मुंशी प्रेमचंद की कहानी : निर्वासन | Nirvaasna Premchand Story In Hindi

द्वारा लिखित July 27, 2021

Nirvaasna Premchand Story In Hindi

परशुराम ने मर्यादा से कड़ी आवाज में कहा, “दहलीज में रूक जाओ।”

मर्यादा ने पूछा, “ऐसा क्या हो गया कि मुझे दहलीज में रुकने के लिए कह रहे हो। मुझे छूत लग गया क्या?”

“तुम्हें घर के अंदर आने से पहले यह बताना होगा कि इतने दिनों से कहा और किसके साथ थी। अब यहां कैसे और किसके साथ आई हो?”, परशुराम ने पूछा।

मर्यादा बोली, “इन बातों को पूछने का बाद में समय नहीं मिलेगा क्या?”

परशुराम कहने लगे, “नहीं, तुम्हें अभी जवाब देना होगा। हम दोनों साथ में ही नदी से बाहर निकले थे। तुम मेरे पीछे चल रही थी, लेकिन अचानक कहां चली गई थी?”

दुखी आवाज में मर्यादा बोलने लगी, “आपने देखा नहीं था कि वहां अचानक नागा पंथ के साधुओं का हुजूम आ गया था। सारे लोग इधर-उधर दौड़ रहे थे। तभी मुझे धक्का लगा और मैं न जाने किस दिशा में चली गई। जैसे ही थोड़ी भीड़ कम होने लगी, मैंने आपको खूब पुकारा। ”

“अच्छा तब क्या हुआ”, परशुराम ने पूछा।

आप कहीं भी नहीं दिखे, तो मैं रोने लग गई।  संध्या तक वहीं बैठी। फिर एक लड़के ने आकर मुझसे पूछा कि तुम खो गई हो? मैंने जैसे ही हां कहा, तो उसने मुझसे घर का पता और पति का नाम पूछकर एक डायरी में लिख लिया। फिर मुझे कहा कि तुम्हें घर तक हम पहुंचा देंगे। बस तुम अभी मेरे साथ चलो। मेरे पास कोई रास्ता भी नहीं था, तो मैं उसके साथ चल दी।

परशुराम ने एकदम पूछा, “वो तुम्हें कहां ले गया और वो कौन था?”

मर्यादा बोली, “वो एक समिति का सेवक था, जो मुझे अपने कार्यलय लेकर गया था। वहां उनका अध्यक्ष और कई सारे स्वयं सेवक थे। उन्होंने मेरा पता एक रजिस्टर में लिखा और एक घर में भेज दिया, जहां खोई हुई कई सारी महिलाएं थीं।”

परशुराम ने सवाल किया, “तुमने उस अध्यक्ष से तभी क्यों नहीं कहा कि मुझे घर भेज दीजिए?”

मर्यादा ने कहा, “मैंने कई बार उनसे मुझे घर पहुंचाने के लिए कहा, लेकिन वो बार-बार यही कहते थे कि मेला खत्म होने के बाद वो सारी महिलाओं को एकसाथ ही घर भेजने की व्यवस्था करेंगे। इसकी वजह पैसे और लोगों की कमी थी। मैंने उन्हें कहा कि मेरे गहने ले लीजिए और घर पहुंचा दीजिए। इन गहनों के अलावा भी मैं और ज्यादा पैसे दे सकती हूं। बस मुझे मेरे पति के पास तक पहुंचा दो, लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी और मुझे भी अन्य स्त्रियों के बारे में जब पता चला तो थोड़ा राहत मिल गई थी।”

परशूराम बोले, “ ठीक है, लेकिन तुमने मुझे तार क्यों नहीं लिखवाया?”

मर्यादा ने बताया कि मैं पूरी रात उन महिलाओं के साथ उसी कमरे में थी। अगले दिन मैंने सोचा कि जब ये लोग मुझे घर भेज ही देंगे, तो तार की क्या जरूरत।

फिर परशुराम पूछने लगे, “रातभर सारी महिलाएं एक ही कमरे में थीं, तो कमरे में युवक भी आते-जाते रहे होंगे?”

