अलिफ लैला - कमरुज्जमां और बदौरा की कहानी | Kamarujjaman Aur Badaura Ki Kahani

द्वारा लिखित February 18, 2021

Kamarujjaman Aur Badaura Ki Kahani

अगले दिन शहरजाद ने बादशाह शहरयार को कमरुज्जमां और बदौरा की कहानी सुनानी शुरू की। उसने बताया कि फारस देश के पास ही खलदान राज्य था, जिस पर शाहजमां नाम के बादशाह की हुकूमत थी। बादशाह के पास सबकुछ था, बस एक संतान न थी। इसी बात से बादशाह हमेशा दुखी रहता था। बादशाह के दुख को देखकर उसके राज्य के कुछ विद्वानों ने सलाह दी कि उसे दान-पुण्य करना चाहिए और ईश्वर से संतान पाने की फरियाद करनी चाहिए।

इसके बाद राजा सालों तक संतान की चाह में दान-पुण्य करता रहा और एक दिन भगवान ने उसकी सुन ली। बादशाह की पत्नी को गर्भ ठहरा और कुछ समय बाद उसने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया। बेटे के जन्म की खुशी में महल में खूब जश्न मनाया गया और बादशाह ने बेटे का नाम कमरुज्जमां रखा। बादशाह ने उसे खूब पढ़ाया-लिखाया और युद्ध कौशल की शिक्षा भी दिलाई।

जब कमरुज्जमां जवान हुआ, तो पिता ने चाहा कि उसका विवाह कराकर उसे राज्य भार दे दिया जाए। मगर, परेशानी यह थी कि उसका बेटा विवाह करना ही नहीं चाहता था। इसलिए जब बादशाह ने अपने बेटे के सामने विवाह की बात रखी तो उसने इस बात से साफ इनकार कर दिया। इसपर उसकी मां ने कमरुज्जमां को काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं माना। गुस्से में बादशाह ने कमरुज्जमां को महल से दूर एक काल कोठरी में बंद करा दिया। उसी काल कोठरी में कमरुज्जमां के लिए खाने-पीने का इंतजाम कर दिया गया। साथ ही पढ़ने के लिए कुछ किताबे भी भिजवा दी गईं। मगर, शहजादे पर इसका कोई असर नहीं हुआ, शहजादा अपने आप में ही खुश था।

जिस काल कोठरी में शहजादे को बंद किया गया, उसी काल कोठरी के पास एक कुआं बना हुआ था। उस कुएं में मैमून नाम की एक परी रहती थी। हर रात की तरह जब परी कुएं से निकलकर बाहर घूमने जा रही थी। तभी उसकी नजर वहां मौजूद सैनिकों पर पड़ी। उसने पास जाकर देखा, तो सैनिक बंद पड़ी काल कोठरी के बाहर पहरा दे रहे थे। काल कोठरी पर बाहर से ताला भी लगा हुआ था। परी ने इससे पहले वहां किसी को भी नहीं देखा था, इसलिए परी अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर उस कमरे में चली गई। वहां उसने कमरुज्जमां को सोते हुए देखा। उसकी सुंदरता को देख परी मोहित हो गई। परी ने इससे पहले कभी इतना सुंदर युवक नहीं देखा था।

परी ने सैनिकों की बातों से अनुमान लगा लिया कि यह बादशाह का बेटा है और शादी से इनकार के कारण उसे यह सजा दी गई है। वह सोच में पड़ गई कि आखिर, क्या वजह होगी! जो इतना सुंदर शहजादा शादी ही नहीं करना चाहता। यह सोचते हुए परी आसमान में उड़ गई। तभी उसे अपने पीछे किसी और के होने का एहसास हुआ। परी एकदम से पीछे मुड़ी और पूछा कौन है? तभी एक जिन्न उसके सामने आया। उसने परी से कहा कि मैं जिन्न नहस हूं। तब परी ने पूछा, “तुम इतनी तेजी से कहा जा रहे हो।”

जिन्न नहस ने परी को बताया कि चीन के एक राज्य के बादशाह गोर हैं, जिनकी बेटी का नाम बदौरा है। वह बड़ी सुंदर है। शायद ही दुनिया में कोई दूसरा उस जैसा खूबसूरत होगा। सब उस शहजादी से शादी करना चाहते हैं, लेकिन उसे किसी से शादी ही नहीं करनी है। शादी के लिए उसके बार-बार मना करने से परेशान होकर उसके माता-पिता ने उसे एक अंधेरे कमरे में बंद करा दिया है। मैं उसे ही देखने जा रहा हूं।

इतना सुनते ही मैमून परी ने जिन्न से कहा कि कुछ ऐसा ही एक शहजादे के साथ भी हुआ है। उसे पास में ही एक कमरे में बंद करके रखा गया है। वो उस लड़की से कहीं ज्यादा सुंदर है। तुम बेकार में ही पराए देश की लड़की की तारीफ कर रह हो। जिन्न ने जवाब देते हुए कहा, “ अगर तुम्हें इतना यकीन है, तो दिखाओ मुझे वो कैसा दिखता है। परी उस जिन्न को सीधे शहजादे के पास ले गई।

शहजादे को देखते ही जिन्न ने कहा कि दोनों में ज्यादा सुंदर कौन है, इसका फैसला करने के लिए दोनों को एक साथ देखना होगा। इतना कहकर जिन्न जादू से पल भर में चीन की उस काल कोठरी में पहुंच गया, जहां शहजादी को बंद किया गया था। कुछ ही देर में जिन्न ने सोती हुई शहजादी को लाकर शहजादे के बगल में लिटा दिया।

दोनों को देखकर परी ने कहा कि शहजादा ज्यादा सुंदर है और जिन्न ने गोर बादशाह की बेटी बदौरा को अधिक खूबसूरत बताया। जब देर तक कोई फैसला नहीं हुआ, तो दोनों एक दूसरे से बहस करने लगे। तभी शहजादे की नींद खुली और अपने पास एक खूबसूरत लड़की को देखकर वो हैरान रह गया। उसने मन ही मन सोचा कि शायद यह वही लडकी है, जिससे उसके पिता उसकी शादी कराना चाहते हैं। यह सोचकर शहजादे को अपने फैसले पर पछतावा हुआ।

कुछ देर शहजादा उस लड़की को यूं ही देखता रहा, तभी उसकी नजर लड़की के हाथ पर पड़ी। लड़की ने हाथ में नीले रंग की एक खूबसूरत अंगूठी पहन रखी थी। कमरुज्जमां ने उस लड़की से शादी करने का फैसला किया और लड़की की अंगूठी से अपनी हीरे की अंगूठी बदल ली।

