सिंगल पेरेंटिंग के बच्चों पर 6 सकारात्मक व 6 नकारात्मक प्रभाव | Single Parenting Effects On Kids In Hindi

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सिंगल पेरेंट्स के लिए बच्चों की परवरिश करना कोई आसान काम नहीं है। इसमें बच्चे की सारी जिम्मेदारी माता-पिता में से किसी एक के कंधे पर होती है। एक इंसान मां और पिता दोनों की भूमिका में रहते हुए बच्चों को आदर्श मूल्य देने का प्रयास करता है। बच्चे की परवरिश में जरा सी लापरवाही सिंगल पेरेंट की कोशिशों को नाकाम कर सकती है, जिस वजह से कई बार उन्हें तनाव का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि मॉमजंक्शन के इस लेख में हम आपको सिंगल पेरेंटिंग के दौरान होने वाले तनाव से छुटकारा पाने के लिए जरूरी टिप्स शेयर करेंगे। साथ ही बच्चों की परवरिश से जुड़ी तमाम बातों को विस्तार से जानेंगे।

लेख में सबसे पहले जानते हैं कि सिंगल पेरेंटिग किसे कहते हैं।

सिंगल पेरेंटिंग क्या है? | Single Parent Meaning In Hindi

सिंगल पेरेंटिंग जैसा की शब्द से ही समझ आ रहा है एकल माता पिता। सिंगल पेरेंटिंग या सिंगल पेरेंटहुड में माता-पिता में कोई एक बच्चे की परवरिश करता है। सिंगल पेरेंट बनने के कई कारण हो सकते हैं। माता-पिता में से किसी एक की मृत्यु हो जाना, पेरेंट्स के बीच तलाक, कुछ महिलाएं बिना शादी करे बच्चे को गोद लेकर उनकी परवरिश करना पसंद करती हैं, किसी एक पेरेंट का देश से बाहर जाकर नौकरी करना आदि।

लेख में आगे सिंगल पेरेंटिंग में आने वाली समस्याओं के बारे में बात करेंगे।

सिंगल पेरेंटिंग में होने वाली परेशानियां | Problems Of Single Parenting In Hindi

सिंगल पेरेंट्स को बच्चे की परवरिश करते समय कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। यहां हम उन्हीं समस्याओं के बारे में बता रहे हैं।

  1. तनाव: सिंगल पेरेंट्स को सब काम अकेले करने पड़ते हैं। ऐसे में कई बार उन्हें तनाव का सामना करना पड़ सकता है। तनाव का प्रमुख कारण अकेलापना और बच्चे से जुड़ी छोटी बड़ी चीजें हो सकती हैं, जैसे बच्चे की तबियत खराब होना, पड़ोसियों द्वारा उसकी शिकायत, बच्चे की शिक्षा, बच्चे के बेहतर भविष्य को लेकर निर्णय लेने में असक्षम होना आदि। इस प्रकार की परिस्थितियां अक्सर सिंगल पेरेंट्स को तनाव में डाल सकती हैं (1)
  1. बच्चों में अनुशासनहीनता: बच्चे की अकेले परवरिश करने वाले पेरेंट के लिए घर में अनुशासन बनाए रखना कठिन हो सकता है, सिंगल पेरेंटिंग के दौरान बच्चा जिसके साथ रह रहा होता है, उसी पर पूरी तरह से इमोशनली निर्भर हो जाता है। ऐसे में कई पेरेंट्स उनकी हर जिद को पूरा करने लग जाते हैं।

    बच्चे की ख्वाहिशों को पूरा करना हर माता-पिता की चाहत होती है, लेकिन भावनाओं में बहकर बच्चों की गलत मांगों को पूरा करना सही रास्ता नहीं है। इससे आगे चलकर बच्चे का रवैया खराब हो सकता है। बच्चे को शुरुआत से अनुशासित बनाने का प्रयास करना चाहिए।

