मुंशी प्रेमचंद की कहानी : वासना की कड़ियां | Wasna Ki Kadiyan Premchand Story in Hindi

द्वारा लिखित July 27, 2021

Wasna Ki Kadiyan Premchand Story in Hindi

मुल्तान की लड़ाई को जीतने के बाद घमंड में चूर कासिम चला आ रहा था। शाम हो गई थी और सारा लश्कर आरामगाह की तलाश में था, लेकिन कासिम अपने मालिक की सेवा करने के ख्यालों में था। वो उन तैयारियों के बारे में सोच रहा था जो उसके स्वागत के लिए दिल्ली में की गई होंगी। सड़कें झंडियों से सजी होंगी, गलियों, चौराहों और नौबतखाने (फाटक या द्वार के ऊपर का वह स्थान जहां वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं) के ऊपर गीत गाए जाएंगे। जैसे ही मैं शहर के अंदर दाखिल होउंगा, शहर भर में मेरे स्वागत के लिए लोग खुशी से चिल्लाने लगेंगे। तोपों की सलामी दी जाएगी। शहर की सारी सुंदर स्त्रियां मुझे ही देखेंगी और मेरे ऊपर फूलों की बारिश करेंगी। बड़े-बड़े लोग मेरे स्वागत के लिए महल के द्वार तक आएंगे। मेरे दरबार में पहुंचते ही हुजूर जैसे ही मुझे गले लगाने के लिए उठेंगे मैं उनके पैर चूम लूंगा। आह, वो समय कब आएगा?

कासिम ने इन्हीं खयालों में झूमता हुआ घोड़े को भगाया और सारे कैदियों के झुंड, घायल सिपाहियों को, लश्कर को भी पीछे छोड़ दिया। लश्कर के आगे मुल्तान के राजा की बेगमें और शहजादियां और उनके नौकर चाकर थे। इन सवारियों के आगे और पीछे हथियारबंद ख्वाजा सहराओं का एक बड़ा दल था। कासिम अपनी धुन में घोड़े को आगे बढ़ाए जा रहा था। तभी अचानक उसने एक सजी हुई पालकी में से दो आंखों को बाहर झांकते हुए देखा। कासिम दो पल के लिए चौंक सा गया। उसे अपने दिल में एक कंपकंपी सी महसूस हुई। वो नजरें कासिम के दिल के किसी एक कोने में घर कर गई। उसके सामने वही दो आंखें घूम रही थी। उसके दिल में एक मीठी-मीठी चुभन सी, एक बेसुधी सी होने लगी। उसका रोने को मन कर रहा था। उसके दिल में दर्द का एहसास जाग गया था, जो प्यार की पहली मंजिल होती है। थोड़ी देर बाद कासिम ने हुक्म दिया- ‘आज हमारा यही ठहराव होगा’।

आधी रात गुजर चुकी थी और लगभग सारे लश्कर के आदमी गहरी नींद सो चुके थे। पड़ाव के चारों ओर मशालें जलती दिख रही थीं। जो जवान सुरक्षा में थे वो भी जाम्हाइयां ले रहे थे, लेकिन एक कासिम था कि उसकी आंखों में नींद बिल्कुल न थी। वो अपने आरामदायक खेमे में बैठे हुए सोच रहा था कि क्या उस स्त्री को एक नजर देख लेना कोई गुनाह है? माना कि वो मुल्तान की शहजादी हैं और मेरे हुजुर उसे अपने महल में रखना चाहते हैं, लेकिन मेरी इच्छा तो बस उसे देखने भर की है। अगर ये गुनाह है तो मैं ये गुनाह करूंगा। अभी भी तो हजारों बेगुनाहों को मारकर के लौटा हूं और किसी को एक नजर देख लेना उन कत्लों से बड़ा गुनाह नहीं हो सकता।

