दशा माता की कथा | Dasha Mata Vrat Katha In Hindi

द्वारा लिखित September 7, 2021

Dasha Mata Vrat Katha In Hindi

सालों पहले नल नामक एक राजा राज किया करते थे। उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। दोनों अपने दो बेटों के साथ सुखी जीवन जी रहे थे। राजा के शासन में प्रजा भी काफी समृद्ध और सुखी थी। कुछ समय बाद होली दशा का त्योहार आया। दोपहर के समय जब रानी अपने कमरे में आराम कर रही थी, तो एक ब्राह्मण महिला राजमहल आईं और रानी से मुलाकात करने की इच्छा जताई। आज्ञा मिलने पर उस ब्राह्मणी को रानी के पास ले जाया गया।

रानी के पास पहुंचकर उस महिला ने कहा, “हे महारानी! ये दशा डोरी तुम ले लो।” इस पर वहां खड़ी दासी भी बोली, “हां महारानी, आज होली दशा है और आज के दिन विवाहित महिलाएं दशा माता का व्रत करती हैं। इस व्रत में महिलाएं इसी डोरी की आराधना कर उसे अपने गले में बांधती हैं। इसे बांधने से घर की सुख-शांति बनी रहती है।”

दासी की इस बात को सुनने के बाद रानी दमयंती ने उस डोरी की पूजा कर उसे अपने गले में बांध लिया।
कुछ दिन बीतने के बाद राजा नल ने अपनी पत्नी के गले में उस डोरी को बंधा देखा। उसे देखते ही राजा ने अपनी पत्नी से पूछा, “हे प्रिय! आपके पास इतने सोने के हार होने के बावजूद इस डोरी को क्यों बांध रखा है?”

रानी दमयंती राजा के सवाल का जवाब दे पाती कि इससे पहले ही राजा ने उनके गले से डोरी निकालकर फेंक दी। इसके बाद रानी ने जमीन से डोरी उठाई और कहा, “महाराज! यह कोई सामान्य डोरी नहीं है। यह तो दशामाता की डोरी थी। आपने इसका अपमान करके सही नहीं किया।”

रानी की बात सुनकर राजा ने कुछ नहीं कहा और वहां से चले गए। उसी दिन रात को राजा ने एक सपना देखा। सपने में दशा माता एक बूढ़ी औरत के रूप में आईं और राजा से कहा, “हे राजन! अब तेरी अच्छी दशा समाप्त हो रही है और बुरी दशा की शुरुआत होगी। तुमने मेरा अनादर करके सही नहीं किया।” इतना कह कर वह गायब हो गईं।

इस घटना के बाद, जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, वैसे-वैसे राजा का शौर्य कम होता चला गया। समय के साथ-साथ राजा की संपत्ति और सुख-शांति सब खत्म होने लगी। धीरे-धीरे उनका परिवार भूख से तड़पना लगा।

अपनी इस स्थिति से परेशान होकर एक दिन राजा नल ने अपनी पत्नी से कहा, “आप हमारे दोनों बेटों को लेकर अपने माता-पिता के घर चली जाइए।”

इसपर रानी दमयंती बोलीं, “नहीं स्वामी, मैं इस हालात में आपको अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। आप चाहे जैसी स्थिति में रहें, मैं हमेशा आपके साथ ही रहूंगी।”

यह सुनकर राजा ने कहा, “ठीक है फिर हम किसी दूसरे देश चलते हैं। वहां हम जीवन यापन के लिए कोई काम कर लेंगे।” राजा की बात मानकर रानी दमयंती उनके साथ अपने दोनों पुत्रों को लेकर दूसरे देश जाने के लिए राजी हो गईं।

राजा नल जब अपने परिवार के साथ दूसरे देश जा रहे थे, तभी उन्हें भील नामक राजा का राजमहल दिखा। राजा नल ने भील के यहां अमानत के रूप में अपने दोनों बेटों को छोड़ दिया। इसके बाद वह अपनी पत्नी के साथ आगे का सफर तय करने लगे। कुछ दूर जाने के बाद राजा को अपने दोस्त का घर दिखा। उसे देख राजा नल ने अपनी पत्नी से कहा, “चलो, तुम्हें अपने मित्र से मिलवाता हूं।”

कुछ ही देर में राजा अपने दोस्त के घर पहुंच गए। उनके दोस्त ने दोनों का खूब स्वागत किया। फिर राजा के दोस्त ने अपना कमरा दोनों को सोने के लिए दे दिया। राजा और रानी जब उस कमरे में गए तो उन्होंने देखा कि वहां एक मोर की प्रतिमूर्ति पर हीरों से जड़ा सुंदर-सा हार टंगा है। उसे देखते-देखते दोनों सो गए।

