नॉर्मल डिलीवरी (सामान्य प्रसव) के लिए 11 टिप्स - Pregnancy tips for normal delivery

Pregnancy tips for normal delivery

Image: Shutterstock

गर्भधारण के बाद हर महिला के मन में यह सवाल ज़रूर उठता है कि उसकी नॉर्मल डिलीवरी होगी या सिज़ेरियन डिलीवरी। आमतौर पर डॉक्टर नॉर्मल डिलीवरी कराने की सलाह देते हैं। गर्भवती महिला या होने वाले शिशु को किसी तरह की शारीरिक परेशानी होने पर सिज़ेरियन डिलीवरी कराने की सलाह दी जाती है।

हालांकि, पिछले कुछ सालों में ऐसी गर्भवती महिलाओं की तादाद तेज़ी से बढ़ी है, जो डिलीवरी के समय होने वाले दर्द से बचने के लिए सिज़ेरियन डिलीवरी का विकल्प चुनती हैं। नेशनल हेल्थ फ़ैमिली सर्वे (साल 2015-16) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में देश के शहरी इलाकों में 28.3 प्रतिशत महिलाओं ने सी-सेक्शन के ज़रिए डिलीवरी कराने का विकल्प चुना है। वहीं गांव-देहात के इलाकों में 12.9 प्रतिशत महिलाओं ने सी-सेक्शन से डिलीवरी कराई है। जबकि, साल 2005-06 में कुल सिज़ेरियन डिलीवरी (शहर और गांव दोनों जगहों पर हुई सिज़ेरियन डिलीवरी) का आंकड़ा महज़ 8.5 प्रतिशत ही था। (1)

भले ही नॉर्मल डिलीवरी की प्रक्रिया में गर्भवती महिलाओं को काफ़ी दर्द होता है, लेकिन सेहत के लिहाज़ से इसे सिज़ेरियन डिलीवरी से बेहतर माना जाता है। आज मॉमजंक्शन के इस लेख में हम आपको नॉर्मल डिलीवरी से जुड़े सवालों के जवाब देने की कोशिश करेंगे।

नॉर्मल डिलीवरी क्या है?

यह प्रसव या डिलीवरी की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें शिशु का जन्म महिला के योनि मार्ग से प्राकृतिक तरीके से होता है। अगर गर्भावस्था में किसी तरह की चिकित्सीय परेशानी ना हो, तो गर्भवती महिला की नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है। (2)

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी की संभावना को बढ़ाने वाले कारक

नीचे हम कुछ ऐसे कारकों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो नॉर्मल डिलीवरी होने की संभावना को बढ़ा सकते हैं :

  • अगर गर्भवती महिला को पहले की गर्भावस्था में सामान्य तरह से योनि स्राव हुआ हो।
  • अगर गर्भवती महिला को किसी तरह की शारीरिक बीमारी (जैसे- अस्थमा आदि) ना हो।
  • अगर गर्भवती महिला का वज़न सामान्य हो।
  • अगर गर्भवती महिला गर्भावस्था के दौरान किसी गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्या से ग्रस्त ना हो।
  • अगर गर्भवती महिला गर्भावस्था के दौरान शारीरिक रूप से सक्रिय रहे।
  • अगर गर्भवती महिला का ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और खून में हिमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य हो। (3)

नोट: ऊपर बताए गए कारक नार्मल डिलीवरी होने की गारंटी नहीं देते हैं। ये केवल नॉर्मल डिलीवरी की संभावना को बढ़ाते हैं।

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी के संकेत और लक्षण

जी हां, कुछ खास संकेतों और लक्षणों के आधार पर नॉर्मल डिलीवरी होने का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। आमतौर पर ये लक्षण गर्भवती महिला के शरीर में प्रसव के चार सप्ताह पहले से नज़र आने लगते हैं। नीचे इन लक्षणों और संकेतों के बारे में विस्तार से बताया गया है :