  1. समय का अभाव: बच्चे की अकेले परवरिश करने वाले पेरेंट्स के पास अक्सर समय का अभाव होता है, चूंकि उनको घर संभालने के साथ काम पर भी जाना होता है। यही कारण है कि वे हर समय बच्चे को कंपनी भी नहीं दे पाते हैं। सिंगल पेरेंट्स को ऑफिस और घर के कामों के बीच समन्वय बनाने के साथ बच्चे संग क्वालिटी टाइम बिताने के लिए समय निकाल पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
  1. चिड़चिड़ापन: बच्चे के पालन-पोषण, घर का काम, दफ्तर का काम आदि जिम्मेदारियाें के कारण सिंगल पेरेंट खुद के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। दिनभर मेहनत करने के बाद दिन के आखिर में उनके पास अपने लिए दो मिनट सुकून के निकाल पाना भी मुश्किल होता है। इस कारण उनमें तनाव, थकान और मानसिक दबाव बढ़ सकता है। इससे सिंगल माता या पिता असहाय और चिड़चिड़े हो सकते हैं, जो उनके साथ ही बच्चों को भी प्रभावित कर सकता है (1)
  1. आर्थिक समस्या: सिंगल पेरेंटिंग के दौरान सिंगल माता या पिता को बच्चे के साथ ही घर की भी पूरी जिम्मेदारियाें का निर्वाह करना पड़ता है। ऐसे में सिर्फ उनकी नौकरी और आय से ही बच्चे की देखभाल से लेकर घर का खर्च चलता है (1)

वहीं, यदि आय कम है, तो ऐसे में सिंगल पेरेंट को कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जैसे कि यदि बच्चा गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, तो हो सकता है कि उनके पास इतना पैसा ना हो कि वह उसका अच्छी जगह इलाज करवा सके। इसके साथ कई बार सिंगल पेरेंट्स कम रोजगार के कारण रोजमर्रा की जिंदगी में भी घर के खर्च, बच्चे की स्कूल की पढ़ाई, स्वास्थ्य और अन्य खर्चों के लिए असहाय हो सकते हैं।

लेख के इस हिस्से में बच्चों के लिए सिंगल पेरेंटिंग के सकारात्मक प्रभाव के बारे में जानेंगे।

बच्चों के लिए सिंगल पेरेंटिंग के 6 सकारात्मक प्रभाव

बच्चों के लिए सिंगल पेरेंट्स का होना कभी-कभी फायदेमंद भी हो सकता है। इससे वे कई प्रकार की काबलियत के धनी हो सकते हैं। यहां हम बच्चों पर सिंगल पेरेंटिंग से होने वाले सकारात्मक प्रभावों के बारे में बता रहे हैं, जो कुछ इस तरह से हैं:

