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प्रेग्नेन्सी में टॉर्च (TORCH) इंफेक्शन: कारण, लक्षण व इलाज | Torch Infection In Pregnancy In Hindi

 Torch Infection In Pregnancy In Hindi

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घर के बड़े-बुजुर्ग हमेशा से गर्भवतियों को खान-पान और स्वच्छता का ख्याल रखने की सलाह देते हैं। अब खान-पान तो समझ आता है, लेकिन बात जब स्वच्छता की हो, तो इसे समझना थोड़ा पेंचीदा हो जाता है। मन में तरह-तरह के सवाल पनपते हैं कि आखिर ऐसा क्यों कहा जा रहा है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह बात बिलकुल सच है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सामान्य के मुकाबले एक गर्भवती महिला को इंफेक्शन होने का खतरा अधिक रहता है (1)। अब यह इंफेक्शन सामान्य और गंभीर दोनों तरह के हो सकते हैं। सामान्य हुआ, तो फिक्र की बात नहीं, लेकिन गंभीर हुआ, तो यह चिंता का विषय है। ऐसा ही एक गंभीर इंफेक्शन है, टॉर्च (टीओआरसीएच)। यह इंफेक्शन किसी को भी हो सकता है, लेकिन गर्भवती महिला के लिए यह किसी मुसीबत से कम नहीं है। यही वजह है कि मॉमजंक्शन के इस लेख में हम गर्भावस्था में टॉर्च से जुड़ी कुछ जरूरी बातें बता रहे हैं।

पहले यह समझ लेते हैं कि टॉर्च इंफेक्शन क्या है। फिर आगे इससे जुड़ी अन्य बातें जानेंगे।

टॉर्च (टीओआरसीएच) इंफेक्शन क्या है? 

टॉर्च ऐसा इंफेक्शन है, जो मां को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही होने वाले शिशु में कई जन्मजात विकारों की वजह बन सकता है। पढ़ने-सुनने में यह किसी बीमारी का नाम लगता है, जबकि यह बीमारी नहीं इंफेक्शन है। यह पांच अलग-अलग इंफेक्शन का समायोजन है। इन हर इंफेक्शन के नाम में आने वाले पहले अक्षरों को मिलाकर टॉर्च (टीओआरसीएच) शब्द बनता है। ये इंफेक्शन इस प्रकार हैं (2):

