सिंहासन बत्तीसी की सताइसवीं कहानी - मलयवती पुतली की कथा

द्वारा लिखित February 5, 2021

Twenty-seventh Story of Throne Battisi - Story of Malayavati Putli

राजा भोज के मन में कैसे भी करके महाराज विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने की लालसा थी लेकिन हर बार उनको सिंहासन में चिपकी हुई पुतली रोक लेती थी। और उन्हें कहानी के माध्यम से महाराज विक्रमादित्य के गुणों के बारे में बतातीं थीं जो राजा भोज में नहीं थे, जिस कारण राजा भोज सिंहासन पर नहीं बैठ पाते थे। ऐसा करते करते छब्बीस पुतलियों के द्वारा राजा भोज को रोका जा चुका था। राज भोज इस बार मन बना चुके थे कि कुछ भी वे सिंहासन पर बैठकर ही रहेंगे। जैसे ही वे सिंहासन की ओर बढ़े हर बार के जैसे ही इस बार भी उन्हें पुतली ने रोक लिया। इस बार उन्हें मलयवती नामक सताइसवीं पुतली ने रोक लिया था और हर बार के जैसे ही उसने राजा भोज से विक्रमादित्य की गुणों के बारे में कहनी के माध्यम से कहना शुरु किया।

महाराज विक्रमादित्य अपना कुछ समय राज काज से बचाकर शास्त्रों के अध्ययन में लगाते थे। एक दिन वे विष्णु पुराण पड़ रहे थे जहां उन्होंने दानवीर दैत्यराज बली के बारे में पढ़ा कि किस प्रकार से उन्होंने वामन वेशधारी विष्णु देव को सब कुछ दान में दे दिया और पाताल लोक चले गए। महाराज विक्रमादित्य के मन में इनते बड़े दानवीर के दर्शन करने की लालसा उत्पन्न हो गई। उन्होंने सोचा कि इस लालसा को केवल विष्णु देव ही पूरा कर सकते हैं। ऐसा सोचकर वे अपना राज्य मंहामंत्री के हवाले करके जंगल में विष्णु देव की तपस्या करने के लिए चले गए।

कई वषों की तपस्या के दौरान पहले उनने अन्न का त्याग किया और कंदमूल का सेवन करने लगे फिर कुछ दिनों के बाद कंदमूल का त्याग कर मात्र पानी का सेवन करने लगे। ऐसा करने पर उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया। उनकी तपस्या के कारण उनके आस पास और भी साधु तपस्या करने लगे। उनमें से एक साधु ने महाराज विक्रमादित्य की कमजोर हालत देखकर उनसे कहा कि वे गृहस्थ है और उन्हें साधुओं के जैसे तपस्या नहीं करना चाहिए। लेकिन महाराज विक्रमादित्य नही माने और अपनी तपस्या में लीन होते हुए उनने पानी का भी त्याग कर दिया।

अब तो उनका शरीर सूखकर कांटे के जैसा हो गया और वे बेहाेश होकर गिर गए। जब होश आया तो देखा की उनका सिर विष्णु देव के गोदी में है और वे राजा विक्रमादित्य के सिर पर हाथ फेर रहे हैं। उन्हें देखते ही विक्रमादित्य के हर्ष की सीमा नहीं रही और तुरन्त ही उन्हें दण्डवत प्रणाम किया। विष्णु देव ने उनसे इतनी कठिन तपस्या का कारण पूछा तो विक्रमादित्य ने पूरा वृत्तांत सुना दिया।

विष्णु देव ने उन्हें एक शंख देते हुए कहा कि वे समुद्र के बीच में बने हुए पाताल लोक तक इस शंख की मदद से पहुंच सकते हैं, जब वे समुद्र के किनारे जाएं तो इस शंख को बजा दें। इससे समुद्र देव प्रकट हो जाएंगे और वे आपकी इच्छा को पूरा करने में आपकी मदद करेंगे। इतना कह कर वे गायब हो गए।

