इससे उन्हें असुविधा हो सकती है (8)। आगे जानिए गुदगुदी के अलावा बच्चे से बॉन्ड मजबूत करने के कुछ अन्य तरीके।

अंत में हम बच्चे से रिश्ता मजबूत बनाने के लिए कुछ अन्य तरीके बता रहे हैं।

बच्चे से बॉन्ड मजबूत करने के अन्य तरीके

छोटे बच्चों से मजबूत रिश्ता बनाने के लिए कई अन्य उपाय काम आ सकते हैं। इसलिए गुदगुदी के बजाय आप अपने बच्चे के साथ बॉन्ड बनाने के लिए यहां बताए गए अन्य तरीके आजमा सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं:

  • बच्चे के त्वचा को प्यार भरा स्पर्श दें। उनके बालों और चेहरे को सहला सकते हैं।
  • उसके रोने, हंसने या किसी भी तरह की हरकत पर उसे प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
  • बच्चे को गोद में लेकर घूमा-फिरा सकते हैं।
  • हंसते हुए धीमे-धीमे स्वर में बात करके भी माता-पिता बच्चे के साथ अपना रिश्ता मजबूत कर सकते हैं।
  • बच्चे को कविता या गाना गुनगुना कर सुना सकते हैं।
  • बात करते समय या उसके साथ खेलते हुए उससे नजरें मिलाएं। आंखों के इशारे से उन्हें प्रतिक्रिया दें।

तो उम्मीद करते हैं कि अगली बार किसी बच्चे को गुदगुदी करते समय आप लेख में बताई गई बातों का जरूर ध्यान रखेंगे। साथ ही इसका भी ध्यान रखें कि बच्चे के साथ अगर रिश्ते को मजबूत बनाना है, तो शारीरिक प्रतिक्रियाओं के बजाय उसके साथ व्यवहारिक बॉन्ड बनाने पर जोर देना बेहतर है। ऐसा करने से बच्चा आसानी से घुल-मिल सकता है। साथ ही उसे किसी तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम कम हो सकता है। हालांकि, अगर बच्चे को भाषा या अन्य तरह के विकास से जुड़ी कोई समस्या है, तो इस बारे में बेहतर समाधान के लिए डॉक्टरी परामर्श का सहारा लेना बेहतर है। इसके लिए गुदगुदी जैसे मिथकों को आजमाने से बचें। इस लेख को अन्य लोगों के साथ शेयर कर हर किसी को इस विषय को लेकर जागरूक करें।

संदर्भ (References)