  1. अभिभावक और बच्चे की मजबूत बॉन्डिंग: सिंगल पेरेंटिंग में माता या पिता जब अपने बच्चे के रूप में परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताते हैं, तो उनके बीच एक अनोखा और मजबूत रिश्ता बनता है। इससे बच्चे माता और पिता के महत्व को समझते हैं। बच्चे को एक ही इंसान से मां और पिता दोनों का प्यार मिलता है, तो बच्चा भी इसे समझता है और दोनों के बीच एक मजबूत बॉन्डिंग बनती है।यदि सिंगल पेरेंट दफ्तर और घर के काम के चलते बच्चे के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पा रहे हैं, तो वें खास दिनों पर जैसे बच्चे के जन्मदिन या अपने जन्मदिन पर साथ में समय बिता सकते हैं। इसके लिए बच्चे के साथ मूवी देखने जा सकते हैं या बच्चे के साथ उनके पसंदीदा रेस्टोरेंट जाने का प्लान कर सकते हैं। ऐसे मौकों पर बच्चे को अपना टाइम देने का पूरा प्रयास करें। इससे बच्चे और आपके बीच में अच्छी बॉन्डिंग होने में मदद हो सकती है।
  1. जिम्मेदारी की समझ: जब सिंगल पेरेंट्स बच्चों को पालने के साथ ही घर और बाहर का काम करते हैं, तो उन्हें देखकर उनका बच्चा भी अपनी जिम्मेदारियों और दायित्व को निभाना सीखता है। इसके लिए बच्चे को शुरुआत से ही घर के काम करने की आदत डालें। शुरुआत में संडे के दिन बच्चे से घर की साफ-सफाई व अन्य छोटे-मोटे काम में मदद ले सकते हैं। इससे धीरे-धीरे बच्चा अपनी जिम्मेदारियां समझेगा। कभी बच्चा खुद से कोई काम करे, तो उनकी प्रशंसा करना न भूलें।
  1. परिपक्वता यानी मैच्युरिटी: जब बच्चे अपने माता या पिता को मेहनत करते हुए देखते हैं, तो वो भी उनके साथ उनके काम में सहयोग देने के लिए आगे आते हैं। वे अपने माता पिता से सीखते हैं कि जीवन में किस प्रकार से निराशाओं का सामना करना है। बच्चों में ये कौशल होने के लिए, उन्हें अपने माता या पिता से मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।इसलिए, यदि कभी बच्चा निराश है, तो अभिभावक हमेशा उन्हें समर्थन, सहानुभूति और प्रोत्साहन दें। ये अनुभव बच्चों को समझदार वयस्क बनने में मदद करेंगे। हर समय बच्चे को निराश या उदास महसूस करने से रोकना मुनासिब नहीं है, लेकिन उनकी भावनाओं को समझते हुए उन्हें समझाया जरूर जा सकता है।
  1. मुसीबत का डट कर करते हैं सामना: इस बात से तो सभी वाकिफ हैं कि सिंगल पेरेंट की लाइफ आसान नहीं होती है। बच्चे की परवरिश से लेकर घर और दफ्तर के काम करना किसी चैलेंज से कम नहीं होता है। ऐसे में बच्चे अपने माता या पिता को हर दिन परेशानियों का सामना करते देख इस बात को समझते हैं कि जीवन यापन करने के लिए किस प्रकार से उनके पेरेंट कठिन परीश्रम कर रहे हैं। अपने माता या पिता को हर दिन कठिनायों का सामना करते देख बच्चे भी हर परेशानी का डट कर सामना करने के लिए तैयार होते हैं।
  1. आत्मनिर्भरता: सिंगल पेरेंटिंग में देखा जाता है कि बच्चे अपने अकेले माता या पिता के कार्यों को देखकर सीखते और बढ़ते हैं। ऐसे में जब वे देखते हैं कि उनके माता या पिता बिना किसी की सहायता के किस प्रकार से घर को संभाले हैं और सभी काम स्वयं करते हैं, तो बच्चे भी अपना काम खुद करने का प्रयास करने लगते हैं। माता पिता को देखकर बच्चे भी यह भी सीखते हैं कि उन्हें अपना काम मां या पिता पर डालने की बजाय खुद करना चाहिए।

आगे हम जानेंगे कि सिंगल पेरेंटिंग के बच्चों पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।

बच्चों के लिए सिंगल पेरेंटिंग के 6 नकारात्मक प्रभाव

सिंगल पेरेंटिंग के बच्चों पर साकारत्मक प्रभाव के साथ ही कुछ नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं, जिनके बारे में हम नीचे विस्तार से जानकारी दे रहे हैं:

