अलिफ लैला - तीन राजकुमारों और पांच सुंदरियों की कहानी

द्वारा लिखित December 7, 2020

Alif Laila Teen Rajkumari Aur Panch Sundariyon Ki Story In Hindi

रानी शहरजाद की कहानी खत्म होने पर उसकी छोटी बहन दुनियाजाद उससे नई कहानी सुनाने की जिद करने लगी। बहन दुनियाजाद के बार-बार आग्रह करने पर रानी शहरजाद ने बादशाह शहरयार से अगली कहानी सुनाने की अनुमति मांगी और मंजूरी मिलते ही ‘तीन राजकुमारों और पांच सुंदरियों’ की कहानी सुनानी शुरू कर दी।

बगदाद के खलीफा हारूं रशीद के राज्य में एक मजदूर रहता था, जो स्वभाव से हंसमुख और बातें करने में माहिर था। मजदूर रोज सुबह काम की तलाश में निकलता और मजदूरी से मिलने वाले मेहनताने से अपना भरण पोषण करता। एक सुबह मजदूर काम मिलने की आस में अपनी टोकरी लिए नगर के चौराहे पर खड़ा था, तभी एक सुंदर-सी स्त्री जिसने चेहरे पर नकाब पहन रखा था, उसके करीब आई और मजदूर को अपने साथ चलने के लिए कहा।

मजदूर भी अच्छा मेहनताना मिलने की आस में अपना टोकरा उठाकर स्त्री के पीछे-पीछे चल पड़ा। स्त्री कुछ दूर जाकर एक भवन के सामने रुक गई। उसने भवन के दरवाजे के बाहर ताली बजाई, तो एक बूढ़ा बाहर निकला। स्त्री ने मुंह से एक शब्द निकाले बिना उस बूढ़े को कुछ रुपये थमा दिए। इसके बाद बूढ़ा घर के अंदर से एक घड़े में सोमरस भरकर ले आया और स्त्री को पकड़ा दिया। स्त्री ने वह घड़ा मजदूर को थमा दिया और पीछे चलने का इशारा किया।

इसके बाद स्त्री शहर के मुख्य बाजार में पहुंची। जहां से उसने कई प्रकार के फल जैसे आम, सेब, केला, अंगूर और सुंदर फूल, सुगंधित इत्र, अचार व मुरब्बा जैसे कई सामान खरीदे। स्त्री सामान खरीदकर मजदूर को उठाने के लिए देती रही और देखते ही देखते उसका टोकरा पूरी तरह भर गया। टोकरा अब इतना भारी हो गया था कि उसे उठाकर चलते हुए भी मजदूर के पैर डगमगा रहे थे।

मजदूर रास्ते भर स्त्री से बातें करता रहा और उसे खूब हंसाता रहा। काफी दूर तक चलने के बाद स्त्री एक विशाल भवन के सामने रुक गई। स्त्री ने उस भवन के बाहर खड़े होकर ताली बजाई, तो एक बेहद सुंदर स्त्री ने दरवाजा खोला। उस स्त्री की सुंदरता देखकर मजदूर भी मोहित हो गया और उसे एकटक देखता रहा। पहली स्त्री के टोकने पर मजदूर ने होश संभाला और सामान लेकर दोनों के पीछे भवन के अंदर चला गया।

मजदूर के भवन के अंदर आने के बाद पहली स्त्री ने दरवाजा बंद कर दिया और दूसरी स्त्री मजदूर को आगे का रास्ता दिखाने लगी। टोकरी के भार से झुक कर चल रहा मजदूर नजरें उठाकर भवन की भव्यता को निहारने लगा। भवन के अंदर एक और बड़ा-सा मकान था। मकान के खंभे बेशकीमती लकड़ी से बने थे और उन पर उकेरी गई नक्काशी भी कमाल की थी। मकान के अंदर एक बड़े से कमरे में पानी का कुंड था, जिसके चारों ओर फव्वारे लगे हुए थे। वहीं, एक कीमती सामानों से सजे एक बड़े से बरामदे के बीचों-बीच लकड़ी का एक सिंहासन रखा था, जिस पर एक स्त्री बैठी हुई थी।