वैसे भी कासिम मुल्तान को फतेह करने वाला हीरो था। वो देर रात तक इसी तक इसी विषय पर सोचता रहा। फिर कासिम ने अपने खेमे से बाहर निकलकर बेगमों के खेमे को देखा, जो थोड़ी दूर पर ही थे। कासिम ने अपना खेमा इन खेमों के नजदीक जानबूझकर लगवाया था। बेगमों के खेमे के बाहर पांच सैनिक पहरा दे रहे थे। कासिम ये सोचने लगा कि इन सैनिकों को क्या नींद नहीं आती? खेमे के चारों ओर इतनी रोशनी क्यों कर रखी है। कासिम ने अपने खास को आवाज लगाई – मसरूर। मसरूर कासिम के पास आकर बोला- जी हुजूर? कासिम ने बोला- ये मशालें बुझा दो मुझे नींद नहीं आ रही। मसरूर- जैसी आपकी मर्जी। यह कहकर मसरूर वहां से चला गया और मशालें बुझ गई। थोड़ी देर बाद एक सेविका शहजादी के खेमे से निकलकर बाहर आई और मसरूर से मशालें बुझाए जाने की वजह पूछी। मसरूर ने कहा – सिपहदार ने ऐसा करने को कहा है, तुम लोग चौकन्ने रहना, मुझे तो उनकी नियत में खोट मालूम होती है।

कासिम काफी व्याकुल था, वो कभी लेट जाता तो कभी टहलने लगता। वह बार-बार अपने खेमे के बाहर आकर देखता, लेकिन पांचों पहरेदार अपनी बड़ी-बड़ी तलवारें लिए पहरे पर अटल थे। इसके बावजूद कासिम पर यही धुन सवार थी कि आखिर शहजादी के दर्शन कैसे हों? इसके आगे उसे ना बदनामी दिख रही थी और ना ही शाही गुस्से का डर। घड़ियाल ने रात के एक बजाए, जिससे कासिम चौंक गया, जैसे कोई अनहोनी हो गई हो। कासिम इस सोच में पड़ गया कि अब तो कुछ ही घंटों में सुबह हो जाएगी। तीन-चार घंटों में तो लश्कर भी कूच (एक जगह से दूसरे जगह जाना) कर देगा। कासिम ये सोचने लगा कि अब वक्त कम है, कल तक तो दिल्ली पहुंच जाएंगे। ऐसा ना हो कि सारे अरमान दिल में ही रह जाएं। किसी तरह से इन पहरेदारों को चकमा देकर ये काम किया जाना चाहिए। कासिम ने एक बार फिर मसरूर को आवाज लगाई।

मसरूर- “जी हुजूर कहिए?”

कासिम- “बाहर कैसी ठंड है नींद आ रही होगी ना?”

मसरूर- “जी नहीं जब आपने ही आराम नहीं किया तो मुझे कैसे नींद आ सकती है।”

इस पर कासिम ने कहा- “मसरूर, मैं तुम्हे कुछ तकलीफ देना चाहता हूं। तुम्हारे साथ जो ये पांच आदमी हैं, जरा उनके साथ लश्कर का चक्कर लगा आना। रात में कुछ सिपाही जुआ या फिर पास के गांवों में चले जाते हैं, पर काम जरा होशियारी से करना।”

मसरूर- “पर हुजूर यहां तो पहरेदारी के लिए कोई नहीं बचेगा?”

कासिम- “जब तक तुम नहीं आ जाते तब तक मैं यहां रहूंगा।”

मसरूर ने धीमी आवाज में कहा- “हुजूर मैं आपकी सभी चालों को समझता हूं।”

इसके बाद पांचों सैनिक लश्कर की तरफ चले गए। रास्ता साफ था, लेकिन अब कासिम को इस बात का ध्यान आया कि अंदर जाना उतना आसान नहीं है जितना वो समझ रहा था।