मर्यादा ने जवाब दिया, “नहीं-नहीं, केवल एक बार कोई युवक खाने के लिए पूछने आया था। जब सबने खाना खाने से मना कर दिया, तो वो लौट गया। उसके बाद एक महिला के पेट में दर्द उठा था, तो अध्यक्ष साहब दो-तीन बार दवा पिलाने कमरे में आए थे।”

झट से परशुराम ने कहा, “देखो अब निकली न असली बात। मैं इन लोगों को खूब अच्छे से जानता हूं।”

मर्यादा नाराज होते हुए बोलती है, “आप किसी सज्जन व्यक्ति पर ऐसे आरोप नहीं लगा सकते हैं। वो मेरे पिता जी के उम्र के थे। दूसरा उनकी आंखें हमेशा नीचे रहती थीं।”

परशुराम बोले, “हां, वहां के सारे आदमी देवता थे। तुम ये बताओ कि अगले दिन क्या हुआ?”

मर्यादा ने कहा, “अगले दिन भी मैं वहीं रही। दिन के समय एक स्वयंसेवक हम सभी महिलाओं को कई पवित्र स्थल लेकर गए। लौटकर सबने खाना खाया।”

परशुराम ने पूछा, “तुम वहां महिलाओं के साथ आनंद लेती रही? मेला तो अगले दिन ही खत्म हो गया होगा न? खाना खाने के बाद तो गाना-बजाना भी हुआ होगा?”

मर्यादा ने बताया, “नहीं, गाना-बजाना तो नहीं हुआ, लेकिन सारी महिलाएं अपने दुख के बारे में बात करती रहीं। शाम को मेला उठा, तो उसके बाद दो सेवक सारी महिलाओं को स्टेशन लेकर गए।”

परशुराम बोले, “तुम तो यहां सातवें दिन आई हो और वो भी अकेली ही।”

मर्यादा बोली, “हां, स्टेशन में कुछ दुर्घटना हो गई थी, जिस वजह से देरी हो गई।”

परशुराम ने कहा, “क्या हुआ था?”

मर्यादा ने बताया कि जैसे ही वो सेवक टिकट लेने गया, तो एक आदमी ने कहा कि गोपीनाथ धर्मशाला में एक इंसान ठहरा हुआ है, जिसकी पत्नी खो गई है। उसने जैसा हुलिया बताया वो मुझसे मिलता था। उस आदमी ने मुझे देखकर कहा कि आप उनकी पत्नी जैसी लग रही हैं।

मैंने उससे पूछा कि क्या तुम बाबूजी को पहचानते हो? उसने जवाब दिया, मैं उनको नहीं जानता, तो आपको क्यों खोजता? आपका बच्चा काफी रो रहा है। तब सारी औरतों ने कहा कि चली जाओ, तुम्हारे पति परेशान हो रहे होंगे। उन स्वयं सेवकों ने उस व्यक्ति से दो-तीन बातें पूछकर मुझे उसके साथ भेज दिया।

दिल खुश था कि अब अपने परिवार से मिलूंगी, लेकिन मेरा भाग्य ऐसा कि मैं किसी गलत इंसान के हाथ पड़ गई।

परशुराम ने हैरान होकर पूछा कि आखिर कौन था वो, जिसके साथ तुम चली गई?

मर्यादा ने कहा कि मुझे लगा कि वो कोई दलाल ही रहा होगा।

परशुराम ने सवाल किया कि तुमको इतना होश नहीं हुआ कि उसे कह दूं कि बाबूजी को यहीं भेज दो?

मर्यादा ने तुरंत बोली, “मेरी बुद्धि काम ही नहीं कर रही थी।”

“अब तुम फिजूल की बातें मत करो और यह बताओ कि वो आदमी तुम्हें कहां ले गया?”, परशुराम बोले।

मर्यादा, “मुझे लज्जा आती है, क्या बताऊं आपको।”

परशुराम, “तुम्हें तो यहां आने पर और भी लज्जा आनी चाहिए।”

मर्यादा बोलने लगी, “देखिए, मुझे किसी ने छुआ तक नहीं है। भगवान की कसम खाकर कहती हूं।”

परशुराम ने पूछा कि क्या तुम उसका चेहरा कैसा था बता सकती हो?