सिंहासन पर बैठी स्त्री भी बहुत सुंदर थी, जो हकीकत में घर की मालकिन थी। मजदूर को बाद में पता चला कि तीनों स्त्रियां बहनें हैं और सिंहासन पर बैठी स्त्री का नाम जुबैदा है, जबकि बाजार से सामान लदवाकर लाने वाली स्त्री का नाम अमीना और दरवाजा खोलने वाली स्त्री का नाम साफी था। जुबैदा ने साफी और अमीना को मजदूर से टोकरी उतरवाने को कहा, तो दोनों ने फटाफट टोकरी को मजदूर के सिर से नीचे उतार दिया। इसके बाद दोनों स्त्रियां टोकरी से सामान बाहर निकालने लगीं और जुबैदा मजदूर को मेहनताना देने के लिए रुपये लेने चली गई।

जुबैदा ने मजदूर को उसके मेहनताने से अधिक रुपये दिए और उससे जाने के लिए कहा। इतने में अमीना ने भी अपना नकाब उतार दिया और सामान लाने के लिए मजदूर का शुक्रिया अदा करने लगी। अमीना को देखकर मजदूर मोहित हो गया और नजर भर उसे देखता रहा। जुबैदा ने मजदूर को टोकते हुए कहा, “क्या तुम्हें मेहनताना कम मिला है और तुम यहां से जा क्यों नहीं रहे हो?” जुबैदा ने मजदूर को और रुपये दिए और दोबारा उससे जाने के लिए कहा।

मजदूर ने अपने चारों ओर देखा और अंदाजा लगाया कि घर में केवल 3 स्त्रियां रहती हैं, लेकिन खाने का सामान और राशन तो 30 लोगों का है। मजदूर ने कुछ देर सोच कर जुबैदा से कहा, “अगर आप बुरा न मानें तो मैं आपसे कहना चाहता हूं कि यहां कई बातें आश्चर्यजनक हैं और सच कहूं, तो मैंने कभी भी आप तीनों जैसी सुंदरियां नहीं देखी हैं। आप इजाजत दें, तो मैं आप लोगों के साथ भोजन करना चाहता हूं।” बातूनी मजदूर अपनी बातों को लेकर कई प्रचलित कहावतें सुनाने लगा और कहने लगा, “जब तक चार लोग साथ में बैठकर भोजन न करें, तो खाने का स्वाद नहीं आता।” तीनों बहनें उसकी बातें सुनकर जोर-जोर से हंसने लगीं।

जुबैदा ने मजदूर से कहा हम 3 बहनें बिना पुरुष के घर अच्छी तरह चला सकती हैं और हम स्वयं ही सभी काम कर लेती हैं, तो हमें किसी चौथे की आवश्यकता नहीं है। जुबैदा ने कहा, “हम नहीं चाहते कि लोग हम बहनों का भेद जानें।” जुबैदा की बात सुनकर मजदूर ने कहा कि वह उस पर विश्वास कर सकती हैं और उन तीनों बहनों का भेद उसके पास सुरक्षित रहेगा। मजदूर की बातें सुनकर जुबैदा को पता चल गया कि मजदूर बातें करने में तेज होने के साथ-साथ चतुर, बुद्धिमान और पढ़ा-लिखा हुआ भी है, लेकिन फिर भी जुबैदा ने उसे वहां से जाने के लिए कहा।

