शनि व्रत कथा | Shani Dev Vrat Katha In Hindi

द्वारा लिखित September 7, 2021

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कई हजारों साल पहले स्वर्ग में नौ ग्रहों के बीच में एक सवाल को लेकर झगड़ा होने लगा। ये सवाल था “आखिर सबसे बड़ा है कौन?” सारे ग्रह खुद को बड़ा कह रहे थे। होते-होते बात इतनी बड़ी हो गई कि सबके बीच लड़ाई होने लगी। तभी इस बात का फैसला करने के लिए सभी ग्रहों ने इंद्र देव के पास जाने का फैसला लिया। वहां पहुंचकर सबने एक स्वर में उनसे पूछा, “आखिर हम सबमें से सबसे बड़ा कौन है।”

इस सवाल का जवाब इंद्रराज के पास भी नहीं था। इस बात को सुनते ही वो परेशानी हो गए। साफ शब्दों में इंद्र देव ने कह दिया कि आपके इस सवाल का जवाब राजा विक्रमादित्य ही दे सकते हैं। हम सबको तुरंत पृथ्वीलोक चले जाने चाहिए। सबने इंद्रदेव की बात मान ली और सभी एक साथ उज्जैन पहुंच गए।
वहां पहुंचकर सारे नौ ग्रहों ने इंद्रदेव से पूछा गया सवाल इस बार राजा विक्रमादित्य से किया। ऐसा सवाल सुनकर राजा भी हैरान हो गए। उनके मन में हुआ कि हर ग्रह की अपनी एक खासियत है। हर कोई किसी धातु का देव कहलाता है और सबकी शक्ति अलग-अलग व प्रभावी है। अगर किसी को बड़ा और किसी को छोटा कह दिया, तो बड़ी मुश्किल हो सकती है।

सोचते-सोचते विक्रमादित्य के दिमाग में एक तरकीब आई। उन्होंने सभी ग्रहों का आसान बनवाकर लगा दिया। हर धातु के गुण के हिसाब से आसन लगाए गए थे। जैसे कि सोना, चांदी, कांसा, तामा, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा। अब इन आसनों में उनके स्वामी को बैठने के लिए कहा। सब एक-एक करके अपने सिंहासन पर बैठ गए।

सबके बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य बोले कि आप लोगों के सवाल का जवाब तो खुद ही मिल गया है। अब जो सबसे आगे बैठा है वही सबसे बड़े हैं। इस बात को सुनते ही आखिरी सिंहासन पर बैठे शनि देव को गुस्सा आ गया।

गुस्से में शनि ने वक्रमादित्य से कहा, “तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम्हें मेरी शक्तियों का अंदाजा नहीं है। मैं तुम्हें पूरी तरह से खत्म कर दूंगा।”

उन्होंने आगे कहा कि सूर्य किसी राशी में एक महीने, चंद्रमा किसी राशी में सवा दो दिन, मंगल एक राश में डेढ़ महीने, बुध व शुक्र एक महीने, बृहस्पति 13 महीने ही रहते हैं। इन सबके मुकाबले मैं किसी भी राशि में साढ़े सात साल तक साढ़े साती बनकर रहता हूं। कई देवता मेरे प्रकोप से पीड़ित हैं। भगवान राम को भी साढ़े साती का प्रकोप झेलना पड़ा। इसी वजह से वो जंगल गए थे। रावण भी साढ़े साती की वजह से लड़ाई में मारा गया था। अब तुम्हारी बारी है। तुम भी मेरे प्रकोप से बच नहीं पाओगे अब।

ये सब देखकर अन्य ग्रहों के देवता चले गए और शनि देव भी नाराज होते हुए आगे निकल गए। इतना सब होने के बाद विक्रमादित्य परेशान थे, लेकिन वो पहले की तरह ही अपनी जनता के लिए न्याय करते रहे। होते-होते वो आनंद से अपना जीवन जीने लगे, पर शनि देव अपना अपमान बिल्कुल भी नहीं भूले थे।