बीच रात अचानक रानी की नींद टूटी। उसने देखा कि वह बेजान मूर्ति हीरे का हार खा रही है। रानी यह देखकर हैरान हो गई और उसने तुरंत राजा को जगाया। राजा नल भी इस दृश्य को देखकर दंग हो गए।

फिर दोनों ने सोचा कि सुबह होने पर अगर दोस्त ने पूछा कि हार कहां गया तो क्या जवाब देंगे। इसी सोच के साथ चोरी के इल्जाम के डर से दोनों रात को ही महल छोड़कर चले गए।

अगली सुबह राजा का मित्र और उसकी पत्नी उस कमरे में गए। वहां उन्होंने देखा राजा नल और रानी दमयंती नहीं थे। तभी उसकी पत्नी की नजर उस मोर की मूर्ति पर पड़ी। हीरे का हार गायब देखकर वो बोली, “आपके मित्र कैसे निकल। हीरे का हार लेकर भाग गए।”

इसपर राजा के दोस्त ने अपनी पत्नी से कहा, “नहीं प्रिय, ऐसा नहीं है। मेरा दोस्त कभी भी चोरी नहीं कर सकता। तुम उसे चोर मत कहो।”

उधर, राजा नल और उसकी पत्नी जब वहां से निकले, तो कुछ ही दूर चलने के बाद रास्ते में राजा की बहन का घर आया। राजा ने एक दूत से अपने बहन के घर खबर भेजी कि उसके भैया और भाभी वहां आए हैं।

राजा की बहन ने दूत से पूछा कि वह दोनों कैसे हैं। इस पर दूत ने बताया, “दोनों पैदल चलकर आ रहे और वो बेहद दुखी भी लग रहे हैं।” दूत की बात सुनकर बहन अपने साथ खाना लेकर उनसे मिलने पहुंची। अपनी बहन से मिलकर राजा नल ने अपने हिस्से का खाना खा लिया, लेकिन उसकी पत्नी ने अपने खाने को उसी जगह जमीन में दबा दिया।

इसके बाद राजा और रानी दोनों वहां से आगे सफर के लिए निकल गए। कुछ दूर जाने के बाद उन्हें एक नदी दिखाई दी। राजा नदी के पास जाकर मछलियों को पकड़ने लगे। कुछ मछलियों को पकड़कर उसने रानी से कहा, “आप ये मछलियों भूनिए, मैं आसपास के इलाके से कुछ और व्यवस्था करके आता हूं।

इतना कहकर राजा एक गांव गए। वहां एक व्यक्ति सभी को भोजन करा रहा था। राजा उसके पास गए और अपने लिए कुछ भोजन मांगकर पत्नी के पास लौटने लगे। तभी रास्ते में एक चील ने उनपर हमला कर दिया और खाना गिर गया। भोजन गिरने के बाद राजा दुखी हो गए। उन्होंने सोचा अगर खाली हाथ जाऊंगा, तो रानी समझेंगी कि मैंने खुद खा लिया और उनके लिए कुछ नहीं लाया।

इधर, रानी भी जब मछलियां भून रही थी, तो वो जिंदा होकर नदी में लौट गईं। यह देखकर रानी भी उदास हो गई। उसे लगा कि जब राजा आएंगे तो मछलियों को न देखकर सोचेंगे कि सारी मछलियां मैं ही खा गई।

तभी राजा वहां पहुंचे और उन्होंने चील वाली बात रानी को बताई और रानी ने मछली के जीवित होने का किस्सा सुनाया। कुछ देर बाद दोनों बिना कुछ खाए ही आगे की ओर चल दिए। आगे बढ़ने के बाद रानी दमयंती का घर आया। यह देख राजा ने अपनी पत्नी से कहा, “तुम्हारा मायका आ गया है। हम दोनों यहां कोई काम ढूंढ लेते हैं।”

रानी ने सिर हिलाते हुए राजा को सहमति दी। कुछ ही दिनों में रानी एक राजमहल में दासी का काम करने लगी और राजा नल भी पास की ही एक तेल की दुकान में लग गए। ऐसे ही दिन बीतते चले गए और होली दशा का त्योहार दोबारा आ गया। पर्व मनाने के लिए सभी रानी और दासी नहाकर तैयार हो गईं।

राजमाता को अपने बाल बनाने थे, इसलिए दासी बनी रानी दमयंती उनकी मदद करने लगी। फिर दमयंती के बाल बिखरे हुए देखकर राजमाता दासी के बाल संवारने की कोशिश कर रही थीं कि उन्हें दासी के सिर पर एक निशान दिखा। उसे देखते ही राजमाता भावुक होकर रोने लगी।

राजमाता को रोता देख दासी ने पूछा, “आप भावुक क्यों हो गईं।”