  1. वित्तीय परेशानी: अधिकांश एकल माता-पिता परिवार की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए दिनभर काम करते हैं। कम पैसों में घर चलाना और बच्चों की परवरिश करना, ये सब उनकी जिम्मदारी है, जिसे वो अकेला पूरा करते हैं। ऐसे में बच्चों के स्कूल की महंगी फीस व अन्य खर्चों के चलते कई बार वित्तीय परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।अकेले बच्चे को संभालना इतनी परेशानी वाली बात नहीं है, लेकिन अकेले सारे खर्चे देखना सिंगल पेरेंट के लिए एक परेशानी का कारण बन सकता है।
  1. निम्न स्तर का पालन पोषण: अक्सर देखा जाता है कि परिवार में रहने वाले बच्चों के मुकाबले सिंगल पेरेंट यानी एकल माता या पिता के बच्चों के पालन-पोषण के तरीका का सीधा असर पड़ता है। दरअसल, सिंगल पेरेंट्स के दैनिक जीवन में कई जिम्मेदारियां होती हैं। जैसे कि लंबे समय तक दफ्तर व घर का काम, इसके बाद बच्चे के स्कूल व ट्यूशन का होमवर्क कराना आदि। इन सब कार्यों के बाद सिंगल माता या पिता के पास बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिताने का समय ही नहीं बचता।बच्चा दिनभर की गतिविधियों में अभिभावक की कमी को महसूस कर सकता है। सिंगल पेरेंट अपने कामों में घिरे रहने के कारण बच्चे की हर एक्टिवीटी का हिस्सा नहीं बन पाते हैं। वहीं, माता-पिता के साथ रहने वाले बच्चों के पास दोनों में से एक पेरेंट ज्यादातर समय उपलब्ध रहता है।
  1. ईर्ष्या: सिंगल पेरेंटिंग में रहने वाला बच्चा जब अपने दोस्तों को उनके माता-पिता के साथ खुशी से रहता हुआ देखता है, तो इससे उसके अंदर अपने दोस्तों के प्रति ईर्ष्या की भावना आ सकती है। इससे बच्चे को दूसरे अभिभावक जैसे कि माता या पिता की कमी महसूस होने लगती है और उसके मन में हीन भावना पैदा हो सकती है।
  1. भावनात्मक समस्याएं: सिंगल पेरेंटिंग में रहने वाले बच्चे माता या पिता का समय न मिलने के कारण उनके प्यार और स्नेह के लिए तरस सकते हैं। अभिभावक के दफ्तर व घर के काम में व्यस्त रहने के कारण बच्चे को समय न मिलने पर वे आगे चलकर जीवन में अपने रिश्तों से प्यार और स्नेह की उम्मीदों को खो सकते हैं।अभिभावक का पर्याप्त समय व प्यार न मिलने का सीधा असर बच्चे के दिमाग पर पड़ सकता है। ऐसे में कुछ बच्चे गुमसुम रहने लगते हैं। ऐसे बच्चों का भावनात्मक विकास मंद गती से हाेता है, जिससे उनमें दूसरों के लिए संवेदनशीलता को लेकर समस्याएं पैदा हो सकती है।
  1. बच्चों में अकेलापन: यह एक और चुनौती है, जिसका अधिकांश एकल माता-पिता को सामना करना पड़ता है। बच्चों को कम समय देने के कारण अक्सर बच्चे अपने आपको अकेला महसूस करते हैं। ऐसे में उनके मन में अपनी भावनाओं को माता पिता के साथ शेयर करने में कठिनाई होती है और वे अकेलेपन की वजह से अपनी परेशानियां भी व्यक्त नहीं कर पाते हैं। अकेलेपन के कारण वे अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं।
  1. समाजिक दूरी: सिंगल पेरेंटिंग में पल रहे बच्चे अक्सर माता पिता दोनों के साथ रह रहे बच्चों को देखकर उनसे ईर्ष्या करने के साथ ही हीन भावना के कारण दूसरों के साथ रहना कम कर देते हैं। धीरे धीरे वे लोगों से घुलना मिलना भी बंद कर देते हैं और उनमें सामाजिक दूरी पनपने लगती है। वे अपने माता या पिता में ही अपनी खुशियां तलाशने लगते हैं, लेकिन जब वे भी बच्चे को समय नहीं दे पाते, तो बच्चे सबसे खुद को दूर कर लेते हैं और अकेले रहना शुरू कर देते हैं।

नीचे पढ़ें सिंगल पेरेंटिंग करने वाली मांओं के लिए जरूरी टिप्स।

सिंगल मदर के लिए टिप्स | single parenting tips for moms in hindi

सिंगल पेरेंटिंग करने वाली माताओं को कई समस्यओं का सामना करना पड़ सकता है, जो उन्हें निर्णय लेने के साथ ही अन्य कई उलझनों में डाल सकती हैं। यहां हम कुछ जरूरी टिप्स लेकर आए हैं, जो सिंगल पेरेंटिंग करने वाली माताओं के लिए मददगार हो सकती हैं।