  1. टी फॉर टोक्सोप्लाज्मोसिस : यह टोक्सोप्लाज्मा गोंडी (Toxoplasma gondii) परजीवी द्वारा होने वाला एक इंफेक्शन है, जो इंसानों और जानवरों के शरीर पर पाया जाता है। शुरुआती गर्भावस्था के दौरान इस इंफेक्शन से गर्भवती के संक्रमित होने की स्थिति में भ्रूण तक इस इंफेक्शन के पहुंचने की आशंका करीब 10-25 प्रतिशत तक रहती है। वहीं, तीसरी तिमाही में गर्भवती के इस इंफेक्शन से संक्रमित होने की स्थिति में भ्रूण तक यह इंफेक्शन पहुंचने का जोखिम 60 से 90 प्रतिशत तक माना गया है, लेकिन पहले तिमाही में संक्रमण की गंभीरता सबसे अधिक होती है (3)
  1. ओ फॉर अदर : अदर में सिफलिस, वैरिसेला जोस्टर, पार्वोवायरस-बी 19 इंफेक्शन शामिल है। हाल ही में ज़ीका वायरस TORCH में जोड़ा गया नया संक्रमण है इनको थोड़ा और अच्छे से समझ लेते हैं।
  • सिफलिस – यह ट्रेपोनेमा पैलिडम (Treponema pallidum) बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है। यह मुख्य रूप से असुरक्षित शारीरिक संबंध के कारण फैलता है। यह इंफेक्शन भी गर्भवती से भ्रूण को हो सकता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक हर साल करीब डेढ़ करोड़ गर्भवती महिलाएं इस इंफेक्शन का शिकार होती हैं (4)
  • वैरिसेला जोस्टरयह वैरिसेला जोस्टर वाइरस (Varicella zoster virus) द्वारा होने वाला इंफेक्शन है। यह हवा या मुंह से निकलने वाली लार के माध्यम से फैलता है और मुख्य रूप से बड़ों और बच्चों में चिकन पॉक्स की वजह माना जाता है। प्रेगनेंसी में इसके संक्रमण से शिशु में जन्मजात वैरिसेला सिंड्रोम भी होता है। गर्भावस्था की पहली दो तिमाही में इस इंफेक्शन के होने का जोखिम करीब 25 प्रतिशत तक रहता है। वहीं, गर्भवती से भ्रूण तक इस इंफेक्शन के होने की आशंका करीब 12 प्रतिशत तक मानी गई है (5)
  • पार्वोवायरस-बी19 – यह इंफेक्शन पार्वोवाइरस-बी19 वायरस के कारण होता है, जिसके कारण गर्भावस्था के दौरान मुख्य रूप से भ्रूण संबंधी जोखिम देखे जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक करीब 1 से 5 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को यह इंफेक्शन होने का जोखिम रहता है। इसके अलावा, गर्भावस्था की पहली और दूसरी तिमाही के दौरान इस इंफेक्शन का भ्रूण तक पहुंचने का जोखिम अधिक माना जाता है। तीसरी तिमाही में भी यह इंफेक्शन भ्रूण को हो सकता है। इस इंफेक्शन के कारण अचानक गर्भपात, मानसिक विकास में कमी, हाईड्रॉप्स (टिशू में तरल का जमा होना) और फेटल एनीमिया (भ्रूण में लाल रक्त कणिकाओं की कमी) जैसी भ्रूण संबंधी समस्याएं हो सकती हैं (6) 
  1. आर फॉर रूबेला : रूबेला त्वचा पर होने वाले चकत्तों से जुड़ा एक वायरल इंफेक्शन है। यह हवा और संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है। गर्भावस्था के शुरुआती पांच महीने में यह संक्रमण गर्भवती महिलाओं को आसानी से शिकार बना सकता ही और भ्रूण को भी प्रभावित कर सकता है। जानकारों के मुताबिक अगर यह इंफेक्शन गर्भावस्था के पहले 12 हफ्ते में भ्रूण को संक्रमित करता है, तो भ्रूण को देखने, सुनने और हृदय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं (7) 
  1. सी फॉर साइटोमेगालोवायरस : यह एक तरह के हर्पीज वायरस के कारण होने वाला इंफेक्शन है। यह खून चढ़ाने, अंग बदलवाने, लार, ड्रॉपलेट्स, मूत्र और आंसू के संपर्क में आने और असुरक्षित शारीरिक संबंध के कारण संक्रमित व्यक्ति से फैल सकता है। गर्भवती महिला से भ्रूण में इस इंफेक्शन के होने की आशंका करीब 30 से 40 प्रतिशत तक होती है। वहीं, इस इंफेक्शन के कारण अचानक गर्भपात का जोखिम बढ़ सकता है। इसके अलावा, इस इंफेक्शन के कारण होने वाले बच्चे में सुनने की क्षमता में कमी, सोचने-समझने की क्षमता में कमी, सेरब्रल पाल्सी (चलने-फिरने की क्षमता में कमी), दौरे और कोरिओरेटिनाइटिस (आंख में सूजन संबंधी विकार) हो सकते हैं (8)
  1. एच फॉर हर्पीज इंफेक्शन : यह हर्पीज सिम्पलेक्स वायरस के कारण होने वाला इंफेक्शन है। इसमें मुंह और जननांग पर महीन छाले देखे जा सकते हैं। जानकारों के मुताबिक, करीब तीन प्रतिशत गर्भवती महिलाएं इस संक्रमण से प्रभावित होती हैं। वहीं, संक्रमित गर्भवती से भ्रूण में इस संक्रमण के होने का जोखिम 30 से 50 प्रतिशत तक माना जाता है। इस इंफेक्शन के कारण भ्रूण संबंधी जोखिम गर्भपात, विकास संबंधी समस्या, समय पूर्व प्रसव और मानसिक समस्याएं देखी जा सकती हैं (9)

लेख के अगले भाग में अब हम गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन होने के कारण बताएंगे। 

गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन होने के क्या कारण हैं? 