अब चारों तरफ सन्नाटा था और कासिम दबे पांव शहजादी के खेमे की ओर आया। खेमे के पास आकर पहले कासिम ने ये तस्सली कर ली कि कोई हो ना। जब उसे इत्मीनान हो गया तो उसने चाकू निकाला और कांपते हुए खेमे की रस्सियां काट दी। अब खेमे के अंदर जाने का रास्ता बन आया तो उसने अंदर एक दीपक जलता हुआ देखा और फर्श पर सोई हुई दो दासियों को पाया। शहजादी एक आरामदायक मखमली गद्दे पर लेटी हुई थी। कासिम ने अपनी हिम्मत बढ़ाई और सरक कर खेमे के अंदर घुस गया। वो दबे पांव शहजादी के पास गया और उसे देखने लगा। अब उसके अंदर वो डर नहीं था जो खेमे के अंदर घुसते वक्त हुआ था। करीब एक मिनट तक बिना पलक झपके कासिम शहजादी को देखते रहा। कासिम शहजादी की खूबसूरती को देखकर देखता ही रह गया। उसकी बेचैनी ने अब इच्छा का रूप धारण कर लिया। उस बेचैनी में एक व्याकुलता थी। एक पीड़ा थी जो उसे आनंद दे रही थी। कासिम का दिल उस खूबसूरत शहजादी के पैरों में सिर रखने का कर रहा था, रोने को हो रहा था, यहां तक कि उसका दिल उस सुंदरी के कदमों में अपनी जान देने का कर रहा था। उसके मन में अजीब सा एहसास होने लगा और वह वासना की लहरों में फंसता चला गया।

कासिम करीब आधे घंटे तक उस सुंदरी के पैरों के पास अपना सिर झुकाए बस यही सोचता रहा कि आखिर कैसे उसे जगाए। वो जैसे-जैसे करवट बदलती कासिम का कलेजा मुंह को आ जाता। कासिम ने जिस दिलेरी, जिस बहादुरी से मुल्तान को जीता था, धीरे-धीरे वो दिलेरी उसका साथ छोड़े जा रही थी। फिर अचानक कासिम ने एक गुलाबपोश (गुलाब जल रखने का पात्र) को देखा, जो एक चौकी पर रखा हुआ था। उसने गुलाबपोश उठाया और फिर सोच में पड़ गया कि शहजादी को जगाऊं या नहीं? अंत में हिम्मत कर कासिम ने शहजादी के चेहरे पर गुलाब जल के कई छींटे डाले, जिससे शहजादी की नींद खुली और उसने अपने सामने कासिम को पाया। कासिम को देखकर उसने फौरन अपना चेहरे पर नकाब डाला और धीरे से मसरूर को आवाज लगाई।

इस पर कासिम ने कहा- “जी वो मसरूर तो यहां नहीं है, लेकिन आप मुझे अपना ही खादिम समझिए।”
शहजादी ने अपना नकाब ठीक किया और खेमे के एक कोने में जाकर खड़ी हो गई। कासिम को आज पहली बार अपनी वाक-शक्ति (बोलने की शक्ति) को लेकर यह एहसास हुआ कि वो कितना गंभीर आदमी है। उसे अपने जज्बात बयां करने में हमेशा झिझक होती थी।

कासिम ने कहा- “मैं जानता हूं कि मैंने गलती की है, आप इसकी जो सजा सही समझें वो मुझे मंजूर होगी।” कासिम ने शहजादी के सामने आह भरते हुए कहा- “मैं ही वो बदनसीब इंसान हूं, जिसने आपके बुजुर्ग पिता और भाइयों को मारा है। मेरे ही हाथों से मुल्तान के हजारों जवान भी मारे गए। सल्तनत तबाह हो गई और आपको ये दिन देखना पड़ा, लेकिन आपका ये मुजरिम आपके सामने है। आपके एक इशारे पर मैं आपके लिए न्योछावर हो जाऊंगा। मुझे ये आज मालूम हुआ कि कैसे बहादुरी के पर्दे में मन की इच्छा इंसान से किस तरह के पाप करवाती है। काश! मेरी ये आंखे पहले खुली होती।” कासिम ने अपने दिल का सारा हाल शहजादी के सामने कह दिया भावनाओं में उसने अपने दिल की पीड़ा का ऐसा वर्णन किया कि उसके पास जो शब्द थे वो भी खत्म हो गए। अपने दिल की बात कहने की उसकी सारी इच्छा पूरी हो गई।