जुबैदा के मना करने के बाद मजदूर अपनी खाली टोकरी उठाकर भवन से जाने लगा, तो अमीना ने उसे रोक लिया। अमीना ने मजदूर का पक्ष लेते हुए जुबैदा से कहा कि यह मजेदार बातें करने में माहिर है और आज रास्ते भर इसने मेरा भरपूर मनोरंजन कर खूब हंसाया है, इसलिए इसे रहने की इजाजत दे दो। अमीना की बातें सुनकर मजदूर ने कहा, “मैं भले गरीब हूं और मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन मैं अपने ऊपर किसी का एहसान नहीं चाहता, इसलिए आप मुझे दिए मेहनताने को स्वीकार कर मुझे यहां रहने की अनुमति दे दें।”

अमीना और मजदूर की बात सुनने के बाद जुबैदा ने मजदूर का मेहनताना लेने से इनकार करते हुए कहा, “हम तुम्हें हमारे साथ बैठकर खाने-पीने की अनुमति दे सकते हैं, लेकिन हमारी बस एक शर्त है कि हम चाहे कुछ भी करें तुम हमसे सवाल नहीं पूछोगे।” जुबैदा की शर्त सुनकर मजदूर ने तुरंत हामी भर दी।

इसके बाद अमीना और साफी ने भोजन की तैयारी कर मेज पर कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन जैसे कोरमा, कोफ्ता, कबाब, सोमरस की सुराही व प्याले आदि रख दिए। मेज पर सामान रखने के बाद दोनों बहनों ने जुबैदा को बुलाया और उसके बैठने के बाद अमीना और साफी भी मेज के आसपास बैठ गईं। जुबैदा ने चौथे स्थान पर मजदूर को बैठने का इशारा किया। चारों ने साथ मिलकर भोजन किया।

भोजन करने के बाद अपने देश के रीति रिवाजों के अनुसार अमीना ने सोमरस की सुराही से पहले अपना प्याला भरा और खुद पी लिया। इसके बाद उसने जुबैदा, साफी और मजदूर को भी सोमरस का एक-एक प्याला दिया। चारों ने साथ बैठकर सोमरस का सेवन किया और फिर प्रसन्नता में गीत गाए। चारों राग-रंग में इतने लीन हो गए कि उन्हें समय का ध्यान ही नहीं रहा और रात हो गई। बाहर अंधेरा देख साफी ने बहनों से कहा कि मजदूर ने अब खा-पी लिया है उसे उसके घर भेज देना चाहिए। जुबैदा ने मजदूर से जाने के लिए कहा, तो यह सुनकर वह निराश हो गया और तीनों बहनों से रात वहीं बिताने देने की विनती करने लगा। अमीना के दोबारा मजदूर का पक्ष लेने पर जुबैदा ने उसे रात वहीं बिताने की अनुमति दे दी।

जुबैदा मजदूर को एक कमरे के पास ले गई जिसके बाहर दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, “इस भवन के भीतर यदि कोई व्यक्ति ऐसे सवाल करेगा, जिससे उसका संबंध न हो, तो उसे क्लेशकारक बातें सुननी पड़ेंगी और वह कष्ट झेलेगा व पछताएगा।” दीवार पर लिखी लाइनों को पढ़ने के बाद मजदूर ने जुबैदा से कहा कि वह आश्वस्त रहे, क्योंकि वह कुछ नहीं पूछेगा।

इसके बाद अमीना रात का खाना लेकर आई और चारों ने दीपक की रोशनी में भोजन किया। भोजन करने के बाद चारों दोबारा से गीत गाकर नाचने लगे। कुछ देर बाद उन्हें आभास हुआ कि कोई दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, तो साफी दरवाजा खोलने चली गई। दरवाजे से वापस आकर साफी ने बताया कि दरवाजे पर एक ही जैसे दिखने वाले 3 फकीर खड़े हैं। साफी ने कहा, “तीनों फकीरों को दाहिने आंख से दिखाई नहीं देता और सभी के सिर, दाढ़ी, मूंछे और भवें मुड़ी हुई हैं। वो तीनों आज रात के लिए यहां ठहरने देने की अनुमति मांग रहे हैं। साफी ने जुबैदा से विनती की कि वह तीनों फकीरों को रहने दे। वो किसी को कोई कष्ट नहीं पहुंचाएंगे।