  • पॉजिटिव रहें: सिंगल मदर के लिए अपने बच्चे की परवरिश करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। दरअसल, सिंगल मदर के लिए दफ्तर के साथ घर को संभालना कोई आसान काम नहीं होता है। इस सब के बाद उनके लिए अपने बच्चे को समय देने में दिक्कत होना लाजमी है। ऐसे में हताश होने की जगह खुद को पॉजिटिव रखें और नकारात्मकता को अपने आसपास भटकने भी न दें।मां के पॉजिटिव और खुश रहने का सीधा असर बच्चे पर भी नजर आता है। सिंगल मांओं को यह बात समझनी होगी कि बच्चे के लिए आप ही उसकी सबकुछ है। आपको ही उसी परवरिश करनी है, तो खुद को कमजोर न पड़ने दें। जिंदगी के प्रति हमेशा अपना सकारात्मक रवैया रखें।
  • टाइम मैनेजमेंट: सिंगल मां को घर, ऑफिस और बच्चे के लिए समय निकालना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। ऐसे में कोशिश करें कि ऑफिस जाने से पहले और आने के बाद घर का काम करते समय अपने बच्चे को अपने साथ रखें। इससे वह आपके साथ समय बिताने के साथ ही घर के काम में भी मदद करना सीखेगा।
  • खुद के लिए भी निकाले समय: बच्चों और काम को समय देने के अलावा खुद को भी समय देना उतना ही जरूरी है। यदि आप सिर्फ काम और बच्चे के बारे में ही सोचते रहेंगी, तो इसका सीधा असर आपके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता। इसकी वजह कई बार सिंगल मदर्स तनाव और चिंता का शिकार हो सकतीं हैं। ऐसे में अपने लिए मी टाइम निकालना न भूलें। चाहें तो सुबह मेडिटेशन और योग से अपने दिन की शुरुआत कर सकती हैं।
  • जरूरतों का ख्याल रखें: सिंगल पेरेंट होना किसी भी मां के लिए चुनौती से कम नहीं होता है। रोजना की भाग दौड़ में कई बार जरूरी चीजों के बारे में भूल जाना आम बात है। ऐसे में एक लिस्ट बनाने की कोशिश करें, जिसमें जरूरी चीजों को लिखकर नोट करें और समय मिलने पर आप उन्हें पूरा कर सकें।
  • मदद लेने से इनकार करें: सिंगल मां होने पर आत्म निर्भरता अच्छी बात है, लेकिन ऐसे में खुद से ही सभी काम करना मुश्किल पैदा कर सकता है। ऐसे समय में अपने मित्रों या रिश्तेदारों से मदद लेने की कोशिश करें। अगर कोई मदद का हाथ बढ़ाता है, तो इसमें हिचकिचाए नहीं। आखिर दोस्त होते ही किस लिए हैं। इसके साथ ही आपके बच्चे को भी आपके दोस्तों के साथ समय बिताना अच्छा लग सकता है।
  • बच्चे को दें प्यार की झप्पी: बच्चे को अपनेपन का एहसास कराने और अकेलेपन से दूर रखने के लिए उन्हें हग यानी जादू की झप्पी दे सकते हैं। रोजाना ऑफिस जाने से पहले और दफ्तर से आने के बाद या फिर किसी भी काम के लिए बाहर जाने से पहले उन्हें हग करना न भूलें और उन्हें प्यार से कहें कि आप उनसे कितना प्यार करते हैं।
  • गिफ्ट दें: बच्चों को जन्म दिन की बधाई देने के अलावा सामान्य दिनों में भी अक्सर छोटे मोटे गिफ्ट्स सरप्राइज के रूप में देकर उन्हें खुश किया जा सकता है। जब भी बाहर या ऑफिस आएं, तो उन्हें कुछ ना कुछ गिफ्ट के रूप में दे सकते हैं, जैसे कि चॉक्लेट, बिस्किट्स या पेस्ट्रीज आदि।
  • बच्चों का साथ दें: बच्चों की रचनात्मक गतिविधि में उनका साथ देने की कोशिश करें। आप उन्हें किसी भी कार्य को अच्छे से करना सिखा सकते हैं। बच्चे को पेंटिंग, ड्राइंग व अन्य खेलों में उनके साथी बनें। आपका साथ पाकर बच्चे के मन में उत्साह के साथ ही आत्म विश्वास भी पैदा होगा, जो उसे और अधिक सीखने में मदद कर सकता है।
  • बच्चों की जिद पर लगाम: अच्छे पेरेंट्स बनने की इच्छा के चलते अक्सर मां अपने बच्चों की हर जिद को पूरा कर देतीं है, इससे आगे चलकर उसकी जिद और बड़ी हो सकती है, जिसे पूरा करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में कोशिश करें कि बच्चे की हर जिद को पूरा करने की जहग उसकी जरूरतों से जुड़ी मांग पूरी की जाए।

