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स्पाइना बिफिडा क्या है? कारण, लक्षण व इलाज | Spina Bifida In Hindi

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कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो शिशु में जन्मजात होती हैं। स्पाइना बिफिडा उन्हीं में से एक है। इसमें बच्चे की रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है, जिस कारण बच्चे को पूरी जिंदगी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बच्चों में स्पाइना बिफिडा क्या है और यह किस प्रकार बच्चे के विकास में बाधा डाल सकता है और उनके जीवन को प्रभावित कर सकता है? ये सभी जानकारियां मॉमजंक्शन के इस लेख में देने की कोशिश की गई है। तो इन सभी सवालों के जवाब के लिए पढ़ते रहें यह लेख।

सबसे पहले जानते हैं कि स्पाइना बिफिडा क्या है?

स्पाइना बिफिडा क्या है?

स्पाइना बिफिडा एक न्यूरल ट्यूब दोष है – जो भ्रूण के मस्तिष्क व रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करता है। यह तब होता है, जब गर्भावस्था के पहले महीने के दौरान भ्रूण के रीढ़ की हड्डी का कॉलम पूरी तरह से बंद नहीं होता है। यह नसों और रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग टेस्ट के जरिए स्पाइना बिफिडा का पता लगाया जा सकता है, लेकिन कभी-कभी जन्म के बाद ही इसका पता चलता है (1)

क्या यह समस्या किसी भी भ्रूण को हो सकती है? आइए, जानते हैं।

स्पाइना बिफिडा होना कितना आम है?

स्पाइना बिफिडा को न्यूरल ट्यूब दोष के सबसे आम प्रकारों में से एक माना गया है। दुनिया भर में 2,500 नवजात शिशुओं में से करीब 1 एक शिशु इससे प्रभावित होता है (2)

आगे जानिए स्पाइना बिफिडा के प्रकार।

स्पाइना बिफिडा के प्रकार

मुख्य रूप से तीन प्रकार के स्पाइना बिफिडा होते हैं, जिनके बारे में हम नीचे जानकारी दे रहे हैं (3)

  1. मायेलोमिंगोसिसेल (Myelomeningocele)- यह स्पाइना बिफिडा का सबसे गंभीर प्रकार है। इस स्थिति में बच्चे की पीठ से तरल पदार्थ की एक थैली बाहर निकल आती है। भ्रूण के स्पाइनल कॉर्ड और नसों का हिस्सा इस थैली में ही होती है, जो क्षतिग्रस्त हो जाता है। इस प्रकार का स्पाइना बिफिडा मध्यम से लेकर गंभीर हो सकता है।
  1. मेनिंगोसेले (Meningocele)- इसमें भी बच्चे की पीठ में एक तरल पदार्थ की एक थैली खुल जाती है, लेकिन रीढ़ की हड्डी इस थैली में नहीं होती है। इसमें नसों को ज्यादा नुकसान नहीं होता है। इस प्रकार का स्पाइना बिफिडा मामूली विकलांगता का कारण बन सकता है।
  1. स्पाइना बिफिडा ओकुल्ट – यह स्पाइना बिफिडा का सबसे हल्का प्रकार होता है। इसे कभी-कभी ‘हिडन’ स्पाइना बिफिडा भी कहा जाता है। इसमें रीढ़ की हड्डी में एक छोटा-सा गैप आ जाता है, लेकिन पीठ पर कोई तरल पदार्थ की थैली नजर नहीं आती। रीढ़ की हड्डी और नसें आमतौर पर सामान्य होती हैं। कई बार बचपन या वयस्क होने तक स्पाइना बिफिडा ओकुल्ट का पता नहीं चल पाता है। इस प्रकार की स्पाइना बिफिडा आमतौर पर किसी भी तरह के विकलांगता का कारण नहीं बनती है।

अब जानते हैं कि इस जन्मदोष का कारण क्या हो सकता है।

स्पाइना बिफिडा के कारण

स्पाइना बिफिडा का सटीक कारण अभी तक अज्ञात है। कोई नहीं जानता है कि तंत्रिका ट्यूब के पूरी तरह से बंद होने में क्या रुकावट है, जिससे यह विकृति होती है। यह न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट (neural tube defect) का ही एक भाग है। न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट एक प्रकार का जन्मदोष होता है, जिसमें मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है। ऐसे में न्यूरल ट्यूब डीफेक्ट और स्पाइना बिफिडा होने के कारण सामान्य हो सकते हैं। इसी आधार पर हम नीचे कुछ कारणों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। हालांकि, ये कारण अनुमान के तौर पर है इनके लिए अभी और वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता है (4)