कासिम वहां से हिला तक नहीं, बल्कि उसने अपनी आरजुओं के लिए एक कदम और आगे बढ़ाया। मेरे इस पूरे विवरण का फायदा ही क्या? अगर हाले दिल ही सुनाना होता तो किसी तस्वीर को सुना देता। वो तस्वीर मेरी कहानी को ज्यादा ध्यान से और खामोशी से सुनती। कासिम के दिलो दिमाग में बस यही चल रहा था कि काश मैं भी इस सुंदरी की आवाज सुन पाता। मेरे इस दर्द का उसके दिल पर क्या असर हुआ ये मालूम हो पाता। काश! उसे इस बात का एहसास होता कि जिस आग में मैं जल रहा हूं, उसकी थोड़ी सी आंच उधर भी पहुंच पाती। उसकी आवाज कितनी मीठी होगी। इस सुंदर शहजादी की आवाज सुनने में कितना मजा आएगा। अगर कहीं वो भी मुझसे प्यार करती होगी तो फिर मुझसे खुशनसीब इस दुनिया में कोई और ना होगा।

इन्हीं खयालों में कासिम दिल ही दिल खुश हुए जा रहा था। इन सबके बीच कासिम को दासियों के जागने और मसरूर के वापस आ जाने की धक-धक लगी हुई थी। कासिम ने कहा- “ए हुस्न की मल्लिका, ये खादिम (सेवक) आपकी कृपा का अधिकार रखता है, इसपे कुछ रहम नहीं करेंगी आप?”
इसपर शहजादी ने नकाब की अंदर से ही कहा- “जो खुद रहन पाने का अधिकारी हो वो दूसरों पर क्या रहन करेगा ? मैं वो पंछी हूं जिसके ना बोल हैं ना पर।”

शहजादी ने कहा- “मुझे मालूम है कि कल शाम को मैं उस जालिम बादशाह के आगे हाथ बांधे खड़ी रहूंगी। कौन शख्स ऐसी जिंदगी की इच्छा रखेगा?” आगे शहजादी ने आह भरते हुए कहा- “मुल्तान की शहजादी एक जालिम और पापी इंसान की वासना का शिकार होने को मजबूर है। आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। मैं तो हूं ही बदनसीब ऐसा ना हो कि आपको भी मेरे साथ-साथ शाही गुस्से का शिकार बनना पड़े। दिल में तो बहुत बातें हैं पर क्यों कहूं, उससे क्या ही हासिल हो जाएगा? आप बहादुर भी हैं और आप में खुद्दारी भी है, खुदा आपको बरकत दे। मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। मुझे आज मालूम हुआ कि मुहब्बत कितनी पाक है, जो उस दामन में भी मुंह छुपाने से परहेज नहीं करती जो मेरे अपनों के खुन से सना पड़ा है। आपसे मेरी बस यही विनती है कि आप इस गरीब को भूल मत जाना। ये पल मेरे दिल में हमेशा एक मीठी याद बनकर रहेगा। उस कैद में यही सपना मेरे दिल को सुकून दिया करेगा। अब आप इस सपने को तोड़िए मत और खुदा के वास्ते जाइए यहां से, इससे पहले की मसरूर आ जाए। वो बड़ा ही जालिम किस्म का है। मुझे तो ये आशंका है कि उसने आपको धोखा दिया है, इसमें भी कोई शक नहीं कि कहीं वो यहां ना छिपा बैठा हो, उससे आप थोड़ा होशियार रहिएगा। अब आप जाइए, खुदा हाफिज।”

ये सब सुनने के बाद कासिम ख्यालों में डूब गया। उसने जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था वो पूरा हो गया। वो गर्व से फूला न समा रहा था। वो अपने आप को दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान समझ रहा था।