अंगूठी बदलते ही शहजादा फिर से गहरी नींद में चला गया और तब लड़की की नींद खुली। बदौरा ने जब कमरुज्जमां को अपने बगल में देखा तो वह भी हैरान रह गई। शहजादे की सुंदरता और खूबसूरती ने उसे भी मोह लिया और वह भी मन ही मन खुद को कोसने लगी कि आखिर क्यों उसने शादी से इनकार किया। उसने सोचा शायद यही वो शहजादा है, जिसे पिता ने मेरे लिए चुना था।

तभी अचानक बदौरा की नजर अपने हाथ में मजूद हीरे की अंगूठी पर पड़ी, यह उसकी अंगूठी नहीं थी। यह देख कर उसे और भी हैरानी हुई। इस पर उसने शहजादे का हाथ देखा तो शहजादे के हाथ में उसे अपनी नीली अंगूठी दिखी। उसे लगा कि शायद बेहोशी में ही माता-पिता ने इस सुंदर लड़के से मेरी शादी करा दी है। यह सोचते-सोचते अचानक शहजादी भी बेहोश होकर गहरी नींद में चली जाती है।

उधर बहस करते-करते परी और जिन्न भी थक चुके थे। इसलिए उन्होंने बदौरा को वापस उसकी काल कोठरी में ले जाने का फैसला किया। फिर क्या था, जिन्न ने जादू किया और पल भर में परी और जिन्न शहजादी को लेकर उस काल कोठरी में पहुंच गए, जहां शहजादी को बंद करके रखा गया था। दोनों ने शहजादी को काल कोठरी में ठीक वैसे ही लिटा दिया जैसे वह पहले सो रही थी। उसके बाद परी और जिन्न अपने-अपने रास्ते चल देते हैं।

अगली सुबह जब कमरुज्जमां जगा तो उसे वह लड़की नहीं दिखी, जो रात में उसके बगल में सोई हुई थी। इस पर शहजादा बेचैन हो जाता है और सोचता है कि उसके पिता ने उसके जागने से पहले ही शायद शहजादी को बुलवा लिया होगा। इस ख्याल के साथ शहजादा सैनिकों से उस लड़की के बारे में पूछता है। मगर, सभी सैनिक किसी भी लड़की के वहां आने से इनकार कर देते हैं। सैनिकों की बात सुनकर शहजादा आपा खो देता है और सैनिकों को मारने पीटने लगता है।

जब इस बी आत की खबर बादशाह को होती है तो वह भी हैरान रह जाते हैं और हकीकत जानने के लिए बेटे से मिलने पहुंच जाते हैं। कमरुज्जमां से बात करके बादशाह उसे बहुत समझाने की कोशिश करते हैं कि वहां कोई भी लडकी नही आई और न ही उन्होंने किसी लड़की को उसके पास भेजा था। बादशाह शहजादे से कहते हैं, “बेटा तुमने जरूर कोई सपना देखा होगा”। मगर, शहजादा मानने को तैयार न था कि जो कुछ भी रात को हुआ वह एक सपना था। थक हारकर बादशाह अपने सेवकों से कहते हैं, “जाओ, किसी हकीम को लेकर आओ। लगता है कि शहजादे की तबीयत ज्यादा ही बिगड़ गई है।”

इतना सुनते ही शहजादे ने अपने पिता को उस लड़की की नीले रंग की अंगूठी दिखाई। उसे देखकर बादशाह हैरान हो गए। उन्होंने सबसे पूछवाया कि वह नीला रत्न कौन सा है, लेकिन उनके राज्य में और पूरे फारस में ऐसा रत्न किसी ने नहीं देखा था। तब राजा ने शहजादे को कहा कि तुम चिंता मत करो हम उस लड़की को ढूंढ निकालेंगे। हम उसे इधर ढूंढते हैं और तुम हमारे नदी के किनारे वाले महल में चले जाओ। वहां परदेसी भी आते हैं। तुम उनसे इस रत्न के बारे में पूछ सकते हो। शहजादा इस बात को मान गया और नहा धोकर अपने नदी किनारे वाले महल के लिए निकल पड़ा।

वहीं दूसरी ओर चीन में गोर बादशाह की बेटी बदौरा का हाल भी कुछ ऐसा ही था। उसने भी सुबह होते ही अपने बगल में सो रहे लड़के के बारे में पूछा। सब उसके सवालों से भी परेशान हो गए। जब लड़की ने अपने पिता को हीरे की अंगूठी दिखाई, तो बादशाह गोर भी हैरान हो गए। यह हीरे की अंगूठी उनकी बेटी की नहीं थी। काफी सोचने-विचारने के बाद भी जब कुछ समझ न आया तो उन्हें लगा कि उनकी बेटी पागल हो गई है। कही से वह यह अंगूठी पा गई है और कह रही है कि उसे कोई खूबसूरत लड़का दे गया है।

इस विचार के साथ कि उनकी बेटी बदौरा की मानसिक स्थिति काफी खराब हो गई है, उन्होंने अपनी बेटी को सोने की जंजीरों से बंधवा कर दूसरी काल कोठरी में डाल दिया। साथ ही इस बात का भी एलान करा दिया, “जो भी मेरी बेटी को ठीक करेगा। मैं उससे अपनी बेटी की शादी करा दूंगा। साथ ही उसे अपने राज्य का नया राजा भी घोषित करूंगा।” इसके साथ ही बादशाह ने एक शर्त भी रख दी कि उसकी बेटी को ठीक करने का दावा करने वाला अगर असफल रहा तो उसे मौत की सजा दे दी जाएगी। इस घोषणा के बाद कई हकीम शहजादी को ठीक करने के लिए आए, लेकिन शहजादी को ठीक नहीं कर पाए। इस कारण बादशाह ने ऐलान के अनुसार उन्हें मौत की सजा दे दी।

तभी एक दिन शहजादी का मुंहबोला भाई मर्जुबन दूसरे देश से चीन लौटा। वहां पहुंचते ही उसे शहजादी बदौरा के बारे में पता चला। वो तुरंत लड़की का भेष बनाकर किसी तरह से उस काल कोठरी में पहुंच गया। उसने शहजादी के पास जाकर कहा कि मैं लड़की के भेष में मर्जुबन हूं। हम दोनों ने बचपन में एक ही मां का दूध पिया था। इस नाते तुम मेरी बहन हो और हम दोनों एक साथ खूब खेले हैं, तो तुम मेरी दोस्त भी हुई। इसलिए मुझे बताओ आखिर हकीकत क्या है? ऐसा क्या रोग तुम्हें लग गया, जिसके कारण बादशाह नें तुम्हे यूं बेड़ियों में बांध के रखा है।