  • गर्भावस्था के 30वें सप्ताह से 34वें सप्ताह के बीच अगर भ्रूण का सिर नीचे की ओर आ जाए, तो यह नॉर्मल डिलीवरी की संभावना को बढ़ा देता है।
  • भ्रूण का सिर गर्भवती महिला की योनि पर दबाव डालता है, जिससे महिला को बार-बार पेशाब लगती है। यह नॉर्मल डिलीवरी का लक्षण हो सकता है।
  • अगर भ्रूण के नीचे की ओर आने से गर्भवती महिला को हिलने-डुलने में परेशानी महसूस होने लगे, तो ये नॉर्मल डिलीवरी का लक्षण हो सकता है।
  • डिलीवरी का समय नज़दीक आने पर गर्भवती महिला के गुदाद्वार की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। इस कारण महिला को पतले मल की शिकायत हो सकती है। हालांकि, इसे नॉर्मल डिलीवरी का संकेत भी माना जा सकता है।

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी कैसे होती है?

नॉर्मल डिलीवरी की प्रक्रिया को कुल तीन चरणों में बांटा गया है। इसके पहले चरण को भी तीन हिस्सों में बांटा गया है, जिनके बारे में नीचे विस्तार से बताया गया है।

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी का पहला चरण :

1. लेटेंट प्रक्रिया :

नॉर्मल डिलीवरी में लेटेंट की प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है। इसमें गर्भाशय ग्रीवा 3 सेंटीमीटर तक खुल सकती है। यह प्रक्रिया डिलीवरी के एक सप्ताह पहले या डिलीवरी के कुछ घंटों पहले शुरू हो सकती है। इस दौरान गर्भवती महिला को बीच-बीच में संकुचन भी हो सकते हैं।

लेटेंट प्रक्रिया से गुज़र रही गर्भवती महिलाओं के लिए टिप्स :

  • आराम करें और अपना पूरा ध्यान रखें।
  • बीच-बीच में चलती फिरती रहें और खूब पानी पिएं।
  • अकेली ना रहें, अपने साथ किसी ना किसी को ज़रूर रखें।
  • अस्पताल जाने के लिए तैयारी शुरू कर दें।

2. एक्टिव प्रक्रिया :

एक्टिव प्रक्रिया में गर्भाशय ग्रीवा 3-7 सेंटीमीटर तक खुल जाती है। इस दौरान संकुचन की वजह से तेज़ दर्द होता है।

एक्टिव प्रक्रिया से गुज़र ही गर्भवती महिलाओं के लिए टिप्स :

  • अगर संकुचन तेज़ होने लगे, तो खुद को रिलैक्स रखें और सांसों के व्यायाम पर ध्यान दें।
  • किसी से अपने कंधों की मालिश कराएं। इससे आपको आराम मिलेगा।

3. ट्रांज़िशन प्रक्रिया :

ट्रांज़िशन प्रक्रिया में गर्भाशय ग्रीवा 8-10 सेंटीमीटर तक खुल जाती है। इस दौरान संकुचन लगातार होते रहते हैं और दर्द भी बढ़ जाता है।

ट्रांज़िशन प्रक्रिया से गुज़र रही गर्भवती महिलाओं के लिए टिप्स :

  • अगर आप घर पर हैं, तो वहां मौजूद व्यक्ति से अस्पताल चलने के लिए कहें।
  • अगर योनि से द्रव आ रहा है, तो इसकी गंध, रंग, आदि को एक जगह नोट कर लें।
  • शांत रहें और सांसों के व्यायाम पर ध्यान दें।

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी का दूसरा चरण – बच्चे का बाहर आना

इस दौरान गर्भाशय ग्रीवा पूरी तरह से खुल जाती है और संकुचन की गति तेज़ हो जाती है। इस चरण में शिशु का सिर पूरी तरह से नीचे आ जाता है।

इस समय डॉक्टर गर्भवती महिला से खुद से ज़ोर लगाने के लिए कहते हैं। ऐसा करने पर पहले शिशु का सिर बाहर आता है। इसके बाद डॉक्टर शिशु के बाकी शरीर को बाहर निकाल लेते हैं।