शंख और विष्णु देव के दर्शन पाकर मन में प्रसन्नता का भाव लेकर में महाराज विक्रमादित्य समुद्र की ओर चले और समुद्र के किनारे पर जाकर उनने शंख को फूंका जिससे समुद्र देव प्रकट हो गए। उनने पाताल लोक तक जाने में विक्रमादित्य की मदद की। पाताल लोक में जब विक्रमादित्य राजा बली के महल के बाहर पहुंचे तो उन्हें द्वारा पालों ने रोक लिया और वहां जाने का प्रयोजन पूछा। तब विक्रमादित्य ने कहा कि उन्हें राजा बली से भेंट करनी है।

राजा बली के पास जब यह संदेश गया तो उन्होंने कहा कि वे अभी नहीं मिल सकते हैं। द्वारपाल ने बली का संदेश विक्रमादित्य के पास पहुंचा दिया। संदेश सुनकर विक्रमादित्य ने कहा कि मुझे राजा बली से भेंट करनी है नहीं तो मैं आपने प्राण त्याग दूंगा। इतना कहकर उनने तलवार निकालकर अपनी गर्द धड़ से अलग कर दी।

जब यह बात राजा बली तक पहुंची तो उनने अमृत भेज कर राजा विक्रमादित्य को फिर से जीवित करवा दिया और कहा कि ठीक है वे महाशिव रात्री को विक्रमादित्य से मिलने के लिए तैयार हैं। विक्रमादित्य ने सोचा ने शायद बली बात को टालने की कोशिश कर रहें हैं। उनने फिर से यही बात कही कि मुझे दर्शन करवा दो नहीं तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा। इतना कहकर एक बार फिर राजा ने अपनी गर्द धड़ से अलग कर दी।

इस बार फिर से अमृत छिड़क कर विक्रमादित्य को जीवित कर दिया और गया राजा बली के पास ले जाया गया। तब बली ने उनका स्वागत किया और आने का प्रयोज पूछा तो विक्रमादित्य ने विष्णु पुराण और उनके दान की पूरी बात उनसे कह दी। विक्रमादित्य की बात सुनकर बली बहुत प्रसन्न हुए और उनकी खूब खातिर की। जब विक्रमादित्य वहां से आने लगे तो दैत्यराज बली ने उन्हें हर इच्छा को पूरा करने वाला एक मूंगा दिया और उसके बारे में बताया।

मूंगा लेकर महाराज विक्रमादित्य समुद्र पारकर अपने राज्य की ओर प्रस्थान कर गए। रास्ते में उन्हें एक स्त्री मिली जिसके बाल बिखरे हुए थे और अपनी गाेदी में अपने पति का सिर लिए बैठी रो रही थी। उसका पति मर गया था।

महिला की हालत देखकर विक्रमादित्य ने मूंगा से उसके पति को जिंदा करने का अनुराेध किया और पलक झपकते ही वह जिंदा हो गया। महाराज विक्रमादित्य ने वह मूंगा उस महिला को दे दिया और उसका रहस्य भी बता दिया। इसके बाद वे वापस आपने राज्य चले गए।

कहानी को खत्म करके पुतली ने राजा भोज से पूछा कि हे राजन् क्या आपके अन्दर भी इतनी सामर्थ्य है कि अपने इच्छा को पूरा करने के लिए अपना सब कुछ छोड़कर प्रभू भक्ति में लग जाओ?

राजा भोज कुछ न कह सके और सताइसवीं पुतली भी वहां से उड़कर चली गई। इसके बाद राजा भोज फिर से अपने महल की ओर चले गए।

कहानी से सीख: हमें अपने मन लिया हुआ दृढ़ संकल्प किसी भी परिस्थिति में पूरा करना चाहिए, भले ही कितनी विपत्ती का सामना करना पड़े।

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