  • आनुवंशिक।
  • गर्भावस्था के दौरान पोषक खाद्य पदार्थों की कमी।
  • गर्भावस्था के दौरान शराब का सेवन।
  • गर्भावस्था के दौरान कैफीन का अधिक सेवन।
  • गर्भावस्था के दौरान शरीर में विटामिन-सी, बी, जिंक व कोलीन की कमी।
  • पर्यावरणीय कारक, जैसे – वायु प्रदूषण व कीटनाशक का उपयोग आदि।
  • मधुमेह होना।
  • मोटापा होना।

वहीं, इस विषय पर किए गए कुछ रिसर्च से यह संकेत मिलता है कि गर्भावस्था के दौरान फॉलिक एसिड (एक सामान्य विटामिन बी) की कमी स्पाइना बिफिडा और अन्य न्यूरल ट्यूब दोष का कारण बन सकती है।

आगे जानते हैं इनके लक्षणों के बारे में।

स्पाइना बिफिडा के लक्षण

स्पाइना बिफिडा के लक्षण इनके प्रकारों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। नीचे जानिए इनके बारे में।

1. मायेलोमिंगोसिसेल (Myelomeningocele) के लक्षण 

यह स्पाइना बिफिडा का सबसे गंभीर प्रकार होता है। इसके लक्षण कुछ इस प्रकार हैं (3) (5):

  • इस प्रकार के स्पाइना बिफिडा में बच्चे की पीठ पर तरल पदार्थ की एक थैली उभर आती है और इसमें रीढ़ की हड्डी भी होती है। यह इसका सबसे प्रमुख लक्षण है।
  • मल-मूत्र पर नियंत्रण न रख पाना। (यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस)
  • स्टूल इनकॉन्टिनेंस/ बोवेल ऑब्सट्रक्शन/ कॉन्स्टिपेशन
  • आंशिक या पूरी तरीके से कुछ भी महसूस न कर पाना। (लॉस ऑफ सेंसेशन)
  • आंशिक या पूरे पैरों को लकवा मार जाना। (पैरालाइसिस)
  • नवजात शिशु के कूल्हों, पैरों या तलवों में कमजोरी महसूस होना।
  • इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी

कुछ अन्य लक्षण इस प्रकार हैं –

  • पैरों के आकार में बदलाव जैसे – क्लबफुट (clubfoot- टेढ़े-मेढे पैर)
  • खोपड़ी में अत्यधिक तरल पदार्थ का जमाव हाइड्रोसिफ़लस (hydrocephalus)

2. मेनिंगोसेले (Meningocele) के लक्षण

  • इस प्रकार की स्पाइना बिफिडा में नसों की क्षति न के बराबर होती है ।
  • विकलांगता के हल्के लक्षण नजर आ सकते हैं।

3. स्पाइना बिफिडा ओकुल्ट (Spina Bifida Occulta) के लक्षण 

  • इसमें किसी भी तरह की कोई विकलांगता नहीं होती है और इसके कोई खास लक्षण भी नजर नहीं आते हैं।

आगे जानते हैं इसके इलाज के बारे में।

स्पाइना बिफिडा का इलाज | Spina Bifida Treatment In Hindi

स्पाइना बिफिडा को ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन कुछ वैकल्पिक इलाज से इस समस्या को कम जरूर किया जा सकता है, ताकि मरीज को थोड़ी राहत मिले (6)(7)। इसके इलाज में पीडियाट्रिशियन, पीडियाट्रिक सर्जन, न्यूरो सर्जन,यूरोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक सर्जन की टीम शामिल होती है।