राजमाता ने जवाब दिया, “मेरी एक बेटी है, जिसके सिर पर ऐसा ही निशान है। यह देख मुझे उसकी याद आ गई।”

यह बात सुनकर दासी ने कहा, “हे माता! मैं ही आपकी वो बेटी हूं। अब मेरी हालत ऐसी हो गई है, क्योंकि मैं और मेरा परिवार बुरी दशा से गुजर रहे हैं। हमें दशा माता का अभिशाप मिला है।”

यह सुन राजमाता ने कहा, ‘बेटी तूने ये सारी बातें मुझसे अबतक छुपाकर क्यों रखी। इसके जवाब में बेटी ने कहा, “अगर मैं यह बात आपको बता देती तो मेरे बुरे दिन समाप्त नहीं होते। आज फिर से दशा माता का व्रत है और मैं यह व्रत रखकर दशा माता से माफी मांग लूंगी।”

तभी राजमाता ने पूछा कि हमारे दामाद कहा हैं। बेटी ने बताया कि वह पास के ही एक तेल के दुकान में काम कर रहे हैं। राजमाता ने तुरंत कुछ लोगों को भेजकर अपने जमाई को महल बुलवाया। फिर उन्होंने अपने जमाई को नए वस्त्र देकर तैयार होने और भोजन करने को कहा।

बाद में मिलकर राजा और रानी दोनों ने दशा माता की पूजा की। पूजा करने बाद राजा नल और रानी दमयंती की अच्छी दशा लौट आई।

दशा ठीक होने के बाद राजा ने अपने ससुराल में कुछ दिन बिताए और फिर अपने राज्य वापस लौटने की इच्छा जताई। दामाद की बात का मान रखते हुए रानी दमयंती के पिता ने काफी धन-संपत्ति देकर बेटी-दामाद को विदा किया।

अपने प्रदेश की ओर लौटते समय रानी उस जगह पर गई जहां उसने मछलियों को भूना था और राजा के भोजन पर चील ने हमला करके गिरा दिया था।

वहां से निकलने के बाद राजा दोबारा अपनी बहन के नगर पहुंचे। यहां पहुंचते ही फिर से एक दूत ने राजा की बहन को बताया कि उसके भैया और भाभी आ रहे हैं। बहन ने उस दूत से उनका हालचाल जाना। इस पर दूत ने बताया, दोनों की दशा अच्छा है और वो खुश लग रहे हैं। यह सुनकर राजा की बहन मोतियों से भरी थाल लेकर भैया और भाभी से मिलने पहुंची।

राजा की बहन को आता देख रानी ने धरती माता से विनती की और अपनी अमानत को वापस मांगा। फिर वह उस जमीन को खोदने लगी जहां उसने जाते समय रोटी और कांदा गाड़ा था। जमीन खोदने पर सोने और चांदी में परिवर्तित रोटी और कांदा निकाला, जिसे रानी ने अपनी ननद को दे दिया।

अपनी बहन से मुलाकात करने के बाद राजा और रानी उसी मित्र के घर पहुंचे, जिसने उन्हें सबसे पहले शरण दी थी। यहां उस मित्र ने पहले की तरह ही राजा और रानी की मेहमान नवाजी की। साथ ही रात में सोने के लिए दोनों को वही कमरा दिया, जो पहले दिया था।

राजा को उस रात नींद नहीं आई और वह मोर की प्रतिमा द्वारा हार निगलने वाली बात के बारे में सोचता रहा। तभी उसने देखा कि वो मोर निगले हुए हीरे के हार को उगल रहा है। उसने तुरंत अपने दोस्त और उसकी पत्नी को जगाया और वह दृश्य दिखाया। यह देख दोनों दंग रह गए। तब राजा ने कहा, “मित्र! तुम्हारे हार को इस मोर ने खाया था और तुमने सोचा होगा कि इसे हम चुराकर भाग गए।”

अपने दोस्त को सच्चाई बताने के बाद राजा और रानी महराज भील के पास पहुंचे और अपने बेटों को वापस मांगा। यहां राजा भील ने उन्हें लौटाने मना कर दिया। इस पर गांव के लोगों ने कड़ा विरोध जताया, जिसके बाद राजा भील ने बेटों को लौटा दिया।

फिर राजा नल और रानी दमयंती अपने बेटों के साथ नगर की ओर लौटने लगे। अपने राज्य पहुंचते ही वहां के लोगों ने धूमधाम से राजा का स्वागत किया। इसके बाद राजा पहले की ही तरह खुशी-खुशी अपने परिवार और प्रजा के साथ जीवन व्यतीत करने लगे।

कहानी से सीख – हमें कभी भी भगवान का अनादर नहीं करना चाहिए। ऐसा करने पर बुरे परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।

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