दूसरे चरण से गुज़र रहीं गर्भवती महिलाओं के लिए टिप्स :

  • संकुचन के दौरान आप बीच-बीच में अपनी पॉज़िशन बदलती रहें।
  • नियमित रूप से सांस लेती रहें।
  • बच्चे को पुश करने की कोशिश बराबर करती रहें।

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी का तीसरा चरण – गर्भनाल का बाहर आना

शिशु के बाहर आते ही डॉक्टर गर्भनाल को काट कर अलग कर देते हैं। तीसरे चरण में गर्भवती महिला के गर्भाशय में मौजूद ‘प्लेसेंटा (अपरा)’ बाहर निकलती है। शिशु के जन्म के बाद, प्लेसेंटा भी गर्भाशय की दीवार से अलग होने लगती है। प्लेसेंटा के अलग होने के दौरान भी गर्भवती महिला को हल्के संकुचन होते हैं। ये संकुचन शिशु के जन्म के पांच मिनट बाद शुरू हो सकते हैं। प्लेसेंटा के बाहर आने की प्रक्रिया लगभग आधे घंटे तक चल सकती है। इसके लिए भी डॉक्टर गर्भवती महिला को खुद से ज़ोर लगाने के लिए कहते हैं। (4)

तीसरे चरण से गुज़र ही गर्भवती महिलाओं के लिए टिप्स :

  • गर्भनाल पूरी तरह से बाहर आ जाए, तो नर्स को इस बारे में बता दें ताकि वो इसे साफ़ कर दे।
  • इसके बाद नर्स से अपने पेट के निचले हिस्से पर हल्की मालिश करने के लिए कहें।

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी में कितना समय लगता है?

आमतौर पर नॉर्मल डिलीवरी में लगने वाला समय गर्भवती महिला की शारीरिक अवस्था पर निर्भर करता है। अगर गर्भवती महिला की पहली बार नॉर्मल डिलीवरी होने जा रही है, तो इस प्रक्रिया में 7-8 घंटे तक का समय लग सकता है। वहीं, अगर यह गर्भवती महिला की दूसरी डिलीवरी है, तो इस प्रक्रिया में थोड़ा कम समय लग सकता है। (5)

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी की संभावना बढ़ाने के लिए 11 टिप्स

नीचे दिए गए इन टिप्स को अपनाकर कोई भी गर्भवती महिला नॉर्मल डिलीवरी होने की संभावना को बढ़ा सकती है :

1. तनाव से दूर रहें :

नॉर्मल डिलीवरी की इच्छा रखने वाली गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान तनाव से दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए वे चाहें तो ध्यान लगा सकती हैं, संगीत सुन सकती हैं या फिर किताबें पढ़ सकती हैं।

2. नकारात्मक बातें ना सोचें :

गर्भावस्था के दौरान नकारात्मक बातों से दूर रहें। डिलीवरी से जुड़ी सुनी-सुनाई नकारात्मक बातों और किस्सों पर बिल्कुल भी ध्यान ना दें। याद रखें कि हर महिला का अनुभव अलग हो सकता है। इसलिए, दूसरों के बुरे अनुभवों की वजह से अपने भीतर डर पैदा ना करें।

3. प्रसव के बारे में सही जानकारी लें :

सही जानकारियाँ डर को दूर करती हैं। इसलिए, प्रसव के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा सही जानकारी पाने की कोशिश करें। इससे गर्भवती महिला को प्रसव की प्रक्रिया को अच्छी तरह से समझने में मदद मिलती है।

4. अपनों के साथ रहें :

अपनों का साथ गर्भवती महिला को भावनात्मक रूप में मजबूत बनाता है। इसलिए, गर्भावस्था के दौरान हमेशा अपनों के साथ रहने की कोशिश करें।

5. सही डॉक्टर चुनें :