बच्चे की फिजूल डिमांड को पूरा करने की बजाय उन्हें प्यार से समझाएं कि वे जिस चीज की मांग कर रहे हैं वो उनके किसी काम की नहीं है। ऐसी स्थिती में गुस्सा करने से बचें। गुस्से से समझाने पर बच्चे चिड़चिड़े हो सकते हैं, इसलिए जब तक जरूरी ना हो अपने गुस्से काे कंट्रोल में रखते हुए बच्चे को प्यार और स्नेह से समझाने की कोशिश करें।

लेख के इस हिस्से में हम जानेंगे सिंगल पेरेंटिंग करने वाले पिता के लिए जरूरी टिप्स।

सिंगल फादर के लिए टिप्स | single parenting tips for father in hindi

माता ही नहीं सिंगल पिता को भी बच्चे की परवरिश करने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। यहां हम सिंगल फादर के लिए जरूरी टिप्स दे रहे हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं:

  • दोस्त बनने की कोशिक करें: बात अगर हो पिता और पुत्री के रिश्ते और स्नेह की, तो बेटी हमेशा अपने पिता के करीब होती है। वहीं, अक्सर देखा जाता है कि पिता की अपेक्षा पुत्र मां के ज्यादा करीब होते हैं। बच्चों के दिमाग में पिता की छवी डर वाली होती है।बच्चे पिता से अपने मन की हर बात शेयर नहीं कर पाते हैं। ऐसे में सिंगल पिता को बच्चे का पिता बनने के साथ ही दोस्त बनने की कोशिश भी करनी चाहिए। इससे बच्चा यदि आपसे कुछ शेयर करना चाहता है, तो वो बिना डर के अपने मन की बात बता सकता है।
  • बच्चों का साथ दें: पिता अक्सर अपने ऑफिस के कार्यों में व्यस्त होकर बच्चे के लिए कम समय निकाल पाते हैं, ऐसे में बच्चे खेलने और मन की बात कहने के लिए किसी का साथ ढूंढने लगते हैं। पिता को इस बात को समझना होगा कि उन्हें मां और पिता दोनों का रोल निभाना है। इसके लिए उन्हें बच्चे के खेलने से लेकर अन्य गतिविधियों का हिस्सा बनने का प्रयास करना चाहिए।
  • बच्चे के साथ आउटिंग पर जाएं: ऑफिस और अन्य कामों को निपटाने के बाद कोशिश करें कि बच्चों के साथ किसी ऐसी जगह पर आउटिंग पर जाएं जहां उसे कुछ सीखने को मिले। साथ ही बच्चे को प्रकृति के और करीब आने का मौका मिले। इससे बच्चों को अकेलापन महसूस नहीं होगा और वे आपके और करीब आएंगे।
  • विशेष मौकों पर शामिल हो: माना जाता है कि पिता अक्सर बच्चों के जीवन में होने वाले विशेष अवसर जैसे कि स्कूल में होने वाले कार्यक्रम, जन्मदिन या फिर पेरेंट्स टीचर मीटिंग में शामिल नहीं हो पाते हैं। इस वजह से बच्चे अपने पिता से जुड़ नहीं पाते। कोशिश करें कि बच्चों के जीवन में होने वाली हर छोटी से बड़ी घटना का आप हिस्सा बनें।
