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बच्चों में काली खांसी होने के कारण, लक्षण, इलाज व टीकाकरण | Whooping Cough In Babies In Hindi

Whooping Cough In Babies In Hindi

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मौसम बदलने पर सर्दी-खांसी की समस्या बहुत आम है और यह समस्या बच्चों को अधिक प्रभावित करती है। मगर, खांसी की समस्या अगर गंभीर है, तो यह काली खांसी का इशारा हो सकता है। ऐसे में इसे सामान्य समझकर बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि छोटे बच्चों के लिए यह खतरनाक साबित हो सकती है (1)। यही वजह है कि मॉमजंक्शन के इस लेख में हम बच्चों में काली खांसी के कारण और लक्षण के साथ ही इससे बचाव के घरेलू उपाय बता रहे हैं।

चलिए सबसे पहले जानते हैं कि काली खांसी क्या है।

काली खांसी (कुकर खांसी) क्या है?

काली खांसी ऊपरी श्वसन तंत्र से संबंधित एक गंभीर संक्रमण है। इसे अंग्रेजी में पर्टुसिस या वूपिंग कफ के नाम से भी जाना जाता है। यह समस्या बोर्डेटेला पर्टुसिस (Bordetella pertussis) नाम के बैक्टीरिया से संक्रमित होने कारण होती है। इस समस्या में गंभीर खांसी व सांस लेने में परेशानी होती है। सामान्य रूप से यह समस्या किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है, लेकिन इस समस्या से नवजात शिशु और बच्चे अधिक प्रभावित होते हैं। यह एक संक्रामक (Contagious) रोग है। इस वजह से काली खांसी से प्रभावित व्यक्ति द्वारा छींकने पर बैक्टीरिया एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल सकता है। यानी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों को भी काली खांसी की समस्या हो सकती है (2)

आगे हम बच्चों में काली खांसी होने के कारणों के बारे में जानेंगे।

बच्चों में काली खांसी होने के कारण

छोटे बच्चों में काली खांसी होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, इनमे से कुछ इस प्रकार है:

  • बैक्टीरियल इन्फेक्शन- लेख में आपको पहले ही बताया जा चुका है कि बच्चों में काली खांसी होने का मुख्य कारण बोर्डेटेला पर्टुसिस नामक बैक्टीरिया है। यह बैक्टीरिया श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। इससे सिलिया (ऊपरी श्वसन तंत्र का एक हिस्सा) को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे कि नाक की नली में सूजन उत्पन्न होती है और खांसी के साथ ही सांस लेने में भी तकलीफ होती है (3)
  • कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली- अगर किसी बच्चे के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता सामान्य से कमजोर है, तो उन्हें काली खांसी की समस्या आसानी से प्रभावित कर सकती है (4)
  • प्रभावित व्यक्ति के संपर्क से- यह एक संक्रामक समस्या होती है, जिससे कि इस समस्या से प्रभावित व्यक्ति के संपर्क में आने पर दूसरों को इस समस्या के होने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में इसे भी काली खांसी का एक कारण माना जा सकता है (2)

अब हम बच्चों को काली खांसी कैसे होती है, इसकी जानकारी देने जा रहे हैं।

बच्चों को काली खांसी कैसे होती है?

जैसा कि हमने पहले भी लेख में बताया है कि काली खांसी होने के पीछे बोर्डेटेला पर्टुसिस नामक बैक्टीरिया है। ऐसे में बच्चों में काली खांसी इस बैक्टीरिया के प्रभाव में आने पर हो सकती है। यह बैक्टीरिया काली खांसी से प्रभावित व्यक्ति द्वारा छींकने पर बच्चों में फैल सकता है (2)

आइए अब जानते हैं कि किन बच्चों को काली खांसी की समस्या होने का खतरा अधिक होता है।

किन बच्चों को काली खांसी होने का जोखिम अधिक होता है?