साफी की बात सुनकर जुबैदा ने उससे कहा कि अगर वह चाहती है कि फकीर यहां रात गुजारे तो ठीक है, लेकिन बस उन्हें हमारे घर में मेहमानी के लिए दीवार पर लिखी शर्तों को समझा देना। जुबैदा से अनुमति मिलने के बाद साफी खुशी-खुशी तीनों फकीरों को घर के अंदर ले आई। अमीना और जुबैदा ने उन्हें झुककर सलाम करने के बाद तीनों का हाल जाना और भोजन करने को कहा।

स्त्रियों के साथ मजदूर को सोमरस पीते देखकर फकीरों ने मजदूर से कहा कि वह अरब का निवासी लगता है और वहां के लोग सोमरस नहीं पीते। यह सुनकर मजदूर को गुस्सा आ गया और वह फकीरों से बहस करने लगा कि उन्हें यह सब कहने का अधिकार नहीं है। चारों को आपस में लड़ता देख तीनों बहनों ने उनसे आपस में न लड़ने के लिए कहा और माहौल का लुत्फ उठाने के लिए कहा। इसके बाद तीनों बहनों, मजदूर और तीन फकीरों ने सोमरस पीकर खूब गाना-बजाना किया। उनके जोर-जोर से हंसी के ठहाकों की आवाज घर से बाहर तक जा रही थी।

इसी बीच उन्होंने सुना कि दरवाजे पर कोई ताली बजा रहा है और साफी पहले की ही तरह दौड़कर दरवाजा खोलने के लिए पहुंची।

शहरजाद ने बादशाह शहरयार व बहन दुनियाजाद से कहा कि जुबैदा के घर के बाहर ताली बजाने वाला शख्स खलीफा हारूं रशीद था, जो रात को व्यापारी का भेष बदलकर अपने महामंत्री जाफर व अन्य के साथ प्रजा का हाल जानने निकला था। मकान के पास से गुजरते हुए उसे स्त्रियों के जोर-जोर के ठहाकों व नाच गाने की आवाज आई, तो उत्सुकतावश खलीफा ने महामंत्री को दरवाजा खुलवाने का आदेश दिया।

आगे की कहानी सुनाते हुए शहरजाद ने बताया कि साफी के दरवाजा खोलते ही महामंत्री ने बहाना लगाया कि वो व्यापारी हैं और देर रात तक उनके सराय में नाच-गाने व सोमरस का सेवन करने के कारण वहां कोतवाल ने छापेमारी कर दी। महामंत्री जाफर ने साफी से कहा कि कोतवाल ने कई लोगों को गिरफ्तार किया और वे बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागे हैं। जाफर ने कहा, “अभी हम वापस सराय नहीं जा सकते और यहां से गुजरते हुए नाच-गाने की आवाज सुनाई देने के बाद पनाह मिलने की आस में उन्होंने ताली बजाई थी।

साफी ने जवाब देते हुए कहा कि वह अपनी बड़ी बहन से इस संबंध में पूछकर उन्हें बताती है कि वे घर में रुक सकते हैं या नहीं। साफी ने जुबैदा और अमीना को व्यापारियों की स्थिति बताई, तो दोनों ने उन्हें घर में रात गुजारने की अनुमति दे दी। भवन के भीतर आने पर खलीफा, जफर व उनके एक और अन्य साथी ने तीनों बहनों व फकीरों का अभिवादन किया। जुबैदा ने मकान में रहने की शर्त बताते हुए कहा कि वो उनकी किसी भी बात का बुरा न मानें और उनसे कोई सवाल न पूछें। इसके बाद जुबैदा ने खलीफा समेत तीनों को सोमरस और खाने की कई चीजें उनके सामने पेश कर दीं।