  1. सर्जरी – घाव को बंद करने और संक्रमण को कम करने के लिए सर्जरी का सहारा लिया जा सकता है। जैसा कि हमने ऊपर जानकारी दी है कि गर्भावस्था के दौरान भी जांच से भ्रूण में स्पाइना बिफिडा का पता लगाया जा सकता है। ऐसे में महिला की स्थिति के अनुसार डॉक्टर गर्भावस्था के दौरान भी सर्जरी की मदद से भ्रूण की रीढ़ की हड्डी में सुधार कर सकते हैं। हालांकि, यह पूरी तरह से महिला की स्थिति पर निर्भर करता है। ऐसे में हमारी सलाह यही है कि इस बारे में डॉक्टरी परामर्श को ही प्राथमिकता दी जाए।
  1. एक्सट्रा यूट्रिन पोस्ट बर्थ स्पाइन सर्जरी (Extra uterine (post birth ) spinal surgery of the child)-रीढ़ की हड्डी में सुधार के लिए बच्चे के जन्म के 24 से 28 घंटे में ये सर्जरी की जाती है। इसमें बच्चे को जनर्ल एनेस्थिसिया दिया जाता है। इसमें पीडियाट्रिक न्यूरो सर्जन एमएमसी थैली (MMC sac) को हटा देते हैं और स्पाइनल कोर्ड की सुरक्षा के लिए आसपास के टिश्यू और स्किन को बंद कर देते हैं। सर्जरी के बाद बच्चे की न्यूबॉर्न इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा जाता है।
  1. ऑर्थोपेडिक सर्जरी- स्पाइना बिफिडा वाले बच्चे को सही तरीके से चलने या चलने में सुधार करने के लिए पैरों के ऑपरेशन की जरूरत होती है। ऑपरेशन के बाद फिजियोथेरेपी की सलाह दी जाती है।
  1. व्हील चेयर – स्पाइना बिफिडा से पीड़ित बच्चों को चलने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। ऐसे में डॉक्टर उन्हें एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए व्हील चेयर का सहारा देते हैं। हालांकि, यह इलाज तो नहीं है, लेकिन इसे इलाज का एक भाग माना जा सकता है। इससे बच्चे को काफी आराम हो सकता है।
  1. आहार और एनीमा- स्टूल इनकॉन्टिनेंस से बचाव के लिए, आहार में बदलाव के साथ-साथ मरीज को एनीमा भी दिया जाता है, ताकि उन्हें मलत्याग करने में आसानी हो।
  1. मूत्राशय की सर्जरी – यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस से बचाव के लिए, मूत्राशय का आकार बढ़ाने के लिए और मांसपेशियों को कसने के लिए सर्जरी की जरूरत हो सकती है।
  1. कैथिटर या पैड – स्पाइना बिफिडा के मरीजों में मल-मूत्र के नियंत्रण में काफी कठिनाई हो सकती है । इसके साथ ही उनमें सामान्य लोगों की तरह बाथरूम जाने की क्षमता नहीं होती है। ऐसे में मल-मूत्र के लिए डॉक्टर बैग या कैथिटर (catheterisation- मूत्र निकालने की प्रक्रिया) दे सकते हैं। इसका उपयोग बच्चे के लिए काफी लाभकारी हो सकता है, क्योंकि इससे उन्हें मल-मूत्र त्यागने में आसानी हो सकती है। इन सबके साथ-साथ नियमित रूप से मरीज की किडनी, मूत्राशय और अन्य अंगों की जांच की जाती है।
  1. त्वचा की देखभाल – स्पाइना बिफिडा से प्रभावित अंगों में बच्चों को कुछ महसूस नहीं होता है(loss of sensations)। ऐसे में उनकी त्वचा पर घाव, कट या अन्य त्वचा संक्रमण हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनको अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है। उनकी त्वचा की देखभाल के लिए डॉक्टर क्रीम लगाने का सुझाव दे सकते हैं। साथ ही कुछ सावधानियां जैसे – गर्म पानी से न नहाना और ज्यादा टाइट फिटिंग जूते न पहनाने की सलाह भी दे सकते हैं।
  1. शारीरिक गतिविधि(physiotherapy)- शारीरिक गतिविधि हर किसी के लिए जरूरी है, लेकिन स्पाइना बिफिडा से पीड़ित बच्चों को इसकी काफी जरूरत हो सकती है। ऐसे में डॉक्टर या थेरेपिस्ट द्वारा कुछ व्यायाम करने की सलाह भी दी जाती है। हालांकि, रीढ़ की हड्डी के स्पोर्ट के लिए डॉक्टर ब्रेस का उपयोग करने के लिए कह सकते हैं।
  1. बाल चिकित्सा पुनर्वसन (Pediatric rehabilitation)
  1. अलग-अलग बच्चों में उनके स्वास्थ्य के अनुसार इसकी जरूरत अलग-अलग हो सकती है। इसलिए, इस बारे में डॉक्टरी सलाह ही पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

आगे जानते हैं कि इसका निदान कैसे किया जा सकता है?

स्पाइना बिफिडा का पता कैसे चल सकता है?

स्पाइना बिफिडा का निदान गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के बाद किया जा सकता है। इसके लिए कुछ खास तरह की जांच की जाती हैं, जिनके बारे में नीचे बताया गया है (3)। साथ ही हम बता दें कि स्पाइना बिफिडा ओकुल्ट के मामले में ये जांच कारगर नहीं हैं, क्योंकि वयस्क होने तक इसका पता लगाना मुश्किल होता है।