6 महीने से कम उम्र वाले बच्चों में काली खांसी की समस्या होने का जोखिम अधिक रहता है। दरअसल, इस समय बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता काफी कमजोर होती है। वहीं यह समस्या 11 से 18 वर्ष की उम्र में भी बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है। ऐसे में इस उम्र के बच्चों में भी कली खांसी होने का जोखिम अधिक रहता है (5)। बच्चों को इस समस्या से बचाने के लिए गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को काली खांसी का टीका लगवाना चाहिए (6)

इस लेख के अगले हिस्से में हम बच्चों में काली खांसी होने के लक्षण की जानकारी देने जा रहे हैं।

बच्चों में काली खांसी होने के लक्षण

शिशुओं और बच्चों में काली खांसी की समस्या के लक्षण  5 से 10 दिनों के अंदर नजर आ सकता है। इन लक्षणों को खांसी की शुरुआत और उसकी गंभीरता के आधार पर अलग-अलग चरणों में समझा जा सकता है। चरण के हिसाब से काली खांसी के लक्षण कुछ इस प्रकार हैं (1):

पहला चरण

बच्चों में काली खांसी पहले और दूसरे हफ्ते इस तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं:

दूसरा चरण

इस समस्या के 1 से 2 सप्ताह बीतने के बाद इस प्रकार के लक्षण नजर आ सकते हैं:

  • पैरोक्सिम्स- इसमें लगातार तेज खांसी के साथ हूप आवाज निकलती है।
  • खांसी के दौरान या बाद में उल्टी होना
  • खांसी के बाद बहुत थकान होना।

तीसरा चरण

इस स्टेज में आने तक खांसी की समस्या के लक्षण कम हो सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार नजर आ सकते हैं :

  • खांसी के साथ कभी-कभी उल्टी होना।
  • कई बार सांस लेने में भी तकलीफ हो सकती है।

चलिए अब जान लेते हैं कि बच्चों में काली खांसी का निदान किस तरह किया जा सकता है।

बच्चों में काली खांसी का निदान कैसे किया जाता है?

बच्चों में काली खांसी के बारे में पता करने के लिए डॉक्टर निम्न तरीकों को इस्तेमाल में ला सकता है (7):

  • मेडिकल हिस्ट्री- काली खांसी के बारे में जांच करने से पहले डॉक्टर माता-पिता से शिशुओं में दिखाई देने वाले लक्षण से जुड़ी जानकारी ले सकता है। इससे समस्या का पता लगाने में काफी हद तक मदद मिल सकता है।
  • शारीरिक परीक्षण- इस समस्या के निदान के लिए विशेषज्ञ बच्चे का शारीरिक परीक्षण कर सकता है।
  • लार या बलगम की जांच- संदेह होने पर समस्या की पुष्टि के लिए डॉक्टर प्रभावित बच्चे की लार या बलगम की जांच कराने की सलाह दे सकता है।
  • रक्त की जांच- कुछ स्थितियों में डॉक्टर रक्त की भी जांच करा सकते हैं।

आगे हम बच्चों में काली खांसी के इलाज की जानकारी दे रहे हैं।

बच्चों में काली खांसी का ट्रीटमेंट

बच्चों में काली खांसी को दूर करने के लिए इलाज की कई प्रक्रियाओं को अपनाया जा सकता है। यह कुछ इस प्रकार हैं :

  • एंटीबायोटिक्स- काली खांसी की समस्या बैक्टीरियल इन्फेक्शन के कारण होता है। ऐसे में डॉक्टर एंटीबायोटिक दवा लेने का सुझाव दे सकते हैं। यह दवाएं बैक्टीरिया के प्रभाव को कम कर संक्रमण से राहत दिला सकती हैं (7)
  • ऑक्सीजन सप्लाई- कुछ मामलों में काली खांसी की समस्या काफी गंभीर हो सकती हैं। ऐसे में बच्चों को सांस लेने में अधिक तकलीफ होती है, इसलिए उन्हें ऑक्सीजन दी जा सकती है। इस ऑक्सीजन सप्लाई को हाई ह्यूमिडिटी के साथ दिया जाता है, जिससे कि हवा की गर्माहट से श्वसन नली पूरी तरह खुल सकें (2)
  • नींद की दवा- छोटे बच्चों को गंभीर खांसी की स्थिति में बेहतर नींद के लिए डॉक्टर नींद की दवा दे सकते हैं, ताकि बच्चे को खांसी की समस्या से थोड़ी राहत मिल सके (2)