खलीफा उन तीनों बहनों की अद्वितीय सुंदरता और तेज बुद्धि को देखकर हैरान था। साथ ही वहां मौजूद 3 फकीर व मजदूर खलीफा के मन में बार-बार सवाल पैदा कर रहे थे। अपने वचन से बंधे होने के कारण खलीफा कोई सवाल नहीं कर रहा था। कुछ देर बाद फकीरों ने अपने-अपने देश के पारंपरिक गानों में नाचना शुरू कर दिया।

फकीरों का नाच खत्म होने के बाद जुबैदा ने अमीना को पास बुलाकर कहा, “यहां मौजूद लोग हमारे अधीन हैं और इनकी मौजूदगी से हम अपना दैनिक कार्य नहीं रोक सकते।” जुबैदा की बातों का आशय समझकर अमीना ने जहां सब बैठे हुए थे उस जगह की साफ-सफाई की। अमीना ने खलीफा और उनके साथियों और फकीरों को बरामदे में बैठाया और मजदूर को काम करवाने के लिए साथ ले गई।

अमीना ने बरामदे में एक चौकी बिछाकर मजदूर को एक अंधेरी कोठरी से 2 काले जानवरों को खींचकर बाहर लाने को कहा। दोनों जानवरों को लोहे की जंजीरों से बांधा गया था और उनके गले पर पट्टे बंधे हुए थे। मजदूर दोनों जानवरों को खींचकर बरामदे में ले आया जहां अन्य सभी लोग बैठे हुए थे। इसके बाद जुबैदा गुस्से से दोनों जानवरों को घूरने लगी फिर साफी से अपना चाबुक मांगा। जुबैदा ने मजदूर से एक जानवर को उसके पास लाने और दूसरे को अमीना को थमाने के लिए कहा।

जुबैदा ने चाबुक से जानवर के शरीर पर कई कोड़े मारे और पूरा घर उसके रोने की आवाज से गूंजने लगा। जब उसे मारते हुए जुबैदा थक गई, तो उसने चाबुक फेंक कर खून से लथपथ जानवर को गले से लगा लिया। जुबैदा व जानवर दोनों के आंखों में आंसू भरे थे और दोनों जोर-जोर से रो रहे थे। कुछ देर तक जुबैदा यूं ही उससे लिपटकर विलाप करती रही, फिर उसने एक मखमली रूमाल से जानवर के आंसू पोंछे और उसके माथे को चूम लिया। इसके बाद जुबैदा ने साफी से उसे ले जाने के लिए कहा और दूसरे जानवर को अपने पास बुलाया। उसे भी पहले जानवर की तरह ही जुबैदा ने पहले खूब चाबुक मारे और फिर गले से लगाकर चूम लिया।

ये सब देखकर मजदूर समेत तीनों फकीर, खलीफा और उसके साथी हैरान हो गए, लेकिन अपने वचन से बंधे होने के कारण किसी ने कुछ नहीं पूछा। जानवरों को मारने के बाद जुबैदा थककर बरामदे में जहां चौकी लगी हुई थी वहां आई और फकीरों व खलीफा के साथ चौकी पर बैठकर आराम करने लगी।

कुछ देर बाद जुबैदा ने अमीना को देखकर कुछ इशारा किया और वह हां में सिर हिलाकर एक बड़े से कमरे से मखमली कपड़े में लिपटा संदूक उठाकर ले आई। अमीना ने संदूक से एक बांसुरी निकालकर साफी को दी और वह जुबैदा के कहने पर बांसुरी से वियोग राग की धुन बजाने लगी। जब साफी थक गई, तो उसने बांसुरी अमीना की तरफ बढ़ा दी और उसे बजाने के लिए कहा। अमीना खड़े होकर बांसुरी से मधुर धुन बजाने लगी और बजाते-बजाते धुन में इतनी लीन हो गई कि अपनी सुधबुध खो बैठी। बांसुरी बजाते हुए अमीना की शॉल जमीन पर गिर गई, तो उसके कंधे और बाजुओं पर गहरे घाव की तरह काले निशान दिखाई दिए। यह देखकर खलीफा समेत मजदूर व अन्य लोग हैरान रह गए।