दुख की बात है कि कुछ डॉक्टर अपने फ़ायदे के लिए बिना किसी ज़रूरत के सिज़ेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह दे देते हैं। ऐसे में गर्भवती महिला को डिलीवरी के लिए डॉक्टर का चुनाव काफ़ी सोच-समझकर करना चाहिए। नॉर्मल डिलीवरी के लिए ऐसा डॉक्टर चुनना ज़रूरी है, जो गर्भवती महिला के शरीर की स्थिति के बारे में सही जानकारी देता रहे।

6. मदद के लिए एक अनुभवी दाई रखें :

नॉर्मल डिलीवरी की चाहत रखने वाली महिलाओं को अपने पास अनुभवी दाई को रखने की सलाह दी जाती है। ऐसी दाइयों के पास नॉर्मल डिलीवरी कराने का काफ़ी लंबा अनुभव होता है, इसलिए वे डिलीवरी के दौरान गर्भवती महिलाओं के लिए काफ़ी मददगार साबित हो सकती है। इसके अलावा, दाइयों को शिशु के जन्म के बाद की जाने वाली देखभाल की भी अच्छी जानकारी होती है।

7. शरीर के निचले हिस्से की नियमित रूप से मालिश करें :

गर्भावस्था के सातवें महीने के बाद, गर्भवती महिलाएं अपने शरीर के निचले हिस्से की मालिश शुरू कर सकती हैं। इससे प्रसव में आसानी होती है और तनाव भी दूर होता है। (6)

8. खुद को हाइड्रेट रखें:

गर्भवती महिलाओं को हमेशा खुद को हाइड्रेट रखना चाहिए। उन्हें खूब पानी या जूस पीना चाहिए। इससे नॉर्मल डिलीवरी में आसानी होती है।

9. उठने-बैठने की सही स्थिति का ध्यान रखें :

गर्भवती महिला की उठने-बैठने से लेकर लेटने तक की स्थिति गर्भ में पल रहे शिशु पर असर डालती है। इसलिए, उन्हें हमेशा अपने शरीर को सही स्थिति में रखने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे कि बैठते समय उन्हें अपनी पीठ को ठीक से सहारा देकर बैठना चाहिए।

10. वज़न नियंत्रित रखें :

गर्भावस्था में वज़न बढ़ना सामान्य बात है। लेकिन, गर्भवती महिला का वज़न बहुत ज़्यादा भी नहीं बढ़ना चाहिए। बहुत ज़्यादा वज़न होने से प्रसव के समय परेशानी हो सकती है। दरअसल, मां अगर ज़्यादा मोटी हो, तो शिशु को बाहर आने में कठिनाई होती है।

11. व्यायाम करें :

गर्भावस्था में नियमित रूप से व्यायाम करने से नॉर्मल डिलीवरी की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है। इसलिए, डॉक्टर की सलाह लेकर नियमित रूप से व्यायाम ज़रूर करें। (7)

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी के लिए क्या करें और क्या ना करें?

गर्भवती महिला की खानपान और रहन-सहन की आदतें उसकी सेहत के साथ-साथ होने वाले शिशु की सेहत पर भी काफ़ी असर डालता है। नीचे हम कुछ ऐसी आदतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो कि नॉर्मल डिलीवरी के लिए काफ़ी अहम मानी जाती हैं :

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी के लिए खानपान की चीज़ों से जुड़े टिप्स

क्या खाएं?

गर्भवती महिलाओं को नॉर्मल डिलीवरी के लिए अपने खानपान में डेयरी उत्पादों, हरी पत्तेदार सब्ज़ियों, सूखे मेवों, बिना वसा वाले मांस, मौसमी फलों, अंडों, बेरियों, फलियों आदि को शामिल करना चाहिए। इसके अलावा, उन्हें दिन भर ढेर सारा पानी पीकर खुद को हाइड्रेट रखना चाहिए। (8)

गर्भावस्था में क्या ना खाएं?