कासिम के दिल ने कहा- मैं इस खूबसूरत स्त्री के लिए क्या कुछ नहीं कर सकता? मैं क्यों डरूं बादशाह से? मैं बादशाह का गुलाम नहीं हूं। मेरी बहादुरी की किसी भी दरबार में कद्र हो सकती है। मैं इस गुलामी की जंजीर को तोड़ डालूंगा और एक ऐसे देश में जाकर बस जाऊंगा जहां बादशाह तो क्या उसके परिंदे भी ना आ सकें। हुस्न का आशीर्वाद हो तो मुझे किसी और चीज की इच्छा नहीं। मैं अपनी इच्छाओं का गला क्यों घोटूं? इन्ही विचारों को मन में सोचते हुए कासिम ने तलवार निकाली और बोला- “जब तक मुझमें दम है तब तक आपकी ओर कोई आंख उठाकर भी नहीं देख सकता। चाहे फिर वो बादशाह ही क्यों ना हो। मैं दिल्ली के हर कूचे में खून की नदियां बहा दूंगा, पूरी सल्तनत को तबाह कर दूंगा, अगर कुछ नहीं कर पाया तो मर मिट जाऊंगा पर आपका अपमान होते नहीं देखूंगा।”

शहजादी धीरे-धीरे कासिम के करीब आई और बोली- “आप पर पूरा भरोसा है मुझे पर आपको मेरी लिए थोड़ा तो सब्र करना होगा। आपकी खातिर में हर तरह की तकलीफ सह लूंगी। आपका प्यार ही मेरी हिम्मत बनेगा। इस बात का यकीन है कि आप मुझे अपना समझते हैं मेरा सहारा बनेंगे। ना जाने तकदीर हमें फिर मिलाए या नहीं।”

इस पर कासिम ने अकड़ते हुए कहा- “हम लोग दिल्ली जाएं ही क्यों भरतपुर जा सकते हैं?”
शहजादी ने कहा- “पर हिंदुस्तान से बाहर थोड़े ना जा सकते। जंगलों और वीराने में जिंदगी चैन से नहीं बीतेगी। आप असलियत से मुंह मत मोड़िए। माना खुदा ने आपको बहादुरी बख्शी है, पर तेग-ए-इस्फ़ानी भी तो पहाड़ से टकराएगी तो टूट ही जाएगी।”

शहजादी की बात सुनकर कासिम का जोश थोड़ा ठंडा हुआ। कल्पना की दुनिया का जो भ्रम उसकी आंखों पर था वो हट गया। उसे अपनी बेबसी साफ-साफ दिखाई देने लगी। कासिम बोला- “अगर आपको मेरे साथ जंगलों में जिंदगी बिताना पड़े तो क्या? मुहब्बत में तो दुनिया की नेमतें भी फीकी लगती हैं।” इस पर शहजादी ने कहा- “पर मुझे ये मंजूर नहीं कि अपनी भलाई के लिए मैं आपकी जान खतरे में डालूं। खुदा वो दिन कभी ना लाए जिससे कि आपका बाल भी बांका हो। आपकी खैरियत और बहादुरी की खबरें ही मुझे उस कैद में तसल्ली देंगी। मैं आपकी खातिर वो सब सह लूंगी, ताकि अगर कभी मौका मिले तो आपसे दो-चार बातें कर सकूं।”

यह सब सुनने के बाद भी कासिम वहां से हिला तक नहीं। उसकी इच्छाएं उम्मीद से बढ़कर पूरी हुए जा रही थी। उसने सोचा कि अगर मुहब्बत की ये बहार चंद लम्हों की मेहमान है तो फिर उन लम्हों को आगे का सोच कर बर्बाद क्यों करना। अगर तकदीर में इस हुस्न की मल्लिका को पाना नहीं लिखा है तो फिर ये मौका क्यों हाथ से जाने दूं? कौन जाने मुलाकात का मौका फिर मिले या ना मिले? यह सब सोचने के बाद कासिम ने कहा- “अगर आपका यह आखिरी फैसला है तो मेरे लिए सिवाय मायूसी के क्या चारा रहेगा। पर बस आप एक पल के लिए ही सही पर मेरे पास आकर बैठ जाइए, ताकि मेरे बेकरार दिल को थोड़ी तसल्ली मिल जाए। आइए एक पल के लिए हम ये भूल जाएं कि जुदाई की यह घड़ी हमारे सामने खड़ी है। आइए ये पल साथ मिलकर बिताएं। आप अपनी खूबसूरत हाथों से हमें शराब पिलाएं।”