नीचे बताए गए टेस्ट गर्भावस्था के दौरान किए जाते हैं –

  1. एएफपी- अल्फा फीटो प्रोटीन (AFP alpha-fetoprotein) एक प्रकार का ब्लड टेस्ट होता है, जिसमें यह पता चलता है कि भ्रूण से मां के रक्त में कितना ए.एफ.पी(AFP) गया है। ए.एफ.पी एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जो भ्रूण बनाता है। ए.एफ.पी के उच्च स्तर का मतलब हो सकता है कि बच्चे को स्पाइना बिफिडा है। ए.एफ.पी परीक्षण “गर्भावस्था में ट्रिपल मार्कर टेस्ट” या ‘ट्रिपल स्क्रीन’ नामक परीक्षण का हिस्सा हो सकता है, जो न्यूरल ट्यूब दोष के लिए किया जाता है।
  1. अल्ट्रासाउंड – अल्ट्रासाउंड बच्चे की तस्वीर और उसके मूवमेंट को देखने के लिए किया जाता है। कुछ मामलों में डॉक्टर अल्ट्रासाउंड में पता कर सकते हैं कि शिशु में स्पाइना बिफिडा है या अन्य कारणों से बच्चे में ए.एफ.पी का उच्च स्तर हुआ है। इस टेस्ट से स्पाइना बिफिडा का पता चल सकता है।
  1. एमनियोसेंटेसिस (Amniocentesis) – इस परीक्षण के लिए, डॉक्टर गर्भ में बच्चे के आसपास मौजूद एमनियोटिक द्रव की जांच (AMNIOTIC FLUID ANALYSIS) के लिए इसका एक छोटा-सा नमूना लेते हैं। द्रव में ए.एफ.पी के औसत स्तर से अधिक होने का मतलब यह हो सकता है कि बच्चे को स्पाइना बिफिडा है।

बच्चे के जन्म के बाद स्पाइना बिफिडा के निदान के तरीके –

  • कभी-कभी बच्चे की पीठ पर बालों का एक पैच या डिंपल होता है, जो बच्चे के जन्म के बाद पहली बार दिखाई देता है।
  • बच्चे की रीढ़ और पीठ की हड्डियों के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त करने के लिए, डॉक्टर एक्स-रे, एमआरआई या सीटी स्कैन कर सकते हैं।

अब जानते हैं इसके बचाव के कुछ तरीके।

स्पाइना बिफिडा से कैसे बचा जा सकता है?

गर्भावस्था के पहले या उस दौरान कुछ बातों का ध्यान रखकर इसके जोखिम को कम किया जा सकता है। उन्हीं के बारे में हम नीचे जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं (1) (3) (6)

  • महिलाओं को हर दिन 400 माइक्रोग्राम (mcg) फोलिक एसिड लेने की जरूरत होती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान परिषद (The National Health and Medical Research Council) की सलाह है कि गर्भावस्था की योजना बनाने वाली या गर्भवती होने की संभावना रखने वाली सभी महिलाओं को रोजाना 0.5 मिलीग्राम फोलिक एसिड लेना चाहिए। इसके अलावा, इसकी मात्रा के बारे में एक बार डॉक्टरी परामर्श भी जरूर लें। फोलिक एसिड का सेवन स्पाइना बिफिडा के जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकता है। प्रेगनेंट होने से एक महीना पहले से ही फोलिक एसिड को लेने की सलाह दी जाती है।
  • डॉक्टर से किसी भी प्रिस्क्रिप्शन, ओवर-द-काउंटर दवा, विटामिन और आहार या हर्बल सप्लीमेंट्स के बारे में बात करें और सुझाव लें।
  • अगर किसी महिला को मधुमेह या मोटापे की परेशानी है, तो कोशिश करें कि गर्भावस्था के पहले और उस दौरान ये स्थितियां नियंत्रित रहें। इसके लिए डॉक्टर द्वारा निर्धारित की गई दवाओं का समय पर सेवन करें।
  • खुद को ज्यादा तापमान से दूर रखें जैसे – सॉना बाथ से बचें।
  • अगर बुखार हो, तो तुरंत उसका इलाज कराएं। 
  • बीमारी को लेकर मन में संदेह है तो डॉक्टर से सलाह लें।

आशा करते हैं कि इस लेख से पाठकों को स्पाइना बिफिडा के बारे काफी जानकारी मिल गई होगी। हमारी राय यही है कि गर्भावस्था के दौरान ही नहीं, बल्कि उसके पहले से ही पोषक तत्वों से युक्त खाद्य पदार्थ का सेवन करें। ये बीमारी किसी भी बच्चे को हो सकती है। ऐसे में सही पौष्टिक आहार लेकर इस समस्या के खतरे को कम किया जा सकता है। साथ ही इस लेख में मौजूद जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ साझा कर इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाएं।

संदर्भ (References)

1. Spina Bifida By Medlineplus
2. Spina Bifida By NIH
3. What is Spina Bifida? By CDC
4. Spina Bifida By NCBI
5. Myelomeningocele By Medlineplus
6. Spina Bifida By Better Health
7. Health Issues & Treatments for Spina Bifida By CDC

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