टॉर्च इंफेक्शन में शामिल सभी इंफेक्शन के होने के कारण हम अलग-अलग पहले ही समझा चुके हैं। अब यहां हम गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन होने के कुछ आम कारणों को समझने का प्रयास करेंगे, जो इस प्रकार हैं (10):

  • अंग प्रत्यारोपण के दौरान सिस्ट यानी पस बनने या फिर ट्रोफोजोइट्स (एक प्रकार का परजीवी) से संक्रमित होने के कारण टॉर्च इंफेक्शन हो सकता है।
  • खून या ल्यूकोसाइट (श्वेत रुधिर कणिकाएं) को शरीर में चढ़ाने की स्थिति में ट्रोफोजोइट्स के संक्रमण के कारण टॉर्च इंफेक्शन हो सकता है।
  • कुछ विशेष बैक्टीरिया या परजीवी से संक्रमित चूहे द्वारा छुई हुई वस्तुओं के संपर्क में आने पर टॉर्च इंफेक्शन हो सकता है।
  • बैक्टीरिया या परजीवी द्वारा संक्रमित गाय, भैंस, बकरी और बिल्ली जैसे जानवरों के संपर्क में आने के कारण भी टॉर्च इंफेक्शन हो सकता है।
  • कच्चे मांस में परजीवी या बैक्टीरिया का संक्रमण होने का खतरा अधिक होता है, इसलिए कच्चे मांस के उपयोग की वजह से भी टॉर्च इंफेक्शन हो सकता है।

कारण के बाद अब हम गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन के लक्षण जानेंगे। 

प्रेगनेंसी में टॉर्च इंफेक्शन होने के लक्षण 

वैसे तो टॉर्च में शामिल सभी इंफेक्शन के अपने अलग-अलग लक्षण हैं, लेकिन गर्भावस्था में या विकसित हो रहे फीटस में दिखने वाले इसके आम लक्षण कुछ इस प्रकार हो सकते हैं (10):

  • कैल्शियम की अधिकता के कारण ब्रेन पैरेन्काइमा और उसके वेसल्स में कैल्शियम जमा हो जाता है (Intracranial Calcification)।
  • मोतियाबिंद भी इसका एक लक्षण है।
  • पीलिया
  • बच्चे का छोटा आकार या धीमी गति से बढ़ना
  • आंख के विशेष हिस्से कोरोइड और रेटिना में सूजन (Chorioretinitis)।
  • हड्डी के घाव (Bone lesions)।
  • बच्चे की त्वचा पर नीले और बैंगनी रंग के दाग (Blueberry muffin lesions)।
  • बच्चे का सिर सामान्य से छोटा होना (Microcephaly)।
  • दिमाग में पानी (CSF) का जमा होना (Hydrocephalus), जोकी अत्यधिक दिमागी दबाव, सिर के आकार के बढ़ने, ऐंठन और मानसिक विकलांगता का कारण बन सकता है।
  • शरीर की कोशिकाओं में पस की उपस्थिति (Vesicles)।

गर्भावस्था व टॉर्च के बारे में और जानकारी पाने के लिए पढ़ते रहें यह लेख। 

गर्भावस्था के दौरान टॉर्च इंफेक्शन का डायग्नोसिस | TORCH Diagnosis During Pregnancy In Hindi 

लेख में ऊपर बताया गया है कि टॉर्च कोई बीमारी नहीं, बल्कि कई इंफेक्शन का एक समूह है। इसलिए, इसकी पूर्ण पुष्टि के लिए रोगी को अलग-अलग इंफेक्शन की जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ा सकता है। डॉक्टर निम्न चरणों का इस्तेमाल कर टॉर्च इंफेक्शन का पता लगाने का प्रयास कर सकते हैं (11):