मर्यादा ने बताया, “ वो छोटे कद का गहरे रंग का आदमी था। लंबा सा कुर्ता पहना हुआ और गले में ताबीज भी थी।”

परशुराम ने कहा, “अरे! वो तो धर्मशाला में झाड़ू देने वाला था। मैंने उसको तुम्हारे खोने की जानकारी दी थ। उसने इस बात का इस तरह से फायदा उठाया।”

मर्यादा बोली कि वो तो ब्राह्मण जैसा लग रहा था।

परशुराम कहने लगे, “नहीं-नहीं वो मेहतर यानी झाड़ू देने वाला ही था। वो तुमको अपने घर लेकर गया था?”

मर्यादा ने बताया कि उसने पहले मुझे एक तांगे पर बैठने को कहा और फिर एक तंग गली से किसी मकान में ले गया। उसने फिर कहा कि तुम्हारे बाबूजी यही आएंगे।

फिर मुझे लगा कि उसने मुझे झांसा दिया है। कुछ देर बाद एक बुढ़िया आई और मुझे लालच देने लगी। पूरी रात मैं रोती ही रही। अगले दिन बुढ़िया ने कहा कि तुम रोकर मर भी जाओगी, तो भी तुम्हारी मदद के लिए कोई नहीं आएगा। उस झाड़ू मारने वाले और बुढ़िया ने कहा कि तुम्हारा एक घर छूट गया है। अब हमारी बात मान लो, तो तुम सोने से लद जाओगी। तभी मैंने स्वयं को खत्म करने का निर्णय ले लिया।

परशुराम ने मर्यादा को रोकते हुए कहा कि ठीक है! मैंने मान लिया कि तुमने अपने सतीत्व को खत्म होने नहीं दिया, लेकिन मैं तुम्हें अपना नहीं सकता हूं।

मर्यादा ने कहा कि स्वामी आप ऐसा मत कहिए। मैं आपकी वही पहले वाली पत्नी हूं। मुझे किसी ने छुआ भी नहीं है। आपका ऐसा करना मेरे साथ अन्याय होगा।

परशुराम ने कहा कि यह अन्याय नहीं, बल्कि भगवान का खेल है। मैं छह दिनों से यही सब सोच रहा हूं। मुझे समाज की चिंता नहीं है, लेकिन तुम पर किसी दूसरे की नजर पड़ी। अब मैं तुम्हें कैसे अपनी पत्नी के भाव से देखूंगा।

मर्यादा बोलने लगी, “क्या आपको मेरी स्थिति पर दया बिल्कुल भी नहीं आती है?”

परशुराम ने कहा, “घृणा के स्थान पर दया बिल्कुल भी नहीं आ सकती है। मैं जीवन भर के लिए तुम्हारा खर्च उठाऊंगा, लेकिन अब तुम्हें अपने साथ नहीं रख सकता हूं। किसी गैर पुरुष के साथ एक क्षण रहने से भी पतिव्रत पूरी तरह नष्ट हो जाता है।”

मर्यादा ने पूछा, “तुम्हारी यही इच्छा है कि मैं यहां से हमेशा के लिए चली जाऊं?”

परशुराम ने कहा कि हां, मेरी अंतिम इच्छा यही है।

मर्यादा बोली, “ठीक है फिर, लेकिन क्या तुम मुझे वासुदेव को अपने संग ले जाने दोगे?”

परशुराम बोल पड़े, “बिल्कुल नहीं, वो मेरा बेटा है।”

मर्यादा ने पूछा, “क्या मैं उसे आखिरी बार देख सकती हूं। अपने बेटे को प्यार कर सकती हूं?”

परशुराम ने जवाब दिया, “मेरा मन तो नहीं है, लेकिन तुम्हें मन हो, तो दूर ही से देख लो।”

मर्यादा ने कहा, “ठीक है। अब जाने दो। सोच लूंगी कि मेरा कोई बेटा ही नहीं था और मैं विधवा हूं। आज से भाग्य मुझे जहां ले जाएगा मैं वही जाऊंगी।”

कहानी से सीख : विपरित परिस्थिति में किसी भी गैर पर यूं ही भरोसा नहीं कर लेना चाहिए। अपनी आंख और कान के साथ ही बुद्धि का भी उपयोग करना चाहिए।

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