गर्भावस्था में कच्चे अंडे, शराब, सिगरेट, ज़्यादा मात्रा में कैफ़ीन, उच्च स्तर के पारे वाली मछलियां, कच्चे पपीते, कच्ची अंकुरित चीज़ें, क्रीम दूध से बने पनीर, कच्चे मांस, घर पर बनी आइसक्रीम, जंक फ़ूड आदि से परहेज करना चाहिए। (9)

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी के लिए व्यायाम से जुड़े टिप्स

अगर गर्भवती महिला को किसी तरह की चिकित्सीय समस्या नहीं है, तो उसे गर्भावस्था में नियमित रूप से व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। गर्भावस्था में व्यायाम करने से ना सिर्फ़ मां और बच्चा स्वस्थ रहते हैं, बल्कि इससे नॉर्मल डिलीवरी होने की संभावना बढ़ जाती है।

क्या करें?

गर्भवती महिलाओं को नीचे बताए गए व्यायाम करने की सलाह दी जाती है :

  • सुबह-शाम नियमित रूप से सैर करें।
  • थोड़ी देर तक स्विमिंग करें।
  • थोड़ी-बहुत साईकलिंग करें।
  • हल्की-हल्की दौड़ लगाएं।
  • आप चाहें तो प्रेगनेंसी व्यायाम की क्लास में भी जा सकती हैं। (10)

नोट: याद रखें कि हर एक गर्भवती महिला की शारीरिक स्थिति अलग-अलग होती है। इसलिए, किसी भी व्यायाम को शुरू करने से पहले एक बार डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें।

क्या ना करें?

  • वेटलिफ़्टिंग जैसे व्यायाम, जिनसे पेट के निचले हिस्से पर दबाव पड़ता हो।
  • मार्शल आर्ट्स, सॉकर, बास्केटबॉल आदि जैसे खेलों में हिस्सा ना लें।
  • अगर आपका किसी दिन व्यायाम करने का मन ना करें, तो उस दिन व्यायाम ना करें।
  • बुखार होने पर व्यायाम ना करें।
  • ज़रूरत से ज़्यादा खिंचाव वाले व्यायाम ना करें।
  • ज़्यादा देर तक व्यायाम ना करें। इससे आपको थकावट हो सकती है। (10)

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी के लिए योगासन से जुड़े टिप्स

अगर गर्भवती महिला नियमित रूप से कुछ खास तरह के योगासन करे, तो नॉर्मल डिलीवरी होने की संभावना बढ़ जाती है। नॉर्मल डिलीवरी के लिए नीचे दिए गए योगासन करने की सलाह दी जाती है :

  • मार्जरी आसन
Pregnancy tips for normal delivery1

Image: Shutterstock

  • कोणासन
Pregnancy tips for normal delivery2

Image: Shutterstock

  • वीरभद्रासन
Pregnancy tips for normal delivery3

Image: Shutterstock

  • त्रीकोणासन
Pregnancy tips for normal delivery4

Image: Shutterstock

  • शवासन
Pregnancy tips for normal delivery5

Image: Shutterstock

नोट : याद रखें कि हर एक गर्भवती महिला की शारीरिक स्थिति अलग-अलग होती है। इसलिए, किसी भी योगासन का अभ्यास शुरू करने से पहले एक बार डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें।

वापस ऊपर जाएँ

पेरिनियल मालिश कब शुरू करें?

नॉर्मल डिलीवरी के लिए पेरिनियल मालिश फ़ायदेमंद साबित होती है। गर्भावस्था के 34वें सप्ताह से ये मालिश शुरू की जा सकती है। नॉर्मल डिलीवरी की चाहत रखने वाली गर्भवती महिलाओं को हर दिन कुछ मिनट के लिए पेरिनियल मालिश करने की सलाह दी जाती है। इस मालिश के लिए बादाम के तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है। (12)

पेरिनियल मालिश करने का तरीका :

  • किसी एकांत स्थान पर दीवार का सहारा लेकर बैठ जाएं। बैठते समय पैरों को आगे की ओर रखें। चाहें तो पीठ के पीछे कुछ आरामदायक तकिए भी रख सकती हैं।
  • हाथों को अच्छी तरह धोकर उंगलियों पर थोड़ा-सा तेल लगा लें।
  • अब योनि के अंदर लगभग 2.5 सेंटीमीटर तक दोनों हाथों के अंगूठें डालकर बाकी की उंगलियों को नितंबों पर रखें।
  • इसके बाद, धीरे-धीरे अंगूठों से योनि के अंदर के हिस्से की मालिश करें।
  • गर्भवती महिलाओं को पांच मिनट तक पेरिनियल मालिश करने की सलाह दी जाती है।

Pregnancy tips for normal delivery6

वापस ऊपर जाएँ

नॉर्मल डिलीवरी का विकल्प क्यों चुनना चाहिए?