बदला लेने के मन से एक दिन शनि देव घोड़ा व्यापारी के रूप में उज्जैन पहुंचे। वहां पहुंचते ही उन्होंने खबर फैला दी कि उनके पास खूब तेज दौड़ने वाले घोड़े हैं। इस खबर के मिलते ही राजा ने घोड़े का ख्याल रखने वाले अश्वपाल को कहा कि जाओ उससे घोड़ा खरीदकर ले आओ। वो गया और देखा की घोड़े काफी कीमती हैं। फिर विक्रमादित्य खुद गए और एक ताकतवर घोड़ा पसंद कर लिया।

उसके बाद घोड़े की गति को देखने के लिए विक्रमादित्य उस घोड़े पर सवार होने लगे। तभी घोड़ा हवा में तेजी से दौड़ा और राजा को जंगल ले जाकर छोड़ दिया। जंगल से राजा अपने नगर वापस आने का रास्ता ढूंढने लगे। उन्होंने कई घंटों तक रास्ता ढूंढा, लेकिन उन्हें रास्ता नहीं मिला और वो भूख-प्यास से तड़पने लगे। कुछ ही देर में उन्हें एक चरवाहा दिखा। उससे राजा ने पानी मांगकर पी लिया और पानी के बदले में उसे अपनी सोने की अंंगूठी दे दी। उसके बाद राजा रास्ता पूछते हुए एक नगर पहुंचे। वहां सामने ही राजा को एक सेठ की दुकान दिखी। वो कुछ देर के लिए वहां बैठकर उस सेठ से बातें करने लगे। उसी वक्त सेठ की दुकान की चीजें बहुत तेजी से बिकने लगी। सेठ को लगा कि राजा उसके लिए भाग्यशाली है, इसलिए वो उन्हें अपने घर खाना खिलाने के लिए ले गया।

घर पहुंचकर सेठ कुछ देर के लिए राजा को एक कमरे में छोड़कर बाहर गया। वहां राजा ने एक खूंटी पर हीरे का हार लटका हुआ देखा। तभी एक घंटी बजी और देखते-ही-देखते खूंटी ने उस हार को निगल लिया। ये सब देखने के बाद राजा बड़ा हैरान हुए।

कुछ देर बाद सेठ वहां आया, तो उसे वो हार नहीं दिखा। तभी उसे विक्रमादित्य पर हार चोरी करने का शक हुआ। सेठ ने इसकी शिकायत उस नगर के राजा को कर दी। सैनिक विक्रमादित्य को जंजीर में जकड़कर उस राज्य के राजा के पास लेकर गए। राजा ने विक्रमादित्य से पूछा, “वो हार कहा है?”

उन्होंने जवाब दिया, “उसे वहां की खूंटी निगल गई, जिसमें वो हार टंगा हुआ था।”

इस बात को सुनते ही राजा गुस्से से लाल हो गए। राजा जवाब से संतुष्ट नहीं थे, इसलिए विक्रमादित्य को हीरे के हार का चोर घोषित करते हुए हाथ-पांव काटने की सजा सुना दी। सैनिकों ने राजा का आदेश मानते हुए विक्रमादित्य के हाथ-पांव काटकर उसे सड़क पर यूं ही छोड़ दिया।

सड़क पर इस तरह से पड़े हुए विक्रमादित्य को कई दिन हो गए थे। एक दिन तेली को उनपर दया आई और उन्हें अपने घर लेकर चला गया। उन्हें बैल हांकने वाले कोल्हू की जगह काम दिया। अब विक्रमादित्य रोज बैलों को आवाज देकर उन्हें हांकते थे। रोज बैलों को हांकने का काम करने पर विक्रमादित्य को बदले में खाना मिलता था। इसी तरह होते-होते साढ़े सात साल बीत गए। साढ़े सात साल बाद जब साढ़े साती खत्म हुई, तो वर्षा ऋतु शुरू हो गई।