अमीना को डगमगाते देख जुबैदा और साफी ने उसे संभाला और नीचे बैठा दिया। यह दृश्य देखकर खलीफा अपनी उत्सुकता रोक न सका और उसने पहले अपने मंत्रियों को इशारा कर स्त्रियों से इस संबंध में पूछने के लिए कहा। उनकी ओर से स्पष्ट उत्तर न मिलने पर खलीफा फकीरों के पास गया और उनसे पूछने लगा। तीनों फकीर भी एक के बाद एक घट रही अद्भुत घटनाओं को देखकर अचंभित थे। उन्होंने खलीफा को बताया कि वो भी उनसे कुछ देर पहले ही भवन में आए हैं और उन्हें कुछ नहीं मालूम। फकीरों ने मजदूर की ओर इशारा करते हुए कहा, “हमसे पहले यह यहां पहले से मौजूद था। जरूर यह घर का नौकर या इनका साथी होगा और उसे इसके बारे में मालूम होगा।”

खलीफा और फकीरों ने स्त्रियों के पास खड़े मजदूर को इशारे से अपनी ओर बुलाया और उससे इन घटनाओं के बारे में पूछा। मजदूर से भी संतोषजनक जवाब न मिलने पर खलीफा ने कहा, “हम सात पुरुष हैं और ये तीन स्त्रियां। अगर हम इनसे मिलकर भी यह भेद पूछेंगे, तो ये बता देंगी। हम चाहे तो उनसे जबरन भी भेद उगलवा सकते हैं।” खलीफा की यह बातें सुनकर मंत्री ने धीरे से उनसे कहा कि इन स्त्रियों ने हमारा इतना आदर सत्कार किया है और उनकी केवल एक शर्त थी कि अगर वो भी हम न निभा सकें तो यह बईमानी होगी। खलीफा ने मंत्री की बातों को अनसुना कर दिया और फकीरों व मजदूरों के साथ अपनी योजना पर विचार करने लगा।

खलीफा व फकीरों के बहुत जोर देने पर मजदूर तीनों स्त्रियों से घटनाओं के संबंध में पूछने के लिए सहमत हो गया। मजदूर ने हिम्मत कर जुबैदा से पूछने लगा, “मेरे साथी और मैं यहां घटित हुई घटनाओं को देखकर अचंभित हैं। सभी जानना चाहते हैं कि आपने उन 2 जानवरों को बेरहमी से क्यों मारा, जब आपको बाद में पछतावा कर रोना ही था। साथ ही अमीना के कंधे व बाजुओं पर गहरे घाव जैसे निशान कैसे हैं?”

मजदूर की बातें सुनकर बेसुध अमीना को थामे बैठी हुई जुबैदा को बहुत गुस्सा आया। मजदूर का सवाल सुनकर जुबैदा ने गुस्से में तमतमाते हुए उनकी ओर देखा और कहा, “तुम सभी लोग बेईमान हो और तुमने अपना वचन तोड़ा है।” जुबैदा ने कहा, “हमारे घर में आश्रय देने से पहले तुम्हें शर्त के बारे में बता दिया गया था। फिर भी तुम अपने मन की शंकाओं और उत्सुकताओं पर काबू न पा सके। इसका परिणाम अब तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा।”