नॉर्मल डिलीवरी का विकल्प चुनने से मां और बच्चे दोनों की सेहत को कई फ़ायदे होते हैं। नीचे इन फ़ायदों के बारे में विस्तार से बताया गया है :

नॉर्मल डिलीवरी से मां को होने वाले लाभ :

  • डिलीवरी के बाद ठीक होने में में ज़्यादा समय नहीं लगता है।
  • नॉर्मल डिलीवरी होने पर मां अपने बच्चे को तुरंत दूध पिला पाती है।
  • सिज़ेरियन डिलीवरी के उलट नॉर्मल डिलीवरी में किसी तरह की चीर-फाड़ की ज़रूरत नहीं पड़ती है। इसलिए, मां बनने वाली औरत को डिलीवरी के बाद किसी तरह का दर्द नहीं सहना पड़ता है।

नॉर्मल डिलीवरी से शिशु को होने वाले लाभ :

  • नॉर्मल डिलीवरी होने पर, शिशु को अपनी मां का साथ सिज़ेरियन डिलीवरी के मुकाबले थोड़ा पहले मिल पाता है।
  • बच्चे को मां का दूध जल्दी मिलता है। इससे बच्चे को पीलिया होने खतरा कम हो जाता है।

वापस ऊपर जाएँ

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ये कैसे पता चलता है कि बच्चे को बाहर लाने के लिए कब और कितनी देर के लिए ज़ोर लगाना है?

अगर गर्भवती महिला की गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) 10 सेंटीमीटर तक खुल गई है, तो समझ जाएं कि शिशु को बाहर लाने के लिए ज़ोर लगाने का समय आ गया है। इस दौरान गर्भवती महिला अपनी टांगों के बीच शिशु के सिर का दबाव महसूस करने लगती हैं। अगर गर्भवती महिला ने एपिड्यूरल (Epidural) इंजेक्शन लिया है, तो हो सकता है कि उसे ज़्यादा ज़ोर ना लगाना पड़ें। इसके अलावा, डिलीवरी कराने वाले डॉक्टर भी गर्भवती महिला को ज़ोर लगाने से जुड़े निर्देश देते रहते हैं।

क्या मुझे एपीसिओटोमी (Episiotomy) कराने की ज़रूरत पड़ेगी?

कुछ खास परिस्थितियों में ही एपीसिओटोमी कराने की ज़रूरत पड़ती है। आमतौर पर ऐपीसिओटोमी करने की ज़रूरत तब पड़ती है, जब शिशु के सिर का आकार मां के योनि भाग से बड़ा हो। ऐसा होने पर शिशु को बाहर निकलने में कठिनाई होती है। इसके अलावा, अगर शिशु बर्थ कैनाल में अटक जाए, तो उसे बाहर निकालने के लिए भी एपीसिओटोमी का सहारा लेना पड़ता है। एपीसिओटोमी करने के लिए डॉक्टर गर्भवती महिला के योनि भाग पर चीरा लगाते हैं। आमतौर पर डॉक्टर एपीसिओटोमी करने का फ़ैसला डिलीवरी के दौरान ही लेते हैं। (13)

क्या डिलीवरी के बाद योनि पर टांके लगाने की ज़रूरत भी पड़ती है?