विक्रमादित्य एक रात बादल और बारिश के राग वाला गाना जोर-जोर से गा रहे थे। तभी उस नगर की राजकुमारी पास से ही गुजर रही थी। उसने वो गाना सुना और दासी को कहा कि पता लगाओ वो कौन है। दासी ने ठीक वैसा ही किया। वो कुछ देर बाद लौटकर आई और कहा कि वो एक राजा है, जिसे हीरे का हार चुराने की सजा के रूप में अपंग कर दिया गया है।

राजकुमारी को उसका बादल-बारिश के राग वाला गाना खूब पसंद आया था, इसलिए उसने अपंग राजा से शादी करने का फैसला लिया। इस बारे में जब राजकुमारी ने अपने मां-बाप को बताया, तो उन्होंने इस रिश्ते से इनकार कर दिया। विक्रमादित्य के संगीत पर मोहित उस राजकुमारी ने जिद पकड़ ली कि वो शादी करेगी, तो विक्रमादित्य से ही। वरना वो अपने प्राण त्याग देगी। बेटी की जिद के आगे हारकर उन्होंने उसकी शादी विक्रमादित्य से करवा दी।

शादी के बाद राजकुमारी भी विक्रमादित्य के साथ तेली के घर चली गई। विवाह की रात को ही विक्रमादित्य के सपने में शनिदेव आए और कहा कि अब तो तुम्हें मेरे प्रकोप का पता चल ही गया होगा। अपने दंड की सजा मैंने तुम्हें इस तरह से दी है। सपने में ही दुखी राजा ने शनिदेव से माफी मांगी और प्रार्थना करते हुए बोले, “आपने मुझे जितना दुख-दर्द दिया है, उतनी किसी और को मत देना।”

विक्रमादित्य की प्रार्थना सुनकर शनिदेख को अच्छा लगा। उन्होंने सपने में ही उन्हें बताया कि जो भी इंसान मेरी पूजा करेगा, मुझ पर ही मन लगाकर ध्यान करेगा, मेरी कथा सुनेगा, चीटियों को आटा खिलाएगा, वो मेरे प्रकोप से हमेशा बचा रहेगा। साथ ही मैं उनके मनोरथ भी पूरे करूंगा।

सपने में ये सब देखते ही विक्रमादित्य की नींद खुल गई और उनके हाथ-पांव भी लौट आए थे। अपंगता से छुटकारा पाकर वो बहुत खुश हुए। उन्होंने मन से शनिदेव को धन्यवाद किया। इसके बाद विक्रमादित्य ने अपनी पत्नी को शनिदेव के प्रकोप की पूरी कहानी सुनाई। तभी सेठ को भी पता चला कि वो अपंग इंसान राजा विक्रमादित्य हैं। उसने दौड़कर राजा से माफी मांगी। राजा ने भी उसे माफ कर दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि ये सबकुछ शनिदेव की वजह से हो रहा है।

सेठ ने दोबारा विक्रमादित्य को अपने साथ घर चलने के लिए कहा। वहां सब मिलकर खाना खा रहे थे। उसी समय एक और हार को खूंटी ने निगल लिया। इस दृश्य को सबने देखा और हैरान हो गए। कुछ देर बाद सेठ को अपनी करनी पर पछतावा हुआ और उन्होंने अपनी बेटी की शादी विक्रमादित्य से कर दी। विवाह में सेठ ने उन्हें खूब सारे आभूषण दिए।

अब राजा विक्रमादित्य अपनी दोनों पत्नियों के साथ राज्य वापस पहुंचे। वहां धूमधाम से उनका स्वागत हुआ। अगले ही दिन विक्रमादित्य ने यह घोषणा करवा दी कि सारे ग्रहों में सबसे श्रेष्ठ शनिदेव हैं।

कहानी से सीख : किसी की भी ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए।

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