गुस्से में कांपती हुई जुबैदा ने धरती पर पांव पटका और जोर से तीन तालियां बजाईं और कहा, “जल्दी यहां आओ।” जुबैदा की आवाज सुनते ही एक कमरे का दरवाजा जोर से खुल गया और उसके भीतर से सात बलवान हाथों में तलवार लिए बाहर निकल आए। जुबैदा के आदेश पर सातों बलवान ने खलीफा उसके मंत्रियों, फकीरों और मजदूर को पकड़ लिया और उनकी गर्दन पर तलवारें सटा लीं।

बलवानों के मुखिया ने जुबैदा की ओर देखते हुए कहा कि अगर आपकी आज्ञा हो तो इन सातों को यहीं मौत के घाट उतार देते हैं। जुबैदा ने बलवानों को रुकने का इशारा करते हुए कहा, “मैं पहले यह जानना चाहती हूं कि ये कौन हैं, कहां-कहां से आए हैं और इनके यहां आने का कारण क्या है?” जुबैदा ने आगे कहा कि अगर मुझे किसी की बात पर जरा-सा भी संदेह हुआ, तो उसे यहीं मौत के घाट उतार दिया जाएगा।

जुबैदा की बातें सुनकर और तलवार ताने बलवानों को देखकर खलीफा समेत सभी सातों डर गए। इसके बाद जुबैदा के आदेश पर बलवानों ने सातों को वहीं बरामदे में बैठा दिया। इसके बाद जुबैदा तीनों फकीरों के पास पहुंची और उनसे पूछा कि तुम लोग एक जैसे दिखते हो और एक जैसे वस्त्र पहनते हो, क्या तुम तीनों सगे भाई हो? जुबैदा का सवाल सुनकर एक फकीर ने डर के मारे जवाब दिया, “हम तीनों बेशक एक जैसे कपड़े पहनते हैं, लेकिन हम भाई नहीं हैं। हमारी कहानी सुनकर शायद आपको विश्वास न हो लेकिन हम तीनों अलग-अलग राज्यों के राजकुमार हैं। समय के साथ हमारी एक आंख की रोशनी चली गई और इसी कारण से हम दाढ़ी, मूंछ और भंवों को मुंडवाकर फकीर बन गए। हम तीनों आज शाम ही इस नगर में मिले हैं।” जुबैदा ने यही सवाल अन्य दो फकीरों से भी किया और एक जैसा उत्तर मिला। यह सुनकर जुबैदा का गुस्सा कुछ शांत हुआ। जुबैदा ने कहा, “यहां से जीवित जाने के लिए तुम सभी को अपने-अपने बारे में विस्तार से बताना होगा और झूठ बोलने वाले की गर्दन को धड़ से अलग कर दिया जाएगा।”

फकीरों और जुबैदा की बातें सुनकर खलीफा को मन ही मन अपनी चिंता सताने लगी। खलीफा इस असमंजस में था कि वह जुबैदा को अपनी असलियत बताए या नहीं, क्योंकि उसने अपने मंत्रियों के साथ यहां व्यापारियों के भेष में आश्रय मांगा था। अगर उसे पता चलेगा कि मैं खलीफा हूं, तो न जाने वह उसके साथ कैसा बर्ताव करेगी।

दूसरी ओर फकीरों की बातें सुनकर जुबैदा का गुस्सा कुछ-कुछ शांत होने लगा था। जुबैदा ने बलवानों को आदेश दिया कि वह उन सब की गर्दन पर से तलवार हटा ले और उसकी अगली आज्ञा का इंतजार करें। इसके बाद जुबैदा ने मजदूर से कहा, “तुम हमारे घर में बाकियों से पहले आए थे, तो मैं तुमसे जानना चाहूंगी कि तुम कौन हो? बातों में माहिर हो और बुद्धिमान भी हो फिर भी मजदूरी कर रहे हो?” जुबैदा की बातें सुनकर मजदूर ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की।

मजदूर ने जुबैदा को अपने बारे में क्या बताया? क्या उसकी जान बख्श दी गई? यह जानने के लिए पढ़िए कहानी का अगला भाग।

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