हां। डिलीवरी के दौरान जब बच्चा बाहर निकलने लगता है, तो गर्भवती महिला की योनि पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ता है। इसकी वजह से योनि का कोई हिस्सा थोड़ा-सा फट भी सकता है। ऐसे में योनि पर टांके लगाने की ज़रूरत पड़ सकती है।

अगर पहले सिज़ेरियन डिलीवरी हो चुकी हो, तो क्या दूसरी बार गर्भधारण करने पर नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है? | Vaginal Birth After Cesarean (VBAC)

जी हां, अगर पहले सिज़ेरियन डिलीवरी हो चुकी हो, तब भी नॉर्मल डिलीवरी का होना संभव है। लेकिन, यह बात काफ़ी हद तक गर्भवती महिला की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करती है। बहुत से डॉक्टर भी यह मानते हैंकि जिन महिलाओं की पहले सिज़ेरियन डिलीवरी हो चुकी है, उनकी अगली डिलीवरी नॉर्मल हो सकती है। (14)

अगर गर्भवती महिला के पेट में जुड़वां बच्चे हों, तो क्या उसकी नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है?

जी हां, अगर गर्भवती महिला के गर्भ में मौजूद दोनों बच्चे स्वस्थ हैं, तो उनकी नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है। बहुत-सी ऐसी महिलाएं हैं, जिन्होंने सामान्य तरीके से जुड़वा बच्चों को जन्म दिया है।

नॉर्मल डिलीवरी में क्या-क्या जटिलताएं होती हैं?

नॉर्मल डिलीवरी को वैसे तो बिल्कुल सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इसके दौरान कभी-कभी नीचे दी गई जटिलताओं से जूझना पड़ सकता है :

  • प्लेसेंटा का अचानक टूट जाना।
  • भ्रूण का सिर पहले बाहर आना।
  • शिशु के दिल की धड़कनें घटना या बढ़ना।
  • बहुत ज़्यादा रक्तस्राव होना।
  • पानी की थैली का जल्दी फट जाना

ऐसी किसी भी तरह की जटिलता होने पर डॉक्टर तुरंत सिज़ेरियन डिलीवरी करने का फ़ैसला ले सकते हैं।

नॉर्मल डिलीवरी में कितना दर्द होता है?

नॉर्मल डिलीवरी के दौरान हर महिला का अनुभव अलग-अलग हो सकता है। महिला को डिलीवरी के दौरान कितना दर्द होगा, यह उसकी शारीरिक और भावनात्मक क्षमता पर निर्भर करता है।

वापस ऊपर जाएँ

हम उम्मीद करते हैं कि इस लेख को पढ़ने के बाद आपको नॉर्मल डिलीवरी से जुड़े सभी सवालों के जवाब मिल गए होंगे। अगर अभी भी आपको कुछ सवाल परेशान कर रहे हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में आप अपना सवाल ज़रूर लिखें। इसके अलावा, अगर आपकी कोई दोस्त या रिश्तेदार नॉर्मल डिलीवरी से घबरा रही हो, तो उसके साथ भी इस लेख को साझा करना ना भूलें।

संदर्भ (References) :

1. नेशनल हेल्थ फ़ैमिली सर्वे (2015-16)
2. Natural birth by Ione Brunt, US National Library of Medicine
3. Safe, Healthy Birth: What Every Pregnant Woman Needs to Know by Judith A. Lothian
4. What are the stages of labor? | National Institute of Child Health and Human Development
5. Pregnancy – Labor by Cedars-Sinai
6. Perineal massage in labour and prevention of perineal trauma by US National Library of Medicine
7. Pregnancy and birth: Weight gain in pregnancy by U.S. National Library of Medicine
8. Health Tips for Pregnant Women by national institute of diabetes and digestive and kidney diseases
9. Eating During Pregnancy by KidsHealth
10. Pregnancy and exercise by Better Health Channel, Victoria State Government
11. Yoga: A godsend for pregnant women by Art of living
12. What Is the Evidence for Perineal Massage During Pregnancy to Prevent Tearing? By Rebecca Dekker, PhD, RN, APRN
13. Know about Episiotomy by MedlinePlus
14. Vaginal birth after C-section by MedlinePlus

 

Click
Featured Image