1. टॉक्सोप्लाज्मोसिस जांच प्रक्रिया 

टॉक्सोप्लाज्मोसिस जांच प्रक्रिया निम्न चरणों में की जा सकती है। 

  • इस इंफेक्शन की पहचान के लिए डॉक्टर पीसीआर (PCR) यानी पोलीमरेज चेन रिएक्शन (एक प्रकार का डीएनए टेस्ट), माइक्रोस्कोपी या टीके का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • टॉक्सोप्लाज्मा गोंडी वायरस की जांच के लिए डॉक्टर आईजीजी (इम्यूनोग्लोबिन जी), आईजीएम (इम्यूनोग्लोबिन एम), आईजीए (इम्यूनोग्लोबिन ए) जैसी एंटीबॉडीज का उपयोग कर सकते हैं।
  • कुछ विशेष परिस्थितियों में डॉक्टर ब्रेन इमेजिंग (एक प्रकार की स्कैनिंग) और रेटिना जांच कर इंफेक्शन की गंभीरता को भांपने का प्रयास कर सकते हैं।

2. अदर जांच प्रक्रिया 

टॉर्च में शामिल अन्य इंफेक्शन की जांच को निम्न चरणों को उपयोग में लाया जा सकता है।

  • सबसे पहले डॉक्टर प्रांरभिक तौर पर भौतिक लक्षणों के माध्यम से इस इंफेक्शन को समझने का प्रयास कर सकते हैं। बाद में इस इंफेक्शन की पुष्टि के लिए सेरोलोजी (serology) यानी विशेष प्रकार की खून की जांच को अपनाया जा सकता है।
  • वैरिसेला सिंड्रोम की जांच के लिए पहले डॉक्टर भौतिक रूप से रीढ़ से संबंधित त्वचा के घाव देखकर इसे पहचानने का प्रयास कर सकते हैं। वहीं, इस इंफेक्शन की पुष्टि के लिए डॉक्टर एम्यूनिटिक तरल या भ्रूण के खून की डीएनए जांच कर सकते हैं।
  • पीसीआर के माध्यम से डॉक्टर एम्यूनिटिक तरल या भ्रूण के खून की जांच कर पार्वोवायरस-बी19 की पहचान कर सकते हैं। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर आईजीएम (इम्यूनोग्लोबिन एम) एंटीबॉडी के माध्यम से सेरोलोजी (serology) जांच को अपनाया जा सकता है।

3. रूबेला जांच प्रक्रिया 

निम्न प्रक्रिया के माध्यम से रूबेला इंफेक्शन की जांच की जा सकती है।

  • पीसीआर के माध्यम से आरएनए (राइबोज न्यूक्लिक एसिड) को अलग कर डॉक्टर इस इंफेक्शन का पता लगाने का प्रयास कर सकते हैं।
  • वहीं, आईजीएम (इम्यूनोग्लोबिन एम) और आईजीजी (इम्यूनोग्लोबिन जी) एंटीबॉडी टेस्ट के माध्यम से भी इस इंफेक्शन को पहचानने में मदद मिल सकती है।

4. सीएमवी (साइटोमेगालोवायरस) जांच प्रक्रिया 

साइटोमेगालोवायरस की पहचान करने के लिए निम्न तरीकों को इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

  • मूत्र और लार के नमूने के माध्यम से इस इंफेक्शन के होने का पता लगाया जा सकता है।
  • वहीं, आईजीजी और आईजीएम एंटी बॉडी के माध्यम से खून की जांच कर गर्भवती में इस इंफेक्शन को पहचानने का प्रयास किया जा सकता है।

5. एचएसवी (हर्पीज सिम्पलेक्स वायरस) जांच प्रक्रिया 

निम्न प्रक्रिया के आध्याम से एचएसवी की जांच की जा सकती है। 

  • पीसीआर के माध्यम से इस इंफेक्शन के होने का पता लगाया जा सकता है।
  • वहीं, कुछ मामलों में एंटीबॉडी टेस्ट करके भी इस इंफेक्शन को समझने में मदद मिल सकती है, लेकिन यह उतना कारगर नहीं है। वजह यह है कि इस टेस्ट से हर्पीज वाइरस के प्रकार की पुष्टि नहीं हो पाती है।