बदौरा ने कहा, “मर्जुबन तुम दूसरों की तरह मुझे रोगी मत कहो। इतना कहने के बाद शहजादी ने उसे अंगूठी और उस रात के बारे में बताया।” यह सब सुनकर मर्जुबन हैरान हो गया। उसने कहा कि वैसे तो तुम्हारी बात यकीन करने लायक नहीं है, फिर भी मुझे तुम पर भरोसा है। अब तुम चिंता मत करो, मैं उस लड़के को कहीं से भी ढूंढकर तुम्हारे पास लाऊंगा। इतना कहकर वो वहां से छुपते-छुपाते निकल गया।

अब मर्जुबन हीरे की अंगूठी वाले लड़के की खोज करने लगा। जब चीन में उसे ऐसे किसी लड़के के बारे में पता नहीं चला तो वह चीन से बाहर निकल पड़ा। करीब छह महीने तक वो हर जगह जाता और हर किसी से ऐसे लड़के के बारे में पूछता, जिसके पास नीली अंगूठी हो या ऐसा कोई जो किसी लड़की को ढूंढ रहा हो। कई जगहों पर घूमते-घूमते एक दिन मर्जुबन एक अंजान जहाज में बैठ गया। वह जहाज मर्जुबन को उस जगह ले गया, जहां शहजादा कमरुज्जमां था।

तट पर पहुंचने से पहले ही एक भयानक तूफान आया, जिसकी वजह से वह जहाज तहस-नहस होकर डूब गया। मर्जुबन अच्छा तैराक था, इस कारण वह बच गया और लकड़ी के एक तख्ते के सहारे खुद को किनारे तक ले आया। उस वक्त शहजादा कमरुज्जमां तट पर ही मौजूद था। उसने दूर से देखा कि कोई अनजान व्यक्ति समुद्र में डूब रहा है। शहजादे ने अपने सैनिकों को भेजकर उसे बचाकर लाने का आदेश दिया। जान बचने के बाद भी मर्जुबन खुश नहीं था। उसे इतना उदास देखकर लोगों ने शहजादे को मर्जुबन के बारे में बताया।

इस पर कमरुज्जमां ने खुद मर्जुबन से मिलने का फैसला किया और वहां पहुंच गया जहां मर्जुबन को ठहराया गया था। शहजादे नें मर्जुबन से पूछा, “क्या हुआ? तुम इतने उदास क्यों हो।” दुखी मन से मर्जुबन ने उस अंगूठी का जिक्र करते हुए अपनी बहन बदौरा के हाल के बारे में बताया। तब शहजादे ने मर्जुबन को अपनी उंगली में वो नीली अंगूठी दिखाई और कहा कि वो मैं ही हूं, जिसे तुम ढूंढ रहे हो। चलो, मुझे जल्दी से उस शहजादी के पास ले चलो।

उसके बाद खुशी होकर शहजादा सबसे पहले अपने पिता के पास गया। अपने बेटे को सालों बाद खुश देखकर बादशाह का चेहरा भी खिल उठा, लेकिन कमरुज्जमां ने अपनी खुशी का कारण अपने पिता को नहीं बताया। पिता शहजादे को चीन जाने की इजाजत नहीं देंगे, इस डर से शहजादे ने कहा कि मुझे एक वर्ष के लिए भ्रमण पर जाना है। बादशाह इतने दिनों के लिए बेटे को खुद से दूर तो नहीं जाने देना चाहते थे, लेकिन इतने दिनों बाद उसे इतना खुश देखकर वो मना नहीं कर पाए और भ्रमण पर जाने की इजाजत दे दी।

पिता की आज्ञा पाकर मर्जुबान के साथ शहजादा चीन के लिए निकल पड़ा। रास्ते में मर्जुबान ने शहजादे कमरुज्जमां से कहा कि आपको हकीम के भेष में वहां जाना होगा, क्योंकि बादशाह ने अपनी बेटी से सिर्फ उसे ठीक करने वाले लोगों से ही मिलने की इजाजत दे रखी है। उन्होंने ऐलान कराया है कि जो भी उनकी बेटी को ठीक करेगा, वो उसकी शादी अपनी बेटी से करा देंगे। वहीं नाकाम होने पर मौत की सजा दे दी जाएगी।

कई महीनों की लंबी यात्रा के बाद कमरुज्जमां चीन पहुंचा हकीम। वहां पहुंच कर मर्जुबन के कहने पर हकीम के कपड़े पहने और बादशाह गोर से मिलने पहुंच गया। कमरुज्जमां ने बादशाह से कहा कि मैं आपकी बेटी को ठीक करने के लिए परदेस से आया हूं। आप जल्दी से मुझे वहां ले जाएं। बादशाह ने कहा कि तुम जैसे बहुत आए और मौत के घाट उतार दिए गए। जाओ, देखते हैं कि तुम क्या करोगे। इतना कहकर बादशाह ने एक सैनिक से कमरुज्जमां को शहजादी बदौरा के पास ले जाने के लिए कहा।

काल कोठरी के पास पहुंचकर कमरुज्जमां रूक गया। सैनिक ने कहा, “अरे क्या हुआ, आप रूक क्यों गए।” तभी उसने एक खत में उस रात की बात और नीली अंगूठी रखकर वहां मौजूद सेविका को देकर कहा कि इसे शहजादी के पास पहुंचा दो। फिर सैनिक की बात का जवाब देते हुए कहा कि मैं उसका इलाज बाहर से ही कर सकता हूं।

सेविका से कमरुज्जमां की चिट्ठी मिलने के बाद शहजादी बदौरा खुशी से फूली नहीं समाई। तब उसने अपनी सेविका से कहा, “मुझे खोल दो। अब मैं बिल्कुल ठीक हूं, मेरे रोग की दवा मिल गई है।” सेविका ने कई सालों से शहजादी को इस तरह मुस्कुराते और हंसते नहीं देखा था। इसलिए उसे भी लगा कि वो ठीक हो गई हैं। यह सोचकर उसने शहजादी की बेड़ियां खोल दीं और खुद भागकर बादशाह को यह खुशखबरी सुनाने चली गई।

इस बीच शहजादी बदौरा काल कोठरी से बाहर खड़े कमरुज्जमां से मिलने पहुंच गई। कमरुज्जमां को सामने देख शहजादी ने उसे गले से लगा लिया और फिर दोनों एक दूसरे से बात करने लगे। वे आपस में बात कर हे रहे थे कि तभी बदौरा के पिता वहां पहुंच गए। उन्होंने कमरुज्जमां से पूछा कि तुमने ऐसा चमत्कार कैसे कर दिखाया। तब कमरुज्जमां ने बादशाह को सब कुछ सच बता दिया।