  • प्रोत्साहित करना ना भूलें: बच्चे अक्सर अपने माता या पिता को खुश करने के लिए क्रिएटिव वर्क करके दिखाते रहते हैं, जैसे कि पेंटिंग करना, पजल सॉल्व करना, मिट्टी के स्टेचू बनाना आदि। ऐसे में उनकी क्रिएटिविटी बढ़ाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना ना भूलें।
  • गिफ्ट्स: बच्चे को खुश करने के लिए छोटे मोटे गिफ्ट्स लाते रहें। यदि आपका बच्चा आपसे रूठा हो, तो दफ्तर से घर जाते समय उसे मनाने के लिए उसकी फेवरेट चॉक्लेट या आइसक्रीम लेकर जाएं। कभी खास मौके पर उन्हें ऐसा गिफ्ट दे सकते हैं, जाे उसे पसंद हो और उसके काम का हो।
  • गुस्से पर कंट्रोल: ऑफिस की टेंशन और बच्चे की जिद अक्सर गुस्से का कारण बन सकती है। कई बार दफ्तर का स्ट्रेस घर पर बच्चे पर निकल सकता है। रोजाना बच्चों को गुस्से में डांटना उनके मन में आपके प्रति डर पैदा कर सकता है। इससे बच्चे और आपके बीच में दूरियां आ सकती हैं। बच्चा गुमसुम होकर रहने लग सकता है। यदि दफ्तर की टेंशन ज्यादा है, तो कोशिश करें कि बच्चे के सामने आते ही वो प्यार में बदल जाए।
  • लर्निंग टाइम: छोटे बच्चों को अक्सर अपने पिता के साथ कुछ नया सीखना अच्छा लगता है। इस दौरान आप उन्हें कुछ ना कुछ सीखने में मदद कर सकते हैं। जैसे कि बड़ों से कैसे बात करना चाहिए, घर पर कैसे रहना चाहिए। इसके साथ ही आप उन्हें घर के कामों में हांथ बटाना भी सिखा सकते हैं।
  • खुद को समय दें: बच्चे को पालने के साथ ही जरूरी है कि आप खुद के लिए भी समय निकालें। यदि खुद के लिए समय नहीं निकालेंगे, तो सबका ध्यान रखने के साथ खुद कहीं खो जाएंगे। इसलिए, यह अच्छी बात है कि आप दफ्तर, घर, समाज के साथ बच्चे की जिम्मेदारी भी अच्छे से निभा रहे हैं। इसके साथ ही खुद के लिए भी समय निकालें और उसमें अपनी पसंद की एक्टिविटी करें। यदि आपको पूल खेलना पसंद है, तो पूल खेलने जाएं। जिम करना पसंद है, तो जिम जाएं।

स्क्राॅल करके जानें सिंगल पेरेंटिंग के दौरान होने वाले तनाव को दूर करने के उपाय।

सिंगल पेरेंटिंग के स्ट्रेस को कैसे दूर करें?

सिंगल पेरेंटिंग के दौरान कई समस्याओं और चुनौतियों का सामना करते करते लोग अक्सर तनावग्रस्त हो सकते हैं। यहां हम सिंगल पेरेंटिंग के दौरान होने वाले तानाव से छुटकारा पाने से जुड़े टिप्स साझा कर रहे हैं:

  • एक रुटीन सेट करें: अव्यवस्थित जीवन शैली अक्सर तनाव का कारण बन सकती है, जिस वजह से कोई भी कार्य समय पर नहीं हो पाता है। ऐसे में कोशिश करें कि एक टाइम टेबल बनांए और उसके हिसाब से ही जीवन यापन करें। इसमें आप खुद के साथ ही ऑफिस और अपने बच्चे को भी समय दे सकते हैं।
  • खुद पर नियंत्रण रखें: सिंगल माता या पिता को अक्सर छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ सकता है, जैसे कि राशन की दुकान पर भीड़ होना या फिर जरूरी सामान भूल जाना या फिर बस का देरी से आना आदि। इस दौरान उन कार्यों की एक सूची बनाएं, जिन्हें दिनभर में करना है। जिस समय आप किसी एक काम को कर रहे हो, तब दूसरे काम की चिंता न करें। एक समय में एक काम पर ध्यान केंद्रित करें। मन को चारों तरफ न भटकने दें। इससे कम समय में बेहतर काम होगा और आप अपनी भावनाओं को नियंत्रित रख सकेंगे (2)
  • शांत होकर निर्णय लें: अक्सर देखा जाता है कि कठिन परिस्थितियों में सिंगल पेरेंट्स के लिए निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है और तनाव की स्थिति बन सकती है। ऐसे में अपने मन पर काबू रखने की कोशिश करें और शांत मन से कोई भी निर्णय लें। एक बार जब आप शांत मन से निर्णय लेना शुरू करेंगे, तो बेहतर महसूस करेंगे। निर्णय लेने के बाद, विश्वास के साथ उसका पालन करें (2)
  • दूसरों की मदद लें: एकल माता या पिता को सभी काम अकेले ही करना होता है, ऐसे में तनाव की स्थिति बनना लाजमी है। ऑफिस और घर के काम के बीच में दोस्तों के लिए समय निकालना एक मुश्किल काम हो सकता है, लेकिन ध्यान रहे कि दोस्तों से मदद लेना भी उतना ही जरूरी है जितना की खुद से काम करना (2)।सभी कार्य को अकेले करना संभव नहीं होता। यदि ऐसे में दोस्तों की मदद ली जाए तो काम भी जल्दी हो जाएगा और आप खुद के लिए, दोस्तों के लिए और बच्चों के लिए आसानी से बिना तनाव के समय निकाल सकेंगे।
  • खुद के लिए समय निकालें: अच्छे माता- पिता बनने का यह मतलब नहीं है कि आप खुद को ही भूल जाएं। अपना अच्छा ख्याल रख कर तनाव को कम कर सकते हैं। इस बात को अच्छी तरह समझ लीजिए कि अगर आप खुद को खुश नहीं रख पा रहे हैं, तो आप बच्चों को भी खुशी नहीं दे पाएंगे और अंदर ही अंदर तनाव से ग्रस्त होने लगेंगे।

पेरेंट्स खुद के लिए जो समय निकालें उसमें वो उन काम को करें, जो उनको पसंद हो। जैसे पेंटिंग, गार्डनिंग, दोस्तों संग फोन पर बातें या मीटिंग आदि। साथ ही ध्यान रहे कि आपका स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण है। जब आप बहुत अधिक तनाव महसूस कर रहे हों, तो कुछ गहरी सांस लें और कुछ मिनटों के लिए अपनी आंखें बंद करके अच्छे पलों को याद करें। किसी भरोसेमंद रिश्तेदार, दोस्त या पड़ोसी से कभी-कभार अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए कहें ताकि आप अपने लिए कुछ समय निकाल सकें।

सिंगल पेरेंटिंग करना हर किसी के लिए आसान नहीं होता, लेकिन फिर भी कोई मजबूरी में, तो कोई शौक से बच्चों को गोद लेकर इसे निभाता है। इस दौरान हर किसी को कोई ना कोई परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, फिर चाहे वह सिंगल माता हो या सिंगल पिता। लेख में सिंगल पेरेंट्स के लिए बच्चों की परवरिश से जुड़े कुछ टिप्स शेयर किए हैं, जो उनकी परेशानी को कम कर सकते हैं। उम्मीद करते हैं सिंगल पेरेंटिंग पर आधारित हमारा यह लेख आपको जरूर पसंद आएगा। यदि आपके आसपास कोई सिंगल पेरेंट है, तो उनके साथ इस लेख को जरूर साझा करें।

संदर्भ (References)