आइए जानते हैं कि बच्चों में काली खांसी से राहत के लिए घर पर किस तरह देखभाल की जा सकती है।

बच्चों में काली खांसी के लिए घर पर देखभाल

काली खांसी की समस्या होने पर डॉक्टरी इलाज के साथ ही घर पर सही तरह से देखभाल करना भी जरूरी होता है। ऐसे में अगर किसी के बच्चे को काली खांसी की समस्या है, तो वे घर पर इस तरह से देखभाल कर सकते हैं (7):

  • बच्चों के लिए डॉक्टर द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक्स दवाई को समय पर दें।
  • घर में धुआं और धूल न रहे, इस बात का ध्यान रखें। दरअसल, धुआं और धूल खांसी को बढ़ा सकते हैं।
  • बच्चों के कमरे में साफ और कूल मिस्ट वेपोराइजर का उपयोग करें। इससे बलगम को ढीला करने और खांसी से राहत पाने में मदद मिल सकती है।
  • बच्चों को अच्छी तरह हाथ धोना सिखाएं।
  • बच्चे को अच्छी मात्रा में तरल पदार्थ दे। इसके लिए उन्हें पर्याप्त मात्रा में पानी, जूस और सूप दे सकते हैं।
  • बच्चों को कम मात्रा में अधिक बार आहार लेने के लिए कहें। इससे उल्टी आने की समस्या को रोकने में मदद मिल सकती है।

अब हम बच्चों को काली खांसी से बचाने के लिए कुछ जरूरी टिप्स बताने जा रहे हैं।

बच्चों में काली खांसी से बचाव के टिप्स

बच्चों में काली खांसी की समस्या को पनपने से रोकने के लिए कुछ बचाव के उपाय अपनाए जा सकते हैं। इन उपायों के बारे में हम नीचे दिए बिंदुओं के माध्यम से बता रहे हैं :

  • बच्चों को काली खांसी से बचाने के लिए टीका लगवाते रहें। इसके लिए डिप्थीरिया, टिटनेस, असेलुलर पर्टुसिस (DTaP) वैक्सीन लगवा सकते है। बच्चों के 6 साल का होने से पहले करीब पांच खुराक में इस वैक्सीन को लगवाने की सलाह दी जाती है। वहीं, बच्चे के 11-18 वर्ष की उम्र में आने के बाद इम्यूनिटी को कमजोर होने से बचाने के लिए कम्बाइन टिटनेस, डिप्थीरिया, असेलुलर पर्टुसिस (Tdap) वैक्सीन दिया जाता है (5)
  • बच्चों को डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक देते रहें (8)
  • बच्चों के आस-पास साफ सफाई बनाए रखें (8)
  • घर में खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को रूमाल से कवर करें (8)
  • बच्चों को खाना देने से पहले उन्हें कम से कम 20 सेकंड तक हैंडवाश से हाथ धोना सिखाएं (8)

यहां हम शिशुओं में अनुपचारित काली खांसी के कारण होने वाली जटिलताओं के बारे में जानेंगे।

शिशुओं को अनुपचारित काली खांसी से होने वाली जटिलताएं

सही से इलाज न करने की स्थिति में काली खांसी शिशुओं और छोटे बच्चों में काफी गंभीर और घातक जटिलताओं का कारण बन सकती है। खासकर उन बच्चों को जिन्हें पर्टुसिस वैक्सीन नहीं लगी हैं (9)