6. टॉर्च आईजीजी या आईजीएम पैनल टेस्टिंग 

गर्भ में मौजूद शिशु में टॉर्च की जांच की बात की जाए, तो डॉक्टर भ्रूण, गर्भनाल या शिशु रक्त की जांच के लिए इम्यूनोग्लोबिन जी या इम्यूनोग्लोबिन एम एंटीबॉडी टेस्ट का सहारा ले सकते हैं। यह गर्भ में मौजूद बच्चे में टॉर्च से संबंधित किसी भी इंफेक्शन की मौजूदगी का पता लगाने का एक आसान तरीका माना जाता है।

लेख के अगले भाग में आप गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन ट्रीटमेंट से जुड़ी जानकारी जानेंगे।

गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन का ट्रीटमेंट | Torch Test Treatment In Hindi 

जांच प्रक्रिया की तरह ही टॉर्च में शामिल सभी इंफेक्शन के ट्रीटमेंट का तरीका भी अलग-अलग है, जिसे हम आसान तरीके से समझाने का प्रयास कर रहे हैं (10)

1. ट्रोकोप्लाज्मोसिस इंफेक्शन ट्रीटमेंट 

अगर गर्भावस्था के दौरान इस इंफेक्शन के होने का पता चल जाता है, तो डॉक्टर भ्रूण इंफेक्शन न होने की स्थिति में स्पाइरामाइसिन (spiramycin) दवा लेने के लिए कह सकते हैं। वहीं, इंफेक्शन शिशु तक पहुंचने की अवस्था में पायरीमेथामाइन और सल्फाडियाजीन (pyrimethamine and sulfadiazine) दवा का उपयोग किया जा सकता है। इन दवाओं का उपयोग गर्भवती और भ्रूण दोनों में इंफेक्शन और उसके लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती है  (3)

2. अदर का इलाज 

सिफलिस, वेरिसेला जोस्टर, पार्वोवायरस-बी19 के इलाज की प्रक्रिया नीचे हम क्रमवार बता रहे हैं।

  • सिफलिस : सिफलिस इंफेक्शन से बचाव के लिए डॉक्टर हर 24 घंटे में पेंसिलिन दवा लेने की सलाह दे सकते हैं। साथ ही इंफेक्शन के निगेटिव आने तक नियमित रूप से जांच की जाती है। वहीं, गंभीर संक्रमण की स्थिति में होने वाले बच्चे को इंफेक्शन से बचाने के लिए बेंजाथिन पेंसिलिन (benzathin penicillin) दवा का प्रयोग किया जा सकता है।
  • वेरिसेला जोस्टर : इस इंफेक्शन से बचाव के लिए एसिक्लोविर (acyclovir) दवा को उपयोग में लाया जा सकता है। वहीं, होने वाले बच्चे में इंफेक्शन होने की आशंका होने पर एसिक्लोविर के साथ वैरिसेला जोस्टर वाइरस इम्यूनोग्लोबिन (Varicella zoster virus immunoglobulins) का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • पार्वोवायरस बी-19 : इस वायरस के इंफेक्शन से बचाव के लिए इंट्रावीनस इम्यूनोग्लोबिन (intravenous immunoglobulin) का इस्तेमाल किया जा सकता है।

3. रूबेला इंफेक्शन का इलाज 

रूबेला इंफेक्शन से बचाव का एक मात्र उपाय यह है कि इसके प्रति जागरूक रहा जाए। वजह यह है कि गर्भावस्था में इसका इलाज नहीं किया जा सकता है। हां, गर्भधारण से 28 दिन पहले इस वायरस से बचाव का इंजेक्शन लगवाकर इस इंफेक्शन से बचने में मदद जरूर मिल सकती है।

4. साइटोमेगालोवायरस का इलाज 

इस इंफेक्शन से बचाव के लिए मौखिक रूप से ली जाने वाली गैन्सीक्लोविर (ganciclovir) और वैलगैन्सीक्लोविर (valganciclovir) एंटीवायरल दवाओं को उपयोग किया जा सकता है।