उसने कहा कि मैं कोई हकीम नहीं हूं। मैं वही लड़का हूं, जिसकी याद में आपकी बेटी आजतक पागल बनी हुई थी। फिर शहजादे ने बादशाह को उस रात के बारे में बताया। यह सब सुनकर बादशाह गोर हैरान हो गए। खैर अब बादशाह को इस बात की खुशी थी कि उनकी बेटी ठीक हो गई है और उन्हें अपनी बेटी के लिए एक खूबसूरत शहजादा भी मिल गया।

तब बादशाह ने शर्त के अनुसार, अपनी बेटी की शादी कमरुज्जमां से करवा दी। शादी के बाद बादशाह ने अपने दामाद को अपने महल में एक ऊंचा पद दे दिया। कुछ दिन खुशी-खुशी रहने के बाद कमरुज्जमां उदास हो गया। जब बदौरा ने उससे दुख का कारण पूछा, तो उसने कहा कि वो पिता की याद में दुखी है। इतना सुनते ही बदौरा ने अपने पिता से साल भर के लिए राज्य से दूर घूमने जाने के लिए अनुमति मांगी।

बादशाह गोर ने भी खुशी-खुशी उन्हें जाने की इजाजत देते हुए जल्दी लौटकर आने को कहा। पिता से इजाजत मिलने के बाद बदौरा अपने पति और सेवकों के साथ निकल पड़ी। उसने कमरुज्जमां से कहा कि आप अब ज्यादा दुखी न हों। यहां से हम आपके पिता से मिलने जाएंगे। शहजादा कमरुज्जमां खुश हो गया। दोनों कुछ दूर आगे बड़े ही थे कि शहजादे की नजर बदौरा की कमर पर पड़ी। उसमें एक लाल रंग की पेटी बंधी हुई थी। कमरुज्जमां उससे लाल रंग की पेटी के बारे में पूछने ही वाले थे कि तबतक बदौरा ने उस पेटी को कमर से उतरकर जमीन में रख दिया और सो गईं।

शहजादा भी बदौरा के पास लेट गया और कुछ देर तक उस पेटी को देखता रहा। फिर शहजादे ने उस लाल पेटी को खोलकर देखा। पेटी को खोलने के बाद शहजादे को उसमें एक लाल रंग का बड़ा सा रत्न मिला, जो बहुत ही खूबसूरत था। उस रत्न पर छोटे अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। कमरुज्जमां उसे खोलकर देख ही रहे थे कि तब तक कही से एक बड़ा पक्षी आया और उस रत्न को लेकर उड़ गया। काफी देर तक शहजादे ने उस पक्षी का पीछा किया, लेकिन वो पक्षी पकड़ में न आया।

थक हारकर शहजादा एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसी पेड़ के पास वो पक्षी भी आ गया। उसे देखकर कमरुज्जमां फिर दौड़कर उसका पीछा करने लगा। भागते-भागते कमरुज्जमां किसी अनजान राजा के नगर में पहुंच गया। वहां कोई भी उससे बात नहीं कर रहा था। उसने कुछ दूर में एक बगीचा देखा। कमरुज्जमां को भूख लगी थी, वो दौड़कर बाग के अंदर जाने लगा। अनजान व्यक्ति को बगीचे की ओर तेजी से आते देख बगीचे के माली ने बाग का गेट बंद कर दिया।

माली ने कहा, “तुम इस राज्य के नहीं लगते हो। राज्य तो छोड़ों तुम इस देश के भी नहीं लगते हो। यहां परदेसियों को देखते ही मार दिया जाता है। जल्दी से यहां से भाग जाओ।” इतना सुनकर कमरुज्जमां ने अपना पूरा हाल सुना दिया और कहा कि मैं भटकर यहां पहुंच गया हूं। आप मुझे अपने देश जाने की दिशा दिखाएं। माली को उस पर तरस आ गया। उसने कहा कि तुम यहां रहकर कुछ खा लो और आराम कर लो, लेकिन यहां तुम्हें सबसे छिपकर रहना होगा। माली ने आगे कहा कि तुम जिस द्वीप से आए हो, वो करीब एक साल की दूरी पर है। वहां जाने के लिए हर साल एक जहाज जाता है। मैं तुम्हें उसमें बैठा दूंगा। तब तक तुम यहां आराम से रह सकते हो।

कमरुज्जमां ने ठीक वैसा ही किया। उधर कमरुज्जमां की पत्नी बदौरा की जब नींद खुली, तो वो अपने बगल में पति को न पाकर परेशान हो गई। उसने बगल में अपनी कमर की लाल रंग की पेटी को खुला देखा। वो समझ गई कि इसे उसके पति ने ही खोला होगा, लेकिन उसके अंदर का रत्न गायब था। असर में वह एक यंत्र था, जिसे बदौरा की मां ने उसकी हिफाजत के लिए उसे दिया था। उसे लगा कि शहजादा उस यंत्र की वजह से ही कही चला गया है या फिर किसी मुश्किल में पड़ गया है। उसने एक दो-दिन तक कमरुज्जमां का इंतजार उसी जगह पर किया, लेकिन जब वो नहीं लौटा तो बदौरा और परेशान हो गई।

बदौरा ने तय किया कि वो राजा के भेष में आगे की यात्रा करेगी, ताकि उन्हें कमजोर समझकर उन पर कोई हमला न कर दे। उसने अपनी जगह पालकी में एक दासी को बैठा दिया और खुद शहजादे के कपड़े पहनकर उसकी पालकी में बैठ गई। सभी आगे बढ़ते हुए अवौनी देश पहुंच गए। वहां के बादशाह अश्शम्स को जब पता चला कि कमरुज्जमां की पालकी पास से जा रही है, तो वो उनसे मिलने आ गया। उन्होंने कमरुज्जमां को कभी देखा नहीं था, तो उसकी पत्नी बदौरा को पुरुष भेष में देखकर कमरुज्जमां समझ लिया।

अवौनी देश के बादशाह अश्शम्स ने बदौरा को कमरुज्जमां समझकर अपने महल चलने के लिए कहा। वहां बदौर की बुद्धि और सबके लिए आदर भाव देखकर बादशाह ने अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव कमरुज्जमां बनी बदौरा के सामने रखा। उन्होंने कहा कि मेरा बेटा नहीं है, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम यहां का राजपाट संभालते हुए यही रहो। बदौरा बादशाह को मना नहीं कर पाई और अपनी जान के डर से सच भी न बता सकी। उसने डर के मारे बादशाह की बेटी से शादी कर ली।