कासिम सब चीजों से बेखबर शराब पीता रहा। उसने इतनी शराब पी ली कि उसकी गर्दन झुक गई और आंखें लाल हो गईं। वो पूरी तरह से नशे में था। फिर अपनी लालसा भरी आंखों से वो शहजादी की तरफ बढ़ा ही था कि घड़ियाल ने सुबह के चार बजाते हुए जोर से कूच के डंके को बजाया, जिसकी दिल छेदने वाली आवाज कासिम के कान में आई। कासिम की बांहें खुली की खुली रह गई। दासियां भी उठ बैठी और शहजादी भी वहां से उठ खड़ी हुई। बेचारा कासिम अपने दिल की इच्छाएं लिए खेमे से बाहर निकल आया। जब वो अपने खेमे में आया तो उसका दिल कई सारी इच्छाओं से भरा हुआ था। उससे रहा नहीं गया और कुछ देर बाद उन इच्छाओं ने लालसा का रूप भरा और अब जब वो बाहर निकला तो उसका मन बुरी इच्छाओं और लालच से भरा हुआ था। उसके मन की इच्छाएं उसकी आत्मा के लिए लोहे की जंजीर बन गई थी।

शाम का वक्त था और दिल्ली की सड़कें झंडियों से सजी हुई थीं। जिन पर कासिम मुल्तान के मोर्चे को जीतकर गर्व के नशे में चूर चला आ रहा था। गुलाब और केवड़े के फूलों की खुशबू दिल्ली की सड़कों पर चारों तरफ फैली हुई थी। नौबतखानों में सुहाना राग गाया जा रहा था। तोपों ने मोर्चे की अगुवाई में अपनी आवाज बुलंद की। नगर की सुंदरियां खिड़कियों से देख रहीं थी। फूलों की बारिश हो रही थी। जब कासिम शाही महल के पास पहुंचा तो बड़े-बड़े अमीर लोग उसके स्वागत के लिए कतार में बंधे खड़े थे। ऐसे सत्कार के बीच जब वो दिवाने खास में पहुंचा तो उसका दिमाग उस वक्त सातवें आसमान पर था।

बादशाह के पास पहुंचते ही उसने शाही तख्त को चूम लिया। बादशाह भी मुस्कुराते हुए अपने तख्त से उतरे और कासिम को गले लगाने के लिए आगे बढ़े। कासिम अपने हुजूर के पैर चूमने के लिए झुका ही था कि मानों उसके सिर में एकाएक जैसे कोई बिजली गिरी। बादशाह का खंजर उसकी गर्दन पर पड़ते ही उसका सिर शरीर से अलग हो गया। खून के छींटे बादशाह के पैरों में, तख्त पर और उसके पीछे खड़े मसरूर की तरफ गिरे।

नीचे पड़ा धड़ एक पल में ही ठंडा हो गया, लेकिन हसरत की मारी हुई दोनों आंखें देर तक दीवारों की तरफ ताकती रहीं। थोड़ी देर में वो भी बंद हो गईं। लालसा ने तो अपना काम पूरा कर दिया था अब तो बस सिर्फ हसरत बाकी थी, जो सालों तक दीवाने खास की दीवारों पर रही और जिसकी झलक अभी भी कासिम की मजार (कब्र) पर घास-फूस की शक्ल में नजर आती है।

कहानी से सीख :

‘वासना की कड़ियां’ कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि वासना (बुरी इच्छा) बड़े से बड़े बहादुर व्यक्ति को भी के अंत की ओर ले जा सकती है। किसी भी स्त्री को बुरी नजर से देखने वाले व्यक्ति का कभी भी भला नहीं होता, बल्कि उसका अंत ही होता है।

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