5. हर्पीज वायरस का इलाज 

इस इंफेक्शन से बचाव के लिए 20 एमजी/किलो (प्रतिव्यक्ति वजन) के हिसाब से इंट्रावीनस एसीक्लोविर (Intravenous acyclovir) उपयोग किया जा सकता है। साथ ही गर्भवती को इलाज के दौरान हाइड्रेट रखने पर भी खास ख्याल रखा जाना चाहिए, ताकि इलाज के कारण किडनी पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सके।

यहां अब हम गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन के प्रभाव को समझने का प्रयास करेंगे।

गर्भावस्था में टॉर्च इंफेक्शन के प्रभाव 

गर्भावस्था के दौरान टॉर्च इंफेक्शन के निम्न परिणाम देखने को मिल सकते हैं (10)

  • जन्म से ही शिशु के आंखों की रोशनी कम होने की आशंका बनी रहती है।
  • होने वाला शिशु बहरेपन का शिकार हो सकता है।
  • जन्मजात हृदय रोग की समस्या हो सकती है।
  • अचानक गर्भपात का खतरा हो सकता है।

टॉर्च इंफेक्शन के प्रभाव के बाद अब हम इससे बचाव के बारे में बात करेंगे।

टॉर्च इंफेक्शन से बचाव के लिए कुछ सावधानियां 

टॉर्च हो या फिर कोई अन्य इंफेक्शन उससे बचे रहना जरूरी है। इसके लिए प्रत्येक महिला इन टिप्स को फॉलो कर सकती है (12):

  • अधिक लोगों (खासकर संक्रमित व्यक्ति) के संपर्क में आने से बचें।
  • अधपके मांस या कच्चे अंडे न खाएं।
  • बाथरूम का उपयोग, कच्चे मांस या कच्ची सब्जियों को छूने के बाद, धूल-मिट्टी के संपर्क में आने के बाद, पालतू जानवरों को छूने के बाद, बच्चों के डायपर बदलने के बाद या फिर लार या थूक के संपर्क में आने के बाद साबुन से अच्छे से हाथ धोना चाहिए।
  • कच्चे दूध या उससे बने उत्पाद के प्रयोग से बचना चाहिए।
  • बाहरी जानवरों जैसे बिल्ली से दूरी बनाकर रखें।

आगे अब हम टॉर्च टेस्ट की कीमत के बारे में जानेंगे। 

टॉर्च टेस्ट की कीमत 

सामान्य तौर पर टॉर्च स्क्रीन टेस्ट की कीमत 700 से 1000 रुपये तक होती है। शहर और हॉस्पिटल के आधार पर यह कीमत कम या ज्यादा हो सकती है।

टॉर्च इंफेक्शन के मामले में डॉक्टर से कब मिलना चाहिए, आगे हम इस बारे में जानेंगे। 

डॉक्टर से कब मिलें? 

टॉर्च इंफेक्शन के लक्षण नजर आने पर बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क कर लेना चाहिए, ताकि सही समय पर इलाज शुरू किया जा सके। इससे इंफेक्शन को बच्चे तक पहुंचने से रोका जा सकता है।

बेशक, टॉर्च इंफेक्शन गर्भवती महिला के लिए खतरनाक है, लेकिन इससे बचना आसान है। ऐसे में जरूरी है कि इस इंफेक्शन के प्रति जागरूक रहा जाए और गर्भावस्था में टॉर्च से बचाव संबंधी जरूरी बातों को भी ध्यान में रखा जाए। इस तरह न केवल आप खुद को इस इंफेक्शन से बचा सकती हैं, बल्कि होने वाले शिशु पर पड़ने वाले टॉर्च के प्रभावों को भी दूर रख सकती हैं। उम्मीद है कि स्वस्थ गर्भावस्था को बनाए रखने में यह लेख काफी मददगार साबित होगा। गर्भावस्था से जुड़ी ऐसी ही अन्य जरूरी जानकारी हासिल करने के लिए पढ़ते रहें मॉमजंक्शन।

संदर्भ (References):