विवाह की पहली रात ही बदौरा ने अवौनी देश के बादशाह अश्शम्स की बेटी को सब सच बता दिया। उसके बाद पुरुष के भेष में बदौरा ने कहा कि अब तुम चाहे, तो मुझे प्राण दंड दिलवा दो या छोड़ दो। सबकुछ तुम पर निर्भर करता है, लेकिन मैं तुम्हें बता दूं कि जब कभी भी मेरे पति लौटेंगे मैं तुम्हारा विवाह उनसे करवा दूंगी। फिर हम तीनों खुशी-खुशी रहेंगे। बादशाह अश्शम्स की बेटी ने उसे तुरंत गले से लगा लिया और कहा कि मैं आपके सहास की तारीफ करती हूं। आप यहां आराम से रहिए और हमारी सेना कि मदद से अपने पति को ढूंढती रहिए, मैं किसी से कुछ भी नहीं कहूंगी।

वहां कमरुज्जमां अपनी पत्नी बदौरा की याद में तड़प रहा था। इंतजार करते-करते वो दिन आ ही गया जब जहाज वहां से अवौनी राज्य के लिए रवाना होने वाला था। उसी दिन एक पक्षी ने कुछ सुनहरी सी चीज उस बगीचे में गिरा दी। जब कमरुज्जमां ने देखा, तो पता चला कि वो वही यंत्र है, जिसका पीछा करते-करते वो रास्ता भटक गया था। कमरुज्जमां बहुत खुश हुआ। उसने उस यंत्र को एक मटके में डाल दिया और माली ने उसे करीब 10-20 मटके में जैतून का तेल भरकर तोहफे के रूप दे दिया। तभी जहाज को चलाने वाला व्यक्ति माली के घर आया और कहा कि जिसे भी जहाज से जाना है जल्दी चले आना, क्योंकि हम कुछ देर में चले जाएंगे। इतने में कमरुज्जमां ने कहा कि मुझे जाना है। मैं कुछ देर में आ जाऊंगा, लेकिन तबतक आप मेरे मटके लेकर जहाज में रख दीजिए। जहाज के कप्तान ने सारे मटके जहाज पर रखवा दिए।

तभी अचानक माली की तबीयत खराब हो गई और कमरुज्जमां जहाज वक्त पर जहाज पर नहीं पहुंच पाया। जब वो समुद्र किनारे पहुंचा, तो देखा कि जहाज निकल गया था। वो बहुत दुखी हो गया। दुखी होकर वो माली के पास वापस आया, तो देखा कि माली मर चुका था। उसने माली को अंतिम विदाई दी और जहाज के वापस आने का इंतजार वही बगीचे में बैठकर करने लगा। अब शहजादा माली की जगह पर रोज बगीचे की देखभाल करता और रात को बदौरा को याद करके सो जाता।

जब जहाज अवौनी के तट पर पहुंचा, तब वहां कमरुज्जमां के भेष में बदौरा उसी जहाज के पास पहुंच मौजूद थी। उसने जहाज चलाने वाले और उसमें मौजूद व्यापारियों से कहा, “इसमें जितना भी जैतून का तेल है, वो मुझे दे दो।”  कमरुज्जमां के कहे अनुसार सभी ने अपने-अपने जैतून के तेल के मटके उसे बेंच दिए। तभी बदौरा की नजर उन मटकों पर पड़ी जिसे कमरुज्जमां ने जहाज पर रखवाया था। बदौर ने पूछा कि ये मटके किसके हैं? इनमें क्या है? तब जहाज के कप्तान ने बताया कि यह एक छोटे व्यापारी के मटके हैं, जिसका जहाज छूट गया था। इसमें भी जैतून का तेल है। बदौरा ने उन मटको को भी खरीद लिया और उससे कहा कि इसके पैसा ले जाकर उस मुसाफिर को देना।

फिर बदौरा सारे मटके लेकर महल चली गई। कमरुज्जमां ने पहचान के लिए उस मटके को अलग से सजा रखा था, जिसमें बदौरा का यंत्र था। सभी मटके में से उसे सबके अलग देखकर पुरुष के भेष में रह रही बदौरा ने उसे खोलकर देखा तो उसमें उसे अपना यंत्र मिला। अपने खोए यंत्र को देखखर बदौरा बहुत खुश हुई। अगले ही दिन वह सीधे उस जहाज को चलाने वाले व्यक्ति के पास पहुंची और कहा कि जल्दी से उस मुसाफिर को मेरे पास लेकर आओ, जिसके मटके तुम्हारे जहाज पर थे। हमें पता चला है कि उसने हमारे राज्य का काफी सारा कर्ज ले रखा है। अगर तुम उसे यहां नहीं लाए, तो मैं तुम सबको बंदी बना लूंगा।

इतना कहकर उसने मंत्री होने के नाते जहाज का सारा सामान जब्त कर लिया और व्यापारियों को अपने पास रख लिया। उसने कहा तुम जल्दी से लौटकर आओ और सारा सामान व व्यापारियों को लेकर चले जाओ। जहाज का कप्तान मजबूर होकर वापस उसी देश चला गया जहां से आया था। कुछ ही दिन में वहां पहुंचकर वो सीधे बगीचे गया और दरवाजा खटखटाने लगा। कमरुज्जमां गहरी नींद में सो रहा था। उसने काफी देर बाद दरवाजा खोला।

जहाज के कप्तान ने तुरंत कमरुज्जमां को पकड़कर जबरदस्ती जहाज पर बैठा दिया। शहजादा चिल्लाता रहा कि मुझे क्यों इस तरह से जहाज पर चढ़ा रहे हो। तब उसने कहा कि तुम पर अवौनी राज्य का काफी कर्ज है, इसलिए वहां के मंत्री ने तुम्हें तुरंत बुलाया है। उसने जहाज के कप्तान को बार-बार कहा कि मैंने किसी से कोई कर्ज नहीं लिया है, लेकिन उसने उसकी एक बात नहीं सुनी। कुछ दिनों बाद जहाज अवौनी पहुंच गया।

कप्तान ने कमरुज्जमां को ले आने का पैगाम महल में भिजवाया। यह खबर मिलते ही पुरुष के रूप में बदौरा वहां पहुंच गई। उसने जैसे ही कमरुज्जमां को देखा वह खुश हो गई, लेकिन उसने खुद को संभाला और जहाज के कप्तान को खूब सारा इनाम देकर सभी व्यापारियों के साथ विदा किया।

कमरुज्जमां ने अपनी पत्नी को पुरुष रूप में नहीं पहचाना। बदौरा उसे अपने साथ महल में ले गई और सेवकों से कहकर उसे अच्छे कपड़े और खाने को शानदार भोजन दिलवाया। फिर बदौरा अपने स्त्री रूप में सजकर कमरुज्जमां के पास आई। अब कमरुज्जमां ने फौरन बदौर को पहचान लिया। उसकी आंखों से खुशी के कारण आंसू निकलने लगे। उसके बाद बदौरा ने अपना सारा हाल शहजादे को सुनाया और कमरुज्जमां ने भी अपने अब तक के सफर के बारे में बदौरा को जानकारी दी।