  • निमोनिया- काली खांसी का अधिक समय तक उपचार नहीं करने पर निमोनिया (फेफड़ों में संक्रमण) की समस्या हो सकती है। यह समस्या काली खांसी से प्रभावित चार में से एक बच्चे को हो सकती है।
  • कन्वल्शन (कंपकंपी)- अगर लंबे समय तक इस समस्या का उपचार नहीं कराया जाएं, तो इससे बच्चों में कंपकंपी की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसा 100 में से 1 बच्चों को हो सकता है।
  • एपनिया- बच्चों में काली खांसी के कारण एपनिया आम है। इस समस्या की वजह से उन्हें  सांस लेने में कठिनाई हो सकती है। यह समस्या 5 में से 3 लोगों को हो सकती है।
  • एन्सेफैलोपैथी- यह एक तरह की मस्तिष्क से जुड़ी समस्या होती है, जिसमें दिमागी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। ये समस्या 300 बच्चों में से किसी 1 को हो सकती है
  • मृत्यु- अगर अधिक समय तक बच्चों की काली खांसी का इलाज न किया जाए, तो इससे जान जाने का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसा 100 में से एक बच्चे के साथ हो सकता है।

आगे पढ़िए काली खांसी की स्थिति में बच्चों को डॉक्टर को कब दिखाना जरूरी है।

डॉक्टर से कब मिलें

अगर बच्चें में निम्न लक्षण नजर आते हैं, तो बिना देर किए डॉक्टर को दिखाना चाहिए (2):

  • अगर काली खांसी के साथ ही किसी बच्चे की त्वचा का रंग नीला दिखाई दे रहा है, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं। दरअसल, यह शरीर में ऑक्सीजन की कमी का एक संकेत हो सकता है।
  • बच्चों को सांस लेने में तकलीफ होने लगे, तो उन्हें विशेषज्ञ के पास लेकर जाएं। यह खांसी की वजह से उत्पन्न एपनिया की समस्या के कारण हो सकता है।
  • अगर खांसी होने के साथ ही बच्चे को दौरे पड़ रहे हैं, तो समय व्यर्थ किए बिना डॉक्टर को दिखाएं।
  • खांसी के कारण तेज बुखार और उल्टी हो रही हो, तो विशेषज्ञ से मदद लें।
  • खांसी के साथ अगर बच्चे में डिहाइड्रेशन की स्थिति पैदा होती है, तो फौरन डॉक्टर से मिलना चाहिए।

अब हम बच्चों में काली खांसी को लेकर पूछे गए कुछ सवालों के जवाब बताने जा रहे हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. बच्चों में काली खांसी कब तक रहती है?

काली खांसी की समस्या बच्चों में दो हफ्ते तक रह सकती है। अगर समय रहते इलाज नहीं कराया जाए, तो यह 100 दिन तक भी रह सकती है (1)

2. क्या टीकाकरण के बाद भी शिशुओं को काली खांसी हो सकती है?

काली खांसी का टीका प्रभावी होता है, लेकिन यह अधिक लंबे समय तक समस्या से बचाने में सक्षम नहीं है। टीकाकरण से काली खांसी से दो साल तक बचा जा सकता है, इसके बाद इस समस्या को होने से रोकने के लिए पुनः टीका लगवाना जरूरी हो सकता है (10)

बच्चों को काली खांसी की समस्या हो सकती है। ऐसे में इस समस्या को लेकर पेरेंट्स को ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। इस समस्या का तुरंत उपचार शुरू कर समस्या को गंभीर होने से पहले ही रोक सकते हैं। वहीं डॉक्टरी इलाज के साथ ही लेख में बताए गए घर पर देखभाल के तरीके को भी अपनाएं। हम उम्मीद करते हैं कि इस लेख में शामिल सभी जानकारियां पाठक के लिए लाभकारी साबित होंगी। बच्चों से जुड़ी इस तरह की अन्य जानकारी प्राप्त करने के लिए मॉमजंक्शन के साथ जुड़े रहें।

संदर्भ (References):

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Bhupendra Verma