अगले दिन सुबह होते ही स्त्री रूप में बदौरा अवौनी देश के बादशाह अश्शम्स के पास गई। उसे बादशाह ने पहचाना नहीं। तभी बदौरा ने बादशाह को अपने पुरुष रूप और जंगल में पति के खोने की सारी कहानी सुनाई। बदौरा ने कहा कि आप मुझे चाहें, तो मृत्यु दंड दे सकते हैं। बस मेरा इरादा किसी को दुख पहुंचाने का नहीं था। मैंने सब कुछ विवश होकर किया। अब मुझे अपने पति मिल गए हैं, इसलिए मैंने आपको सब सच बता दिया है। आप अपनी बेटी की शादी मेरे पति से करवा सकते हैं। मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं होगी।

तभी कमरुज्जमां को बदौरा ने अवौनी देश के बादशाह अश्शम्स से मिलवाया। बादशाह भी सारी बात सुनकर अपनी बेटी की शादी कमरुज्जमां से करवाने के लिए राजी हो गए। बादशाह ने शादी की तारीख तय करने से पहले कमरुज्जमां से इसके बारे में पूछा। शहजादे ने कहा कि मेरा मन तो है कि मैं वापस अपने घर चला जाऊं। लेकिन, आप और मेरी पत्नी अगर चाहते हैं कि मैं विवाह करूं, तो मैं ऐसा ही करूंगा। फिर धूमधाम से बादशाह अश्शम्स ने अपनी बेटी और शहजादे कमरुज्जमां की शादी करवा दी।

थोड़े समय में दोनों के एक-एक पुत्र हो गए। दोनों को उनकी मां बहुत प्यार करती थी, लेकिन बेटे अपनी सौतेली मां को अधिक प्यार करते थे। इससे जलकर दोनों मांओं ने एक दूसरे को बदनाम करने की साजिश की। जब बेटों को यह पता चला, तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा कि वो पिता को सब कुछ बता देंगे। इससे परेशान होकर कमरुज्जमां की दोनों पत्नियों ने एक-दूसरे के बेटे के खिलाफ कमरुज्जमां से शिकायत करते हुए कहा कि आपके बेटों ने हमें बदनाम करने की कोशिश की है।

इस पर बिना सच्चाई जाने कमरुज्जमां ने दोनों बेटों अमजद और असद को मौत की सजा देने का ऐलान कर दिया। आदेश मिलते ही मंत्री शहजादों को जंगल ले गया और उन्हें बताया कि आप दोनों को मौत की जा दी गई है। दोनों भाइयों ने कहा कि जब पिता ने ऐसा कहा है, तो सोच समझकर ही कहा होगा। हमें सजा मंजूर है।

यह सुनकर मंत्री ने दोनों के हाथों को बांध दिया और अपनी तलवार निकाल ली। तलवार की चमक देखकर पास ही खड़ा घोड़ा हिनहिनाने लगा और तेजी से दूसरी दिशा में भागने लगा। मंत्री को लगा कि ये दोनों यही बंधे हैं, तो क्यों न पहले घोड़े को देख लूं। वह घोड़े के पीछे दौड़े और उनके सामने एक शेर आ गया। अमजद और असद दोनों दूर से यह सब देख रहे थे। उन्होंने जल्दी से रस्सी तोड़ी और असद ने मंत्री को शेर से बचा लिया व अमजद ने घोड़े को पकड़ लिया।

फिर असद और अमजद ने मंत्री को कहा कि अब हमें बांधकर मौत की सजा दे दीजिए। इस पर मंत्री ने रोते हुए कहा कि आप दोनों ने मेरी जान बचाई, तो मैं आप लोगों को कैसे मार सकता हूं। आप दोनों यहां से किसी दूसरे देश चले जाइए। मैं आपके कुछ कपड़ों को शेर के खून से लतपत करके बादशाह को दिखा दूंगा। दोनों भाइयों ने ऐसा ही किया और जंगल में भटकते-भटकते नदी के रास्ते से एक नए देश में पहुंच गए।

वहीं मंत्री भी शेर के खून में लतपत कपड़े लेकर बादशाह के पास पहुंचा। अपने बच्चों के मरने की खबर सुनकर बादशाह दुखी हो गया। तभी उन्हें पता चला कि उसकी दोनों पत्नियों ने ही एक दूसरे को बदनाम करने के लिए पत्र लिखा था और फिर इल्जाम उसके बेटों पर लगा दिया। इस बात पर बादशाह को बहुत गुस्सा आया और उसने अपनी दोनों पत्नियों को जेल में डाल दिया।

उधर नए देश पहुंचे असद और अमजद ने यह तय किया कि पहले एक व्यक्ति आगे जाकर किसी से मदद मांगेगा। फिर दूसरा उसके बुलावे पर ही आगे आएगा। यह तय करके असद आगे को बढ़ा। तभी उसे एक बूढ़े ने अपनी बातों में फंसाकर बंदी बना लिया, क्योंकि उसे बलि के लिए एक आदमी चाहिए था। रोज दो लड़कियां जेल में जाकर असद उसकी पिटाई करती और खाने के लिए दिनभर में सिर्फ दो रोटी देतीं।

असद का पूरे एक दिन इंतजार करने के बाद अमजद आगे बढ़ा। उसे लगा कि उसका भाई मुसीबत में है। उसने एक दर्जी से पूछा कि क्या आपने मेरे भाई को यहां देखा है, वो मेरे जैसे ही कपड़ों में कल इधर आया होगा। दर्जी ने कहा कि हो सकता है कि तुम्हारा भाई उस बुढ़े के हाथ लग गया हो। वो सभी परदेसियों को अपनी बातों में फंसाकर बलि चढ़ाने के लिए ले जाता है।

अमजद ने फिर उससे पूछा कि यहां से अवौनी राज्य कितना दूर है। उन्होंने कहा करीब पांच महीने लग सकते हैं। यह सोचते हुए अमजद आगे जा रहा था कि उस नगर के बादशाह के सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। बादशाह ने अमजद से पूछा कि वो इस राज्य में कैसे पहुंचा। उसने बादशाह को अपनी पूरी कहानी सुना दी। उसकी कहानी सुनकर बादशाह बहुत प्रभावित हुए और कहा कि तुम्हें तुम्हारे पिता ने ही मरवाने के आदेश दिए। अब हम तुम्हें यहां अपना बेटा बनाकर रखेंगे और तुम्हारे भाई को ढूंढने में भी मदद करेंगे।

बादशाह ने अमजद को अपना बेटा मानने के बाद उसे मंत्री पद दे दिया और सारी जगह एलान करवा दिया कि जो भी असद के बारे में बताएगा, उसे खूब सारा इनाम दिया जाएगा। कई सारे जासूस और सैनिक भेजकर असद को ढूंढने की कोशिश की गई, लेकिन असद का कोई पता नहीं चल पाया। असद रोज उन दो लड़कियों की मार खाता और रोते हुए सो जाता। धीरे-धीरे उसके बलि चढ़ाने का दिन भी नजदीक आ गया।

असद को बलि चढ़ाने के लिए एक जहाज में बैठा दिया। उस जहाज की जांच करने के लिए बादशाह के कुछ सैनिक भी पहुंचे, लेकिन असद को उन्होंने संदूक में छुपा रखा था। वो किसी भी सैनिक को नहीं दिखा । सैनिकों के जाते ही उन लोगों ने असद को संदूक से बाहर निकालकर उसके पैरों को बांध दिया।

तभी अचानक उल्टी दिशा में हवा होने के कारण जहाज कवाला राज्य की जगह एक ऐसे राज्य में पहुंच गया जहां मरजीना नाम की रानी का राज्य था। रानी मरजीना उस वक्त समुद्र के किनारे ही थी। जहाज को  अपने राज्य के समीप देखकर वह खुद जहाज के पास पहुंच गई। असद के पैर में बेड़ियां और उसकी खराब हालत को देखकर मरजीना को बहुत गुस्सा आया। उसने सबसे कहा कि तुम दुश्मन देश के लोग हो। मैं चाहूं, तो तुम सबको मार दूं। लेकिन, मैं ऐसा करूंगी नहीं। तुमने जिसे इस तरह बांधकर रखा है उसे छोड़कर मेरे हवाले कर दो और फौरन यहां से भाग जाओ।

उसके बाद रानी मरजीना ने असद को अच्छे कपड़े और खाना दिया। उसके बाद कुछ देर असद के साथ मरजीना बाग में घूमने लगी। फिर असद ने उसे अपनी पूरी कहानी सुनाई। यह सब सुनकर मरजीना को काफी दुख हुआ। उसने अपने राजमहल का पैसों संबंधी कामकाज देखने के लिए असद को रखने का फैसला किया। फिर दोनों ने कुछ देर बात की और मरजीना अपने महल में चली गई, लेकिन असद वही बाग में ही सो गया।

असद को बलि चढ़ाने के लिए ले जा रहा बहराम चुपके से मरजीना के बाग में पीने लायक पानी लेने के लिए आया। तभी उसने असद को भी वहां देखा, तो पानी और असद दोनों को लेकर वह चला गया। सुबह होने से पहले ही बहराम जहाज लेकर भाग गया। सुबह जब मरजीना को असद कहीं नहीं दिखा, तो वह परेशान हो गई। काफी देर तक उसने असद के न मिलने पर मरजीना को बहराम पर शक हुआ।

रानी मरजीना ने तुरंत अपने सारे जहाज निकलवाए और बहराम के देश की ओर बढ़ने लगी। कुछ घंटों में ही मरजीना के सभी जहाजों ने बहराम के जहाज को घेर लिया। मरजीना को वहां देखकर बहराम ने असद को समुद्र में फेंक दिया। असद को अच्छे से तैरना आता था, वो तैरते हुए किनारे पर पहुंच गया और एक मस्जिद में जाकर सो गया। उधर मरजीना ने उनका जहाज किनारे में उताकर पूरी तलाशी ली, लेकिन असद मिला नहीं।

बहराम ने जहाज से उतकर जैसे ही नगर की ओर देखा, तो उसे पता लगा कि यह उसी का शहर है। फिर बहराम छुपते-छुपाते उसी मस्जिद में पहुंच गया, जहां असद को सो रहा था। उसने असद को देखकर उसे फिर उसी जेल में पहुंचा दिया जहां से उसे लाया था। बहराम ने कहा कि असद तुम इस साल बलि से बच गए, लेकिन अगले साल नहीं बच पाओगे।

दोबारा उस जेल में उन लड़कियों में से एक लड़की बोस्तान आई, जो रोज असद को मारती थी। उसे देखकर असद ने कहा कि इससे तो अच्छा होता कि मेरी बलि ही चढ़ जाती। उस लड़की ने कहा कि मैं तुम्हें आज से नहीं मारूंगी। मुझे समझ आ गया है कि तुम्हें इस तरह से रोज मारना और दुखी करना गलत है। फिर असद ने कहा कि भले ही तुम न मारो, लेकिन वो दूसरी लड़की तो मुझे जरूर मरेगी। तब बोस्तान ने कहा कि आज के बाद से सिर्फ मैं ही इस जेल में आऊंगी और तुम्हें बिना मारे अच्छी-अच्छी चीजें खाने के लिए दूंगी।

कुछ दिनों के बाद बोस्तान के कानों तक वह एलान पहुंचा कि जो भी अमजद के भाई असद को ढूंढकर लाएगा उसे खूब पैसा मिलेगा। अगर किसी के घर में असद मिला, तो उसका घर खुदवा कर सभी को प्राण दंड दिया जाएगा। यह बात सुनते ही किसी तरह से बोस्तान ने असद को जेल से बाहर निकाला और वहां लेकर गई जहां से एलान की आवाज आ रही थी।

सेवकों ने असद के मिलने की जानकारी सीधे मंत्री अमजद को दी। वह सीधे असद के पास पहुंचा और उसे गले से लगा लिया। उसके बाद वो असद और बोस्तान को बादशाह के पास लेकर चला गया। बादशाह ने वादे के अनुसार उन्हें खूब सारा पैसा दिया और जिसने असद को बंद करके रखा था, उसके घर को खुदवा दिया।

साथ ही वहां मौजूद सभी लोगों को पकड़कर बादशाह के पास लाया गया। उस जहाज के कप्तान बहराम ने बादशाह से दया की भीख मांगते हुए कहा कि मैंने तो जैसा मालिक ने बताया वैसा ही किया। आप मुझे छोड़ दीजिए। बादशाह ने सिर्फ उसके मालिक और परिवार वालों को दंड दिया और बाकी सबको खर्चे के पैसे देकर छोड़ दिया।

सजा न मिलने पर बहराम ने अजमद और असद से कहा कि मुझे अभी पता चला है कि आप बादशाह कमरुज्जमां के बेटे हैं। मैं कुछ समय पहले आपके राज्य गया था। मुझे वहां पता चला कि आपके पिता आप दोनों की याद में बहुत रो रहे हैं। उन्हें आपकी माताओं की साजिश के बारे में पता चल गया था और उन्हें अपनी करनी पर पछतावा है। उन्हें उनके मंत्री ने भी बता दिया था कि आपको उसने प्राणदंड नहीं दिया है। तब से वो आप दोनों को ढूंढ रहे हैं।

बहराम ने आगे कहा कि मेरे पास जहाज हैं। आप चाहें, तो मैं आप दोनों को वहां पहुंचा सकता हूं। इस बात को सुनकर दोनों भाई खुश हो गए और बादशाह से अपने घर जाने की आज्ञा मांगी। तभी सामने से एक बड़ी सी सेना के आने की खबर बादशाह को मिली। उन्होंने तुरंत अमजद को जाकर देखने के लिए कहा कि पता करो, किस दुश्मन ने हम पर हमला किया है।

वहां पहुंचकर अमजद को पता चला कि जहाज में एक महिला बड़ी सी सेना के साथ आ रही है। अमजद ने उस महिला से सेना के साथ आने का कारण पूछा, तो महिला ने बताया कि मैं मरजीना हूं। बहराम नाम का कप्तान मेरे पास से असद को लेकर भाग आया है। उसे मैंने अपने महल में काम पर रखा था।

अमजद ने मुस्कुराते हुए कहा कि असद मेरा छोटा भाई है। आप उससे यहीं मिल सकती हैं। हम उसे बचाकर ले आए हैं। यह सुनकर मरजीना बहुत खुश हुई और सेना को पीछे उसका इंतजार करने के लिए कहकर आगे की ओर बढ़ गई। अमजद ने उसे बादशाह और असद से मिलवाया।

इतने में एक और सेना उस राज्य की तरफ आने की खबर मिली। दोबारा अमजद उनसे आने का कारण पूछने के लिए गया। इस बार पता चला कि चीन से बादशाह गोर अपनी बेटी बदौरा और दामाद को ढूंढते हुए वहां पहुंचे हैं। अमजद को जैसे ही उनके बारे में पता चला, तो उसने तुरंत उनको आदाब करते हुए कहा कि मैं बदौरा और कमरुज्जमां का बेटा यानी आपका नाती हूं। अभी मेरे पिता अवौनी में खुशी-खुशी मां के साथ रह रहे हैं। इतना सुनते ही बादशाह गोर ने अपने नाती को गले से लगा लिया। अमजद उन्हें भी बादशाह के पास ले गया और असद से परिचय करवाया।

अभी सब लोग आपस में बात कर ही रहे थे कि अचानक एक और बड़ी सी सेना की उस राज्य की ओर आने की खबर मिली। बादशाह ने अमजद से कहा, “जरा जाकर देखो कि यह तीसरी सेना किसकी आ रही है।” अमजद ने जाकर पूछताछ की, तो पता चला कि उसके पिता कमरुज्जमां वहां अपनी सेना के साथ अपने बेटों की तलाश में आए हैं। यह देखकर अमजद जल्दी से अपने पिता के गले लग गया। वह उन्हें जल्दी महल में ले गया और तीनों बाप बेटे गले लगे। फिर कमरुज्जमां ने अपने ससुर यानी चीन के बादशाह गोर को भी वहां देखा और खुशी से उन्हें आदाब कहा।

अब कमरुज्जमां, उसके दोनों बेटे, उनके ससुर, मरजीना उस राज्य के बादशाह के साथ बैठकर बातें कर रहे थे। उसी वक्त चौथी सेना की टुकड़ी की उनके राज्य की ओर आने की खबर आई। बादशाह ने कहा, “आज तो हमारे राज्य में चारों तरफ से सेनाएं आ रही हैं। देखो अब कहीं सच में कोई दुश्मन तो नहीं आ गया है।”

अमजद एक बार फिर सेना के बारे में जानने के लिए पहुंच गया। तब उसे सेनापति ने बताया कि कमरुज्जमां के पिता सालों से अपने बेटे की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं। वो अपनी सेना के साथ अपने बेटे के बारे में जानने के लिए खलदान से आए हैं। अगर आपको कमरुज्जमां के बारे में कुछ पता हो, तो बता दीजिए।

अमजद ने हंसते हुए कहा कि खलदान के बादशाह को आप यहां बुला लीजिए। अब जिन्हें आप ढूंढ रहे हैं, उन्हें और खोजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वो यहीं इसी राज्य में कुछ ही दूरी पर हैं। कमरुज्जमां के पिता को जैसे ही यह समाचार मिला वो खुशी के मारे रोने लगे। वो दौड़ते हुए अमजद के साथ आगे बढ़े।

अमजद उन्हें सीधे वहां ले गया, जहां सब एक साथ बैठे थे। अपने बेटे कमरुज्जमां को देखते ही बादशाह शाहजमां ने उसे गले से लगा लिया। अपने बेटे से शाहजमां ने कहा कि ऐसा क्या हो गया कि तुम आज तक मेरे पास लौटकर नहीं आए। मैंने तुम्हें कितना ढूंढा। इतना कहकर वो रोने लगे। उसके बाद कमरुज्जमां ने अपने पिता से असद और अमजद की पहचान करवाई। उसके बाद चीन से आए बादशाह गोर से भी मुलाकात करवाई। खलदान के बादशाह शाहजमां सबसे मिलकर काफी खुश हुए।

उसके बाद कमरुज्जमां ने अपने पिता को अब तक का सारा किस्सा सुनाया। फिर सभी ने सलाह-मशवरा करके असद का विवाह मरजीना से और अमजद का विवाह असद की जान बचाने वाली लड़की बोस्तान से करने का फैसला लिया। दोनों का धूमधाम से विवाह हुआ और कई दिनों तक जश्न चला। फिर चीन से आए बादशाह गोर, खलदान के बादशाह शाहजमां और उनका बेटा कमरुज्जमां सभी अपने-अपने देश लौट गए।

इतनी कहानी सुनाकर शहरजाद ने शहरयार से कहा कि मुझे उम्मीद है कि आपको यह कहानी अच्छी लगी होगी। मेरे पास ऐसी ही कई सारी कहानियां हैं। अगर मुझे प्राणदंड नहीं दिया जाएगा, तो मैं कल दोबारा से एक नई और इससे भी रोमांचित कहानी सुनाऊंगी। यह कहानी नूरुद्दीन और फारस देश की दासी की है। नई कहानी सुनने की चाह रखते हुए बादशाह शहरयार ने एक और दिन के लिए प्राणदंड रोक दिया और अगले दिन शहरजाद से कहानी सुनाने के लिए दोबारा आने की बात कही।

क्या है नरुद्दीन और फारस देश की दासी की कहानी, जानने के लिए स्टोरी का दूसरा